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मुकेश भारद्वाज का कॉलम बेबाक बोल: स्त्री : संदेश खाली

2024 लोकसभा के लिए चल रहे मतदान के दौरान खबर आती है कि लाखों स्त्रियों को हिम्मत की आवाज देने वाली उस स्त्री के साथ अपराध हुआ। महिलाओं पर अपराध के खिलाफ सबसे मुखर आवाज के साथ ऐसा होने के बाद सबसे ज्यादा नजर आम आदमी पार्टी के अगुआ अरविंद केजरीवाल पर थी।
Written by: मुकेश भारद्वाज | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 18, 2024 05:41 IST
मुकेश भारद्वाज का कॉलम बेबाक बोल  स्त्री   संदेश खाली
संसद परिसर की प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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यह अच्छी बात है कि 2024 के चुनाव के मैदान में सभी पक्ष संविधान की बात कर रहे। संविधान में एक पक्ष स्त्री अधिकारों का भी है। स्त्री अधिकार, उत्पीड़न और स्त्री मुद्दों की संवेदनशीलता को लेकर पार्टी और राज्य बदलते ही विचारधारा बदलत जाती है। ऐन चुनाव के बीच संविधान बचाने का दावा करने वालों से सवाल है कि क्या संविधान मणिपुर, संदेशखाली, कर्नाटक और दिल्ली की महिलाओं को अलग-अलग नजरिए से देखता है? मणिपुर में निर्वस्त्र कर दी गईं महिलाओं की बेपरवाही करने वाले संदेशखाली में महिला परवाही के पहरेदार बन जाते हैं। कर्नाटक में तेरी सरकार-मेरी सरकार की तू-तू-मैं-मैं होती है। स्त्री उत्पीड़न और संवेदनशीलता के ज्यादातर मुद्दे सत्ता के बदसूरत समझौतों के रूप में अपनी अंतिम सांस लेते हैं। एक ही मुद्दे पर राज्य महिला आयोग मुखर रहता है तो राष्ट्रीय महिला आयोग वहां उत्पीड़न के कोई निशान नहीं खोज पाता है। मणिपुर जैसे संवेदनशील मुद्दे को हाशिये पर रख मंगलसूत्र बचाना चुनावी वादा हो जाता है। संविधान बचाने के वादों के बीच स्त्री अधिकार कहां है, का सवाल पूछता बेबाक बोल।

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कुछ संदेश कितने भी सांकेतिक हों, सुकूनदेह होते हैं। किसी ऐसे को उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत दे देते हैं जिनके आसपास के लोग उसकी हिम्मत तोड़ने का काम करते हैं। दिल्ली की सड़कों पर एक स्त्री आधी रात को घूमती थी, महिलाओं के खिलाफ हर जुल्म पर आवाज उठाती थी। उसका काम देख कर उससे बड़ी संस्था (राष्ट्रीय महिला आयोग) से सवाल होते थे कि जब आपको सत्ता के समीकरण देख के मुंह पर ताला लगाए रखना है तो आपके दरवाजे पर ही ताला क्यों न लगा दिया जाए?

2024 लोकसभा के लिए चल रहे मतदान के दौरान खबर आती है कि लाखों स्त्रियों को हिम्मत की आवाज देने वाली उस स्त्री के साथ अपराध हुआ। महिलाओं पर अपराध के खिलाफ सबसे मुखर आवाज के साथ ऐसा होने के बाद सबसे ज्यादा नजर आम आदमी पार्टी के अगुआ पर थी। आम आदमी पार्टी के मुखिया ने एक आदर्श शासन के संदर्भ में जिस तरह शुचिता और नैतिकता की हर उम्मीद तोड़ी, स्त्री मामलों की संवेदनशीलता की सीढ़ी पर खड़े होते ही वे वहां से भी लड़खड़ा कर गिर पड़े।

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उन्हें तो पीड़ित पक्ष को सबसे पहले पुलिस के पास जाने की हिम्मत देनी थी, मामला उनके आवासीय परिसर का था तो उन्हें सामने आ कर प्रेस कांफ्रेंस कर चीजों को सामने रखना था। इतनी सशक्त आवाज को पुलिस तक पहुंचने में जितनी देर लगी, उससे यह समझा जा सकता है कि राजनीति के गलियारे में स्त्री सशक्तीकरण और संवेदनशीलता के मुद्दे पर अभी भी पहली कोशिश समझौते की सड़क पर ही ले जाने की होती है।

