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Electoral Bond Data: इलेक्टोरल बॉन्ड डेटा से मचा हड़कंप, 16 हजार करोड़ हुए इधर से उधर, अब आगे क्या होगा? जानें अब तक आई हर डिटेल

SBI Electoral Bonds Case: इलेक्टोरल बॉन्ड मामले में अब आगे क्या? जानिए अब तक क्या-क्या हुआ?
Written by: Naina Gupta
Updated: March 19, 2024 15:08 IST
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Electoral Bonds Case: इलेक्टोरल बॉन्ड मामले में अब तक क्या-कुछ हुआ?
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SBI Electoral Bonds Case: इलेक्टोरल बॉन्ड्स- एक ऐसा शब्द जो पिछले कुछ दिनों से शायद हर किसी की जुबान पर है। आखिरकार करीब 6 साल बाद इलेक्टोरल बॉन्ड का 'सच' सबके सामने आ गया है। लेकिन यह सच इतनी आसानी से सामने नहीं आया है। राजनीतिक पार्टियों को चुनावी बॉन्ड के जरिए मिले डोनेशन को सार्वजनिक करने के लिए देश की शीर्ष अदालत को एक्शन लेना पड़ा। और भारत के सबसे बड़े पब्लिक सेक्टर बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) को कई बार फटकार लगी। और आखिरकार एसबीआई द्वारा दिए गए डेटा को चुनाव आयोग ने 14 मार्च 2024 को पहली बार अपनी वेबसाइट पर शेयर किया।

यूं तो एसबीआई ने पूरी कोशिश की थी कि इलेक्टोरल बॉन्ड डेटा को 30 जून तक यानी लोकसभा चुनाव 2024 के पूरे होने के बाद ही सार्वजनिक की जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने हथियार डालने पड़े। एसबीआई ने जो डेटा को शेयर किया वह पूरा नहीं है और उस पर काफी सवाल भी खड़े हुए हैं।

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चुनाव आयोग ने कब शेयर किया डेटा?

इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया ने 14 मार्च को इलेक्टोरल बॉन्ड डेटा का पहला सेट रिलीज किया। और 17 मार्च को इलेक्टोरल बॉन्ड डेटा का दूसरा सेट जारी किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में इलेक्टोरल बॉन्ड मामले की सुनवाई के दौरान अहम फैसले लिए और एसबीआई को पूरा डेटा एक साथ शेयर ना करने पर फटकार भी लगाई।

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इलेक्टोरल बॉन्ड के पहले डेटासेट में क्या-क्या खुलासा हुआ?

14 मार्च 2024 को इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया ने अपनी वेबसाइट पर दो लिस्ट अपलोड कीं। पहली लिस्ट में उन लोगों के नाम थे जिन्होंने बॉन्ड खरीदे। ये सभी बॉन्ड 12 अप्रैल 2019 से जनवरी 2024 के बीच खरीदे गए थे। इस लिस्ट में बॉन्ड खरीदने की तारीख और मूल्य वर्ग की जानकारी थी।

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इस लिस्ट से खुलासा हुआ था कि लॉटरी कंपनी Future Gaming ने सबसे ज्यादा कीमत के बॉन्ड खरीदे। इसके अलावा इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी मेघा इंजीनियरिंग (MEIL) दूसरी सबसे बड़ी डोनर थी। कई फार्मास्युटिकल कंपनियों ने भी बड़ी संख्या में करोड़ों रुपये के बॉन्ड खरीदे। रिलायंस और अडानी ग्रुप जैसी कंपनियों के नाम इस लिस्ट में नहीं थे लेकिन इनसे जुड़ी दूसरी कंपनियों ने पॉलिटिकल पार्टियों को इलेक्टोरल बॉन्ड दान किए।

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सबसे बड़ी बात जो इस लिस्ट से पता चली कि 21 ऐसी कंपनियां थीं जिन्होंने ED की रेड के बाद इलेक्टोरल बॉन्ड्स खरीदे थे।

