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नो-कॉस्ट ईएमआई की क्या सचमुच नहीं होती लागत? डिटेल चेक करने के बाद ही करें शॉपिंग

No Cost EMI या जीरो कॉस्ट ईएमआई के नाम से लाए गए कई ऑफर हकीकत में पूरी तरह बिना लागत वाले नहीं होते। ऐसे दावों के बावजूद उनमें कोई न कोई छिपी हुई लागत रहती है, जिसे जानना जरूरी है।
Written by: Viplav Rahi
Updated: June 19, 2024 19:10 IST
नो कॉस्ट ईएमआई की क्या सचमुच नहीं होती लागत  डिटेल चेक करने के बाद ही करें शॉपिंग
पूरी जानकारी लिए बिना सिर्फ नो-कॉस्ट-ईएमआई का ऑफर देखकर शॉपिंग की, तो बाद में पछताने की नौबत आ सकती है। (Image : Pixabay)
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No cost EMI or zero cost EMI : ऑनलाइन शॉपिंग (Online Shopping) पोर्टल से लेकर बैंक और क्रेडिट कार्ड कंपनियां तक ग्राहकों को नो कॉस्ट ईएमआई या जीरो कॉस्ट ईएमआई के ऑफर धड़ल्ले से देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये ऑफर क्या वाकई बिना किसी लागत के खरीदारी का मौका देते हैं? ऐसे ऑफर्स की सच्चाई उनके डिटेल को बारीकी से देखने पर ही पता चलेगी। अगर आपने यह सावधानी नहीं रखी तो नो कॉस्ट ईएमआई के लुभावने ऑफर बाद में महंगे पड़ सकते हैं। इसलिए ऐसे लुभावने ऑफर्स के लालच में फंसकर खरीदारी करने से पहले पूरी जानकारी हासिल कर लें।

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सामान्य EMI से कैसे अलग हैं ऐसे ऑफर

आप जब भी ईएमआई पर कोई सामान खरीदते हैं, तो असलियत में आप एक लोन लेते हैं, जिसे आपको मंथली इंस्टालमेंट में वापस करना होता है। सामान्य किस्म की ईएमआई में इन इंस्टालमेंट्स का एक हिस्सा प्रिंसिपल अमाउंट का होता है और बाकी उस पर देय ब्याज का। इसके साथ ही प्रोसेसिंग फीस भी चुकानी पड़ती है। इतना ही नहीं, आप जब भी कोई ईएमआई चुकाते हैं, तो उसके साथ ही उस पर जीएसटी भी देना पड़ता है। नो-कॉस्ट कही जाने वाली ईएमआई में भी ब्याज शामिल रहता है, क्योंकि लोन देने वाले बैंक या क्रेडिट कार्ड कंपनी तो अपने पैसे पर ब्याज तो वसूलते ही हैं। फर्क सिर्फ इतना होता है कि उस ब्याज की भरपाई, सामान बेचने वाले ऑनलाइन पोर्टल या सेलर की तरफ से की जाती है। यह भरपाई आमतौर पर सामान खरीदते समय अपफ्रंट डिस्काउंट देकर की जाती है। यानी आप ईएमआई के साथ जो ब्याज चुकाते हैं, उसके बराबर की रकम आपको सेलर की तरफ से छूट के रूप में मिल चुकी होती है।

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ब्याज के अलावा भी हो सकती है लागत 

यहां तक तो ठीक है कि आप ईएमआई के साथ जो ब्याज चुकाते हैं, वो आपको डिस्काउंट के रूप में पहले मिल चुका होता है। लेकिन नो-कॉस्ट ईएमआई में इसके अलावा कुछ और लागतें भी छिपी हो सकती हैं। मिसाल के तौर पर आपको ईएमआई का ऑफर देने वाले पोर्टल, बैंक, क्रेडिट कार्ड या फाइनेंसिंग कंपनियों को प्रॉसेसिंग फीस भी देनी पड़ सकती है। यह चेक करना भी जरूरी है कि डिस्काउंट ऑफर में ब्याज के साथ ही साथ ईएमआई के साथ चुकाए जाने वाले जीएसटी का अमाउंट भी शामिल है या नहीं। नियमों के मुताबिक जीएसटी की यह रकम ईएमआई में शामिल इंटरेस्ट के 18% के बराबर होती है। इसके अलावा पूरी रकम को पहले चुकाने पर प्री-क्लोजर फीस या प्री-पेमेंट पेनाल्टी देनी पड़ सकती है या देरी होने पर लेट पेमेंट चार्ज लग सकता है।

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पूरी जानकारी लेने के बाद करें शॉपिंग

अगर कोई कस्टमर ऐसी तमाम हिडेन कॉस्ट के बारे में पता किए बिना सिर्फ नो-कॉस्ट-ईएमआई का ऑफर देखकर शॉपिंग कर ले, तो बात में पछताने की नौबत आ सकती है। इसलिए बेहतर तरीका यही है कि आपको जब भी किसी नो-कॉस्ट-ईएमआई ऑफर का फायदा उठाने का मन करे, शॉपिंग करने से पहले उससे जुड़ी सारी शर्तों और खर्चों को अच्छी तरह समझने के बाद की आगे बढ़ें।

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