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सिर्फ क्राइम सीन पर रहने से नहीं लग सकता हत्या का आरोप, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

हत्या मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ क्राइम सीन पर मौजूद होने से मर्डर आरोप नहीं लग सकता। इसके बाद कोर्ट ने शख्स के ऊपर से हत्या का आरोप हटा दिया।
Written by: न्यूज डेस्क | Edited By: Jyoti Gupta
नई दिल्ली | Updated: February 08, 2024 09:15 IST
सिर्फ क्राइम सीन पर रहने से नहीं लग सकता हत्या का आरोप  सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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हत्या मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक शख्स की आजीवन कारावास को 10 साल जेल की सजा में बदल दिया। शख्स को अन्य दोषियों के साथ हत्या के दोष में आजीवन कारावास की सजा मिली थी। सुप्रीम कोर्ट मामले की सुनवाई कर रहा था। कोर्ट का कहना था कि अपराथ स्थल पर सिर्फ मौजूद होने का मतलब यह नहीं है कि सामने वाला शख्स हत्यारा है। इसके बाद कोर्ट ने उसे गैर इरादतन हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन करावास को 10 साल की सजा में बदल दिया।

ट्रायल कोर्ट और तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए जस्टिस बीआर गवई और पीएस नरसिम्हा की पीठ ने कहा, " वास्तव में दोनों कोर्ट ने यांत्रिक रूप से अधिनियम की धारा 34 के तहत ए 3 (अभियुक्त संख्या 3) के खिलाफ निष्कर्ष निकाला है। अपराध स्थल के पास उसकी उपस्थिति और अन्य आरोपियों के साथ उसके संबंध होने के आधार पर शख्स को सजा सुनाई गई।

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पीठ ने कहा, "गवाहों द्वारा दिए गए बयानों की जांच करने के बाद कोर्ट ने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चश्मदीदों के आधार पर यह तर्क देना संभव नहीं है कि शख्स का इरादा मृतक की हत्या करने का रहा होगा"। उसे आईपीसी की धारा 302 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।"

"हत्या करने का कोई इरादा नहीं था''

कोर्ट ने आगे कहा "जिन परिस्थितियों में शख्स को देखा गया था, वे स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं कि मृतक की हत्या करने का उसका कोई इरादा नहीं था। जबकि अन्य दो आरोपियों ने कुल्हाड़ी का इस्तेमाल किया। कुछ गवाहों ने कहा कि शख्स ने केवल हस्तक्षेप करने और हमले को रोकने की कोशिश की थी, इसलिए ही धमकी दी थी। इन परिस्थितियों में हम मानते हैं कि शख्स का इरादा मृतक की हत्या करने का नहीं था। इसके अलावा इस बात का कोई सबूत नहीं है कि शख्स अन्य आरोपियों के साथ आया था। ''

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कोर्ट ने आगे कहा, भले ही शख्स का इरादा हत्या करने का नहीं रहा हो फिर भी हमले में उसकी भागीदारी और पत्थर उठाना उसे उस अपराध के लिए दोषी बनाता है जो उसने किया है। हम शख्स को आईपीसी की धारा 302 और 34 से बरी करते हैं। जबकि वह आईपीसी की धारा 304 तहत अपराध के लिए दोषी है।

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