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खरीद रहे हैं लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी तो जान लीजिए लॉक-इन पीरियड की अहमियत

अगर आप खुद और परिवार का भविष्य सुरक्षित करने के लिए लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी ले रहे हैं तो इस तरह के प्लान में निवेश से पहले लॉक-इन पीरियड के फायदे और नुकसान के बारे में भी समझ लेना चाहिए,
Written by: Mithilesh Kumar
Updated: July 08, 2024 22:47 IST
खरीद रहे हैं लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी तो जान लीजिए लॉक इन पीरियड की अहमियत
यूनिट-लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान का लॉक-इन पीरियड 5 साल है। (Image: Freepik)
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लाइफ इंश्योरेंस खुद और परिवार के लिए बहुत ज़रूरी है। ये आपके जाने के बाद परिवार के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। यह परिवार के वित्तीय भविष्य को बनाए रखता है और उन्हें जरूरत की चीजों से समझौता किए बगैर बेहतर जिंदगी जीने में सक्षम बनाता है। लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी वित्तीय सुरक्षा के साथ-साथ निवेश के लिए मौका देती हैं। इस तरह की पॉलिसी के लिए एक अहम पहलू लॉक-इन पीरियड होता है। लॉक-इन पीरियड वह अवधि है जिससे लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी की लिक्विडिटी, टैक्स बेनिफिट प्रभावित होती है। कुल मिलाकर कहें तो इससे प्लान की अहमियत पर खास असर पड़ता है।

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लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी में लॉक-इन पीरियड वह समय है जिसके दौरान पॉलिसीहोल्डर्स बिना जुर्माना के पॉलिसी सरेंडर नहीं कर सकते हैं। यानी वे निवेश की गई रकम को निकाल नहीं सकते हैं। यह अवधि बीमा कंपनी यानी इंश्योरेंस प्रोवाइडर द्वारा तय की जाती है। कुछ अन्य तरह की लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसीज जैसे यूनिट-लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (यूलिप), एंडोमेंट प्लान और मनी बैक पॉलिसी के लिए भी बीमा कंपनियों द्वारा ही लॉक-इन पीरियड तय की जाती है। लाइफ इंश्योरेंस प्लान का अधिकतम लाभ उठाने के लिए आइए जानते हैं लॉक-इन पीरियड के बारे में।

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क्या है लॉक-इन पीरियड?

यूनिट-लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान का लॉक-इन पीरियड 5 साल है। इस अवधि के दौरान आमतौर पर आंशिक निकासी या निवेश की गई पूरी रकम निकालने की इजाजत नहीं होती है। लॉक-इन पीरियड बीत जाने के बाद पॉलिसीहोल्डर निवेश किए गए रकम का कुछ हिस्सा या पूरी निवेश रकम निकाल सकते हैं। बशर्ते इस 5 साल के दौरान सभी प्रीमियम चकाए गए हो। लॉक-इन पीरियड के दौरान, पॉलिसीहोल्डर अपना फंड नहीं निकाल सकते हैं, लेकिन वे यूनिट-लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान के भीतर पेश किए गए तमाम फंड विकल्पों के बीच स्विच कर सकते हैं। फंड स्विच करते समय सही कदम उठाने के लिए बैंक की मदद फायदेमंद साबित हो सकती है।

वहीं पेंशन स्कीम या रिटायरमेंट प्लान, इस तरह के निवेश विकल्प के लिए लॉक-इन पीरियड अलग-अलग भी हो सकती हैं। आमतौर इस तरह के प्लान के लिए लॉक-इन पीरियड लंबी होती है ताकि निवेशक रिटायरमेंट तक पैसे निवेश कर सकें।

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लॉक-इन पीरियड के फायदे और नुकसान

लिक्विडिटी 

लॉक-इन अवधि के दौरान पॉलिसीहोल्डर प्लान में निवेश की गई रकम का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। इसे लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी की एक कमी मानी जा सकती है। इमरेजेंसी जैसी स्थिति से निपटने के लिए पॉलिसीहोल्डर बिना पेनॉल्टी के पॉलिसी से फंड नहीं निकाल सकता है।

टैक्स बेनिफिट

लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी में निवेश कर आयकर कानून की धारा 80C और धारा 10(10D) के तहत टैक्स बेनिफिट का लाभ लिया जा सकता है। हालांकि, ये लाभ इस पर निर्भर करता हैं कि पॉलिसीहोल्डर लॉक-इन पीरियड के भीतर पॉलिसी को सरेंडर नहीं किया है। समय से पहले सरेंडर करने पर पॉलिसीहोल्डर को टैक्स बेनिफिट से वंचित किया जा सकता हैं।

लॉन्ग टर्म

लॉक-इन पीरियड लंबी अवधि वाले लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बचत और निवेश को बढ़ावा देती है। यह सुनिश्चित करती है कि पॉलिसीहोल्डर कम टेन्योर वाले निवेश विकल्प में पैसे लगाकर समय पर उचित फंड का इंतजाम कर सके।

समय से पहले प्लान सरेंडर करने पर लगता है जुर्माना

अगर कोई पॉलिसीहोल्डर लॉक-इन पीरियड से पहले पॉलिसी सरेंडर करता है, तो प्लान में निवेश की गई रकम हासिल करने के लिए जुर्माना देना पड़ सकता है। सरेंडर वैल्यू आमतौर पर प्लान में जाम किए गए प्रीमियम से कम होती है। बता दें कि सरेंडर वैल्यू वह रकम होती है जो लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी की लॉक-इन पीरियड यानी मैच्योरिटी पर पॉलिसीहोल्डर को मिलती है।

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