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संपादकीय: 100 बेरोजगारों में 83 युवा, देश की ताकत में कैसे होगा इजाफा! ‘इंडिया एंप्लायमेंट रिपोर्ट 2024’ ने बढ़ाई चिंता

बेरोजगारी की दुखद तस्वीर के बीच एक खराब स्थिति यह है कि इस दौरान ठेकेदारी प्रथा में वृद्धि हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, संगठित क्षेत्रों में भी कुल कर्मचारियों का कुछ फीसद हिस्सा ही नियमित है और वे दीर्घकालिक कांट्रैक्ट के दायरे में आते हैं।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: March 29, 2024 13:38 IST
संपादकीय  100 बेरोजगारों में 83 युवा  देश की ताकत में कैसे होगा इजाफा  ‘इंडिया एंप्लायमेंट रिपोर्ट 2024’ ने बढ़ाई चिंता
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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अर्थव्यवस्था की चमकती तस्वीर के बीच अगर बेरोजगारी के आंकड़े में युवाओं की हिस्सेदारी चिंताजनक स्तर तक दिखाई देने लगे तो सोचने की जरूरत है कि विकास के रास्ते में इस मसले का क्या हल है! हालांकि हाल के वर्षों में युवाओं की संख्या और ऊर्जा को देश की ताकत के तौर पर पेश किया गया और उन्हें विकास का वाहक बताया गया है, लेकिन अब अगर युवाओं का ज्यादातर हिस्सा बेरोजगारी की समस्या का सामना कर रहा है तो उसे कैसे देखा जाएगा?

मानव विकास संस्थान ने ILO के साथ जारी की रिपोर्ट

गौरतलब है कि मानव विकास संस्थान यानी आइएचडी के साथ मिल कर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आइएलओ ने मंगलवार को ‘इंडिया एंप्लायमेंट रपट 2024’ जारी की है। इस रपट में बताया गया है कि देश में अगर बेरोजगार लोगों की कुल संख्या एक सौ है तो उसमें तिरासी लोग युवा हैं। अगर देश की बेरोजगारी की तस्वीर में तिरासी फीसद युवा दिख रहे हैं, तो इससे कैसे देश की ताकत में इजाफा हो रहा है?

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दो दशक पहले के मुकाबले लगभग दोगुनी बढ़ोतरी

भारत में बेरोजगारी की स्थिति पर तैयार इस अहम रपट में कुछ विरोधाभासों पर भी गौर करने में मदद मिलती है। माना जाता है कि बेरोजगारी की समस्या काफी हद तक शिक्षा और कौशल विकास के अभाव का भी नतीजा है। मगर आइएलओ की रपट के मुताबिक, देश के कुल बेरोजगार युवाओं की तादाद में करीब दो दशक पहले के मुकाबले अब लगभग दोगुनी बढ़ोतरी हो चुकी है। खासतौर पर कोरोना महामारी के असर वाले वर्षों में इसमें तेज गिरावट दर्ज की गई।

वर्ष 2000 में पढ़े-लिखे युवा बेरोजगारों की संख्या रोजगार से वंचित कुल युवाओं में 35.2 फीसद थी, वहीं 2022 में यह बढ़ कर 65.7 फीसद हो गई। यह स्थिति तब है, जब इस अध्ययन में उन पढ़े-लिखे युवाओं को भी शामिल किया गया, जिन्होंने कम के कम दसवीं तक की शिक्षा हासिल की हो। इस आलम एक जटिल स्थिति यह पैदा होती है कि जितने लोगों को रोजगार मिल सका, उनमें से नब्बे फीसद श्रमिक अनौपचारिक काम में लगे हुए हैं, जबकि नियमित काम का हिस्सा बीते पांच वर्षों में काफी कम हो गया है। हालांकि सन 2000 के बाद इसमें बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।

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बेरोजगारी की दुखद तस्वीर के बीच एक खराब स्थिति यह है कि इस दौरान ठेकेदारी प्रथा में वृद्धि हुई है। रपट के मुताबिक, संगठित क्षेत्रों में भी कुल कर्मचारियों का कुछ फीसद हिस्सा ही नियमित है और वे दीर्घकालिक अनुबंधों के दायरे में आते हैं। ऐसी स्थिति में अंदाजा लगाया जा सकता है कि आजीविका से जुड़ी व्यापक असुरक्षा की स्थितियों का लोगों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता होगा। विडंबना यह है कि बढ़ती बेरोजगारी के साथ घटती आय का सामना कर रहे परिवारों में सीधा असर यह पड़ता है कि बच्चों और खासतौर पर लड़कियों की शिक्षा बाधित होती है।

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आखिर क्या कारण है कि देश में गरीब और हाशिये के तबकों के बीच दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ने की दर आज भी उच्च स्तर पर बनी हुई है? आधी-अधूरी शिक्षा और कौशल के अभाव की समस्या का सामना करते युवा वर्ग की जगह अर्थव्यवस्था में कहां और किस रूप में है? राजनीतिक नारेबाजी में देश में युवाओं की बढ़ती तादाद और ताकत को एक उम्मीद के तौर पर पेश करने में कोई कमी नहीं की जाती है। मगर वादों या घोषणाओं के नीतिगत स्तर पर जमीन पर उतरने की हकीकत कई बार उसके उलट होती है। सवाल है कि इस विरोधाभासी स्थिति के रहते विकास की राह कहां पहुंचेगी!

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