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वहीं पहले डेटासेट में जारी हुई दूसरी लिस्ट में राजनीतिक पार्टियों के नाम और हर बॉन्ड का अमाउंट व तारीख दी गई थी। इससे लोगों को हर पार्टी को मिले टोटल अमाउंट को कैलकुलेट करने में मदद मिली। इस लिस्ट से खुलासा हुआ कि राजनीतिक पार्टियों ने कुल 16,492 करोड़ रुपये की कीमत के बॉन्ड कैश कराए। भारतीय जनता पार्टी (BJP) को कुल 8,250 करोड़ रुपये का चंदा मिला।

इलेक्टोरल बॉन्ड के पहले डेटासेट में क्या जानकारी नहीं थी?

इलेक्टोरल बॉन्ड के पहले डेटासेट के जारी होते ही बवाल मच गया था। लेकिन एसबीआई ने पूरी जानकारी चुनाव आयोग को नहीं दी थी। जो दो लिस्ट जारी की गई थीं, उनमें हर बॉन्ड का यूनिक कोड नहीं था जिससे बॉन्ड खरीदने वाले और उसे कैश कराने वाली पार्टी का मिलान करने में मदद होती।

इसके अलावा पहले डेटासेट में 12 अप्रैल 2019 से पहल खरीदे गए बॉन्ड्स की जानकारी नहीं थी। इन बॉन्ड्स की कीमत करीब 4000 करोड़ रुपये से ज्यादा था।

अप्रैल 2019 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित एक अंतरिम आदेश इस मामले के लिए बड़ा साबित हुआ। चुनावी बॉन्ड स्कीम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, अदालत ने तब आदेश दिया था कि जब वह अभी भी मामले पर फैसला कर रहा है, तो चुनाव आयोग सभी राजनीतिक दलों से चुनावी बॉन्ड की जानकारी इकट्ठा कर सीलबंद लिफाफे में कोर्ट में जमा कराएं।

बता दें कि साल 2018 से कोर्ट में चल रहे इलेक्टोरल बॉन्ड मामले में 15 फरवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया और इन बॉन्ड को असंवैधानिक करार दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 12 अप्रैल 2019 को आए अंतरिम आदेश के बाद खरीदे और कैश किए गए बॉन्ड की जानकारी सार्वजनिक की जाए।

इलेक्टोरल बॉन्ड का दूसरा डेटासेट कब हुआ रिलीज?

चुनाव आयोग ने अप्रैल 2019 से पहले इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने वाले कुछ डोनर की पहचान वाले दूसरा डेटासेट रिलीज किया। इस डेटासेट को चुनाव आयोग की वेबसाइट पर 17 मार्च 2024 को अपलोड किया गया। इसमें वो लिस्ट थी जिसे चुनाव आयोग ने 2019 से 2023 के बीच राजनीतिक पार्टियों से डेटा इकट्ठा कर बनाया था और सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट में सबमिट किया था।

बता दें कि अधिकतर पार्टियों ने बॉन्ड्स को रिडीम कराने की तारीख बताई थी। इसके अलावा अमाउंट की भी जानकारी इस लिस्ट में थी। बीजेपी, टीएमसी, बीजेडी जैसी पार्टियों ने डोनर के नाम का खुलासा नहीं किया था।

लेकिन DMK, AIDMK और जनसता दल (सेक्युलर) ने उन सभी डोनर के नाम का खुलासा किया था जिन्होंने इलेक्टोरल बॉन्ड्स डोनेट किए थे। इस जानकारी से यह मिथ मिट गया कि इलेक्टोरल बॉन्ड्स देने वाली कंपनी या इंडिविजुअल की कोई पहचान नहीं हो सकती।

