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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत संत समागम के जरिये भाजपा के लिए जमीन तैयार करने की जुगत में

26 दिसंबर को देवघर पहुंच कर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने स्वयं सेवकों को संदेश दिया कि जाति आधारित राजनीति को ध्यान में रख कर कार्य योजना बनानी चाहिए।
Written by: गिरधारी लाल जोशी | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: December 30, 2023 14:34 IST
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत संत समागम के जरिये भाजपा के लिए जमीन तैयार करने की जुगत में
संत समागम में भाग लेते आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत। फोटो- (जनसत्‍ता)।
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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत संत समागम के जरिये 2024 लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं। झारखंड और बिहार दोनों ही राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है। इन दोनों राज्यों में इसी साल दूसरी दफा एक ही आश्रम में आगमन कुछ तो संकेत देता है। भागलपुर के संतसेवी महर्षिमेहिं आश्रम और देवघर के श्री श्री अनुकूल चंद्र के सत्संग आश्रम में दो-दो बार इस साल पधार चुके हैं। वैसे भी इन दिनों संत समागम के जरिये मतदाताओं को भाजपा की ओर मोड़ना है।

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26 दिसंबर को देवघर पहुंच कर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने स्वयं सेवकों को संदेश दिया कि जाति आधारित राजनीति को ध्यान में रख कर कार्य योजना बनानी चाहिए। हालांकि उन्होंने बिहार में 2015 विधानसभा चुनाव से पहले "आरक्षण की समीक्षा" करने की बात कही थी। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने अपनी चुनावी रैलियों में भागवत के रुख का विरोध किया और 2014 के आम चुनाव में शानदार प्रदर्शन करने वाली भारतीय जनता पार्टी 2015 में बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हार गई।

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केंद्रीय गृह मंत्री और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वासपात्र अमित शाह और भाजपा महासचिव ने तब भागवत के रुख से खुद को अलग करके और यह कहकर नुकसान की भरपाई करने की कोशिश की थी कि मोदी सरकार आरक्षण जारी रखेगी। मोदी ने भी अपने अभियानों में अपनी पिछड़ी जाति की पहचान का प्रदर्शन किया। लेकिन राजद-जनता दल (यूनाइटेड)-कांग्रेस गठबंधन की 178 सीटों के मुकाबले भाजपा 53 सीटों पर सिमट कर रह गई।

कमोवेश हालत वही है। अब महागठबंधन (INDIA) इंडिया बन चुका है। 28 राजनीतिक दल एक साथ आ चुके हैं। इस वजह से आरएसएस प्रमुख का रुख भी बदला है। जो आरक्षण के लिए फिर से विचार करने की वकालत करने वाले अब जातीय आधारित राजनीति के बारे में बोल रहे हैं। बिहार में जातीय जनगणना से चौतरफा हड़कंप मचा है। दूसरी ओर सनातन का पल्लू भी ये पकड़े हुए हैं।

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भागलपुर स्थित महर्षिमेहिं आश्रम का इसी साल 10 फरवरी और फिर 21 और 22 दिसंबर का दौरा, देवघर में 26 दिसंबर को और उससे पहले ठाकुर अनुकूलचन्द्र आश्रम , और इसी महीने 24 तारीख को हरिद्वार कनखल के हरिहर आश्रम आने के पीछे लोग राजनीति से जोड़ रहे हैं। आरएसएस के ही लोग कहते हैं कि इन आश्रमों के करोड़ों शिष्य हैं। कयास लगाया जा रहा है कि सनातन धर्म के नाम पर इन आश्रमों के गुरु अपने अनुयायियों को भाजपा को वोट देने की अपील करेंगे। लेकिन इनका संदेश कितना कारगर साबित होगा ये देखना होगा।

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पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड में ऐसे संदेशों का कितना असर पड़ेगा ये तो आने वाला समय ही बताएगा। बीजेपी विधानसभा चुनावों में इन राज्यों में पिट चुकी है। झारखंड में भाजपा हारी है। पश्चिम बंगाल में टीएमसी का फिर राज कायम हो गया। बिहार में एनडीए से नीतीश कुमार निकल चुके हैं। और महागठबंधन की नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार है। एक दफा राजद को तो एक बार भाजपा को नीतीश कुमार छोड़ चुके हैं। भाजपा आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के माध्यम से सनातन और संत समागम के मार्फ़त जाति आधारित राजनीति को पीछे छोड़ना चाहती है। ये कितना इसमें सफल होते हैं ये तो आगे देखना होगा। यूं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपनी सभाओं में कहते हैं कि गरीब, महिला ,युवा और किसान हमारे लिए देश की सबसे बड़ी जातियां हैं।

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