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पीड़ित का यह कहना कि अभी मेरे मुद्दे से ज्यादा जरूरी देश का मुद्दा है, ने निराश ही किया। ‘मेरा चरित्रहनन करने वाले भी खुश रहें…।’ ऐसा बयान स्त्री सशक्तीकरण को उसी भाग्यवादी संस्कार में ले जाता है जहां संघर्ष की सड़क पर समझौते के तीव्रगामी मोड़ का निशान दिख जाता है।

आम आदमी पार्टी के अगुआ ने बिना कुछ बोले यही पारंपरिक रवैया अपनाया कि यह हमारी पार्टी और अपनों का मामला है तो फिर संवैधानिक भाषा बोलने की क्या जरूरत? सदियों से यही होता रहा है कि ‘परिवार’ की औरत के शोषण के मसले पर सभी मर्द इकट्ठा होकर पंचायत कर लेते हैं कि इसे न्याय कैसे देना है। जिनकी सत्ता में एक स्त्री मजबूती से आगे बढ़ी, वहीं उसके साथ कोई अपराध हुआ तो फिर उसे अपने लिए खड़ी होने की हिम्मत देते हुए केजरीवाल क्यों नहीं दिखाई पड़े?

2024 की चुनाव प्रक्रिया के पहले इस देश की संसद की नई इमारत में ‘नारी शक्ति वंदन’ कानून बना। इसके पहले मणिपुर में महिलाओं के उत्पीड़न का खौफनाक मामला सामने आया। मणिपुर में जातीय हिंसा में जिस तरह से स्त्री के शरीर को शिकार बनाया गया था, उसे देखते हुए पूरी सत्ता को अपनी शक्ति उस जुल्म के खिलाफ लगा देनी चाहिए थी। लेकिन, सत्ता-पक्ष की ऐतिहासिक चुप्पी ने यकीन दिला दिया कि स्त्री को लेकर सत्ता की संवेदनशीलता अभी तक किताबी बातें हैं और सड़क से संसद तक स्त्री सशक्तीकरण को लेकर सिर्फ भाषायी आभूषण पहनाए गए हैं।

जब मणिपुर में निर्वस्त्र हुईं स्त्रियां दिल्ली की सत्ता की तरफ देख रही थीं तब हर बात में महाभारत और रामायण का उदाहरण देने वाले लोग द्रौपदी के संदर्भ में कृष्ण के कर्त्तव्य भूल गए थे। हर बात पर सीमा पर जाने का जिगर रखने वाले उस सीमाई राज्य को भूल गए जो सामरिक सुरक्षा के लिहाज से भी अहम है।

मणिपुर पर ‘स्वत: अज्ञान’ चुनने वाले सत्ता पक्ष को चुनाव आते ही स्त्री याद आई। सत्ता ने सोचा, स्त्री सुरक्षा के वादे बिना चुनाव अधूरा है। मणिपुर में तो स्त्री के वस्त्र से लेकर परिवार की रक्षा नहीं की गई, लेकिन अब स्त्री के ‘मंगलसूत्र’ की रक्षा का वादा किया गया। यह राजनीतिक दल की संवेदनशीलता का आलम है कि स्त्री-अधिकार के शरीर पर मंगलसूत्र बांध दिया जाता है। घर में ‘सदा सुहागन रहो’ का आशीर्वाद ले रही स्त्री को सत्ता भी संविधान से दूर ले जाकर पूरे घर वाला माहौल देना चाहती है, सुहाग के निशान से अस्तित्व तय कर।

मंगलसूत्र की रक्षा के वादे के बीच कर्नाटक आता है। कर्नाटक के मामले को देख कर पूरे देश और उसकी संस्थाओं को संवादरत होना चाहिए था कि हमसे कहां गलती हुई है कि बड़ी अफसर से लेकर अन्य सशक्त स्त्रियां अपने खिलाफ बलात्कार जैसे हिंसक अपराध को लेकर पुलिस के पास क्यों नहीं जा पातीं?