डीएमके की बात करें तो तमिलनाडु की इस सत्ताधारी पार्टी को सबसे ज्यादा चंदा लॉटरी और गेमिंग कंपनी Future Gaming and Hotel Services Private Limited से मिला। वहीं जनता दल (से्क्युलर) ने बताया कि 2018 में हुए कर्नाटक चुनाव से पहले सबसे ज्यादा चंदा सॉफ्टवेयर दिग्गज इन्फोसिस ने पार्टी को दिया। बता दें कि पहली लिस्ट में इन्फोसिस का नाम नहीं था क्योंकि ये बॉन्ड्स 2019 से पहले खरीदे गए थे।

इसके अलावा आम आदमी पार्टी और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी ने भी 2019 में बॉन्ड्स खरीदने वाले डोनर के नाम का खुलासा किया।

इलेक्टोरल बॉन्ड का कौन सा डेटा अभी आना बाकी?

अब सवाल है कि इलेक्टोरल बॉन्ड का आखिर कौन सा डेटा है जो एसबीआई ने चुनाव आयोग के साथ शेयर नहीं किया है। 18 मार्च 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट इंडिया को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से उन सभी बॉन्ड के 'alphanumeric number' सबमिट करने को कहा जिन्हें खरीदा और रिडीम कराया गया। इस डेटा को जमा करने के लिए कोर्ट ने 21 मार्च की तारीख मुकर्र की और कहा कि बॉन्ड्स से जुड़ा कोई भी डेटा छिपा नहीं रहना चाहिए।

यूनिक कोड के आने से क्या होगा?

बता दें कि इलेक्टोरल बॉन्ड के यूनिक कोड के आने से किस कंपनी ने किस राजनीतिक पार्टी को चंदा दिया है, यह पता चल जाएगा। इससे डोनर और पार्टी के बीच संबंध का पता चलेगा और यह जानकारी मिलेगी कि कंपनियों को सरकार ने किसी तरह का फेवर किया या नहीं। इस जानकारी से यह भी पता चल जाएगा कि जांच एजेंसियों की रेड के बाद जिन कंपनियों ने बॉन्ड खरीदे, क्या वाकई उससे जांच पर असर पड़ा?

लेकिन ज़ाहिर सी बात है कि यूनिक कोड्स का पता चलने के बाद भी डेटा में एक बड़ा फर्क रहेगा। क्योंकि मार्च 2018 यानी इस स्कीम के शुरू होने के बाद से अप्रैल 2019 के बीच का डेटा नहीं है।

क्या होते हैं इलेक्टोरल बॉन्ड?

आपको बता दें कि साल 2017 में केंद्र सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को शुरू किया था। इस स्कीम के तहत कोई भी इंडिविजुअल या कंपनी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से कितने भी अमाउंट के इलेक्टोरल बॉन्ड खरीद सकती थी।

इन चुनावी बॉन्ड के जरिए कोई भी शख्स और कॉरपोरेट कंपनी किसी भी राजनीतिक पार्टी को बिना पहचान ज़ाहिर करे अनलिमिटेड पैसा डोनेट कर सकती है। इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम के तहत इलेक्टोरल बॉन्ड्स को SBI से फिक्स्ड डिनोमिनेशन में डोनर द्वारा खरीदा जा सकता है और किसी पॉलिटिकल पार्टी को दे दिया जाता है। और फिर वह पार्टी इन बॉन्ड को कैश रकम में बदल सकती है। इन बॉन्ड की सबसे खास बात है कि फायदा लेने वाली पॉलिटिकल पार्टी किसी भी इकाई या शख्स को डोनर का नाम बताने की जरूरत नहीं होती। यहां तक की इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया (ECI) को भी नहीं।

इलेक्टोरल बॉन्ड को अलग-अलग मूल्य वर्गों में उपलब्ध कराया गया। इनकी कीमत 1000 रुपये से लेकर 1 करोड़ रुपये के बीच होती है। ये 1000, 10000, एक लाख, दस लाख और एक करोड़ रुपयों के मूल्य में उपलब्ध थे। सबसे ज्यादा अहम बात है कि इलेक्टोरल बॉन्ड एक्सपायरी डेट के साथ आते हैं। इन बॉन्ड की वैलिडिटी सिर्फ 15 दिन होती है।

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