किसी एक सांसद पर सैकड़ों स्त्रियों के साथ यौन उत्पीड़न का आरोप लगता है, हिंसक दृश्यों के वीडियो पेन ड्राइव में रिक्शों, आटो पर मिलते हैं और हमारी संस्थाओं के अंदर कोई भूचाल नहीं आता है। राज्य की सत्ता में ये, तो केंद्र की सत्ता में वो का गाना गाकर एक पक्ष मंगलसूत्र तो दूसरा संविधान बचाने की बात करता है।

जब तक चुनावों में स्त्री-उत्पीड़न का मुद्दा मणिपुर व संदेशखाली तक चुनिंदा रहेगा तब तक चुनावों के बाद भी स्त्री और संविधान की दूरी बनी रहेगी। जिस पक्ष ने मणिपुर को खारिज किया वह सिर्फ और सिर्फ संदेशखाली को दिखाना चाहता था। उससे बुरा यह हुआ कि संदेशखाली जैसे संवेदनशील मामलों पर भी राजनीतिक समझौतों और साजिश का आरोप दिख गया।

बंगाल में ‘राजभवन’ ने तो पीड़िता का वीडियो सार्वजनिक कर साबित कर दिया कि जब बात स्त्री उत्पीड़न की आएगी तो मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ होगा वाला ही हिसाब चलेगा। स्त्री के हक में फैसला ऐसे समझौतों और रणनीतियों की सूरत में आएगा जहां सशक्तीकरण और संवेदनशीलता का कोई चेहरा नहीं होगा और पितृसत्ता पीड़ित स्त्री का समझौतापरस्त चेहरा सामने कर देगी। इसकी आड़ में बच्चियों से लेकर महिलाओं को सुरक्षा देने वाले कानून खत्म करने की मांग की जाने लगेगी।

जरा याद कीजिए, दिल्ली में महिला पहलवानों का मामला। महिला पहलवानों के उत्पीड़न के आरोप की जांच में इतनी लापरवाही हुई कि एक नाबालिग अपने आरोप से मुकर गई। उस नाबालिग के साथ क्या हुआ, इसकी चिंता को हटा साधु-संतों का एक तबका ‘पाक्सो’ कानून को ही खत्म करने की मांग करने लगा।

आखिर ऐसा क्यों हुआ कि संविधान से मिले एक कानून के खिलाफ साधु-संत खड़े हो गए? सत्ता से जुड़ा हर पक्ष उन महिला पहलवानों के खिलाफ खड़ा हो गया जो देश के लिए पदक लाई थीं। गले में पदक डालने वाली स्त्रियों के उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष से ध्यान भटका कर चुनाव में महिलाओं के मंगलसूत्र की रक्षा का वादा किया जाने लगा।

भाजपा, कांग्रेस हो या आम आदमी पार्टी, सभी संविधान बचाने का वादा कर रहे हैं। स्त्रियों को आखिरी चरणों के मतदान के पहले सभी दलों से पूछना चाहिए कि इस संविधान में हमारी क्या जगह है? क्या संविधान कहता है कि मणिपुर, संदेशखाली, कर्नाटक और दिल्ली महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष के मामलों का ‘स्वत: संज्ञान’ इतना विरोधाभासी होना चाहिए?

स्त्रियों के लिए यह अच्छी बात है कि 2024 के चुनाव के इस चरण तक हर किसी की जुबान पर संविधान है। अब सवाल वो पूछें जिन्होंने संविधान को सबसे कम नुकसान पहुंचाया है, यानी स्त्रियां। सबसे कम नुकसान इसलिए कि सत्ता में उनकी बराबर की भागीदारी अभी तक शाब्दिक अर्थ में वंदनीय ही है, हकीकत के संदर्भ में दर्शनीय नहीं। बात संविधान की उठी है तो मणिपुर से कर्नाटक और संदेशखाली से दिल्ली तक की स्त्रियां पूछ ही लें-स्त्री को लेकर संविधान का संदेश खाली क्यों हो जाता है? क्या कोई पार्टी ‘घर में घुस कर’ संविधान बचाने बनाम स्त्री के अधिकार बचाने का नारा लगाएगी?

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