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मुकेश भारद्वाज का कॉलम बेबाक बोल: चाल, चलन, चेहरा

तीन चरण के मतदान के बाद चुनावी नतीजों पर क्या बात करें जब यही पता नहीं चल रहा है कि कौन सा दल अपनी मूल विचारधारा छोड़ कर किस रंग में रंग चुका है। अखिल भारतीय मतदाताओं को हिंदुत्व की एकल छतरी के अंदर लाने की बुनियादी विचारधारा वाला, कमंडल लेकर निकला दल अब मंडल वाली बात इस तरह से बोलता है कि पहचान करना मुश्किल हो जाता है कि असली कमंडल कौन है और असली मंडल कौन है?
Written by: मुकेश भारद्वाज | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 11, 2024 05:46 IST
मुकेश भारद्वाज का कॉलम बेबाक बोल  चाल  चलन  चेहरा
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मंडल भी मैं, कमंडल भी मैं, धर्मनिरपेक्ष भी मैं तो धर्म की धुरी पर भी मैं। सारे चेहरों के मुखौटे अपने चेहरे पर लगाने का लालच आपके मूल चेहरे को इतना बदरंग कर देता है कि पहचाना ही नहीं जाता। चाल, चलन और चेहरा…तीन चरणों के मतदान होने तक भारतीय राजनीति में जिस तरह मूल्यों को अपने राजनीतिक मुनाफे के हिसाब से मूल्यांकित करने की कोशिश हुई उसका असर यह है कि अब मुख्यधारा के राजनीतिक दल अपना मूल चेहरा खो चुके हैं। चुनावी संसाधनों की गैरबराबरी के बीच अस्तित्व बचाते विपक्ष के विचलन की बात समझ आती है, लेकिन प्रचंड बहुमत लेकर आया सत्ता पक्ष अपने घोषणापत्र को भुला कर विपक्ष के घोषणापत्र के इर्द-गिर्द ही चुनावी घूर्णन कर रहा है। ऐसे में मूल्यों का महत्त्व पता चलता है कि काश अपने मूल चेहरे पर ही टिके रहते। इसके बाद जब आप मूल चेहरे की ओर लौटते हैं तो ‘मेकअप’ का बुरा असर उसकी पूरी तासीर बदल चुका होता है। तीसरे चरण के मतदान तक बात उसी चाल, चलन और चेहरे पर पहुंच गई है कि अपने मूल को बदला क्यों? इसी पर प्रस्तुत है बेबाक बोल।

हम किसी बहरूपिए को जान लें मुश्किल नहीं उस को क्या पहचानिए जिस का कोई चेहरा नहीं -हकीम मंजूर

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2014 की मई से, 2019 और 2019 की मई से ही 2024 का इंतजार होने लगा था। देश में मुफ्त राशन लेने वालों की संख्या ज्यादा है या चुनाव विश्लेषकों की यह अंदाजा लगाना मुश्किल है। चुनाव विश्लेषकों पर इस तंज को लेकर माफी के साथ आगे बढ़ते हैं। कहने का आशय यह है कि विश्लेषण की अत्यधिक खुराक तब दी जाती है जब तथ्य आपको परेशान करते हैं। तथ्यों तक आपकी पहुंच सीमित होती है और अस्तित्व बचाने के लिए बाल की खाल निकालने के अलावा कोई चारा नहीं होता है।

तथ्यों से किसी को क्या और कब परेशानी होती है? चुनाव विश्लेषक 2019 की मई से ही भविष्यवाणी कर रहे थे कि 2024 का चुनाव खास होगा। तो क्या खास दिखा? यही कि तथ्यों से भागने के लिए देश के मुख्यधारा के राजनीतिक दल अपना चाल, चलन और चेहरा बदल रहे हैं। तो क्या 2024 का यह मोड़ चाल, चलन और चेहरा बदलने को न्यायोचित ठहरा रहा है?

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इतिहास में तारीखों की नियति रही है कि उसके लिए कोई अवकाश का दिन नहीं है। हर बदलती तारीख अपना सबक दर्ज करती है, जिसका मूल्यांकन आने वाली तारीखें करती हैं। हर तारीख में एक खंड मूल्य-संकट का होता है। तारीख के साथ खेलने वालों को लगता है कि वो मूल्यों के साथ इस तरह छेड़छाड़ करेंगे कि इतिहास उसे दर्ज करना भूल जाएगा। इतिहास के पास कोई रिक्ति नहीं है। आपने मूल्य-परक राजनीति के संदर्भ में कुछ जोड़ा है या घटा दिया, यह दर्ज हो रहा है।

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खबरिया चैनल तो नाममात्र के चौबीस गुणे सात होते हैं, रात-दिन चंद खबरों का पुनर्चक्रण होता है, यानी वो मूल रूप से ‘दूरदर्शन’ के समय के एक घंटे की ही खबरें दिखाएं तो नागरिकों के ‘सूचना के अधिकार’ को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। बात है मूल चेहरा और तारीखों के तयशुदा श्रमदान की। चुनावों की सरगर्मी के बीच दूरदर्शन ने अपने शुभंकर का रंग भगवा कर लिया। दूरदर्शन के शुभंकर का मूल श्वेत-श्याम रंग बाद में कई बार बदला और लोग इस पर पहले भी बहसतलब हुए।

लेकिन चुनावों के दौरान रंग बदलना वैसा ही है जैसा हिंदुत्व की धुरी पर प्रचंड बहुमत लाने वाली सरकार अति आत्मविश्वास में अपनी धुरी छोड़ कर दूसरे राजनीतिक दल का रंग ओढ़ने को लालायित हो। जिस एक रंग में पूरे देश को रंगने का इरादा था उस पर ‘अटल’ रहने के बजाए इंद्रधनुष के सारे रंग को अपने में समाहित करने का लालच हो जाए।

ये तो रंगरेज बेहतर बताएंगे कि भगवा को थोड़ा और गहरा किया जाए तो वह लाल हो जाएगा। लेकिन, एक बार भगवा को लाल कर दिया जाए तो फिर उसका भगवा होना मुश्किल होगा। मूल रंग से किसी और रंग में रंगरेजी करवाना तो आसान है, लेकिन मूल रंग पर लौटना उतना ही मुश्किल।

तीन चरण के मतदान के बाद चुनावी नतीजों पर क्या बात करें जब यही पता नहीं चल रहा है कि कौन सा दल अपनी मूल विचारधारा छोड़ कर किस रंग में रंग चुका है। अखिल भारतीय मतदाताओं को हिंदुत्व की एकल छतरी के अंदर लाने की बुनियादी विचारधारा वाला, कमंडल लेकर निकला दल अब मंडल वाली बात इस तरह से बोलता है कि पहचान करना मुश्किल हो जाता है कि असली कमंडल कौन है और असली मंडल कौन है?

राजनीतिक इतिहास गवाह रहा है कि जो दल अपनी खास तरह की विचारधारा के कारण ही सत्ता में आए, आगे सत्ता बचाने के लिए सबसे पहले अपनी विचारधारा से ही समझौता किया। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि सबसे आसान है किसी खास विचारधारा के राज का सपना दिखाना और सबसे मुश्किल काम है उस विचारधारा की धुरी पर ही आर्थिक और सामाजिक बदलावों को लाना।

आप सत्ता में आएंगे स्वदेशी विचारधारा की बात कह कर और अर्थव्यस्था थोप देंगे उन्हें, जिनसे तंग आकर लोगों ने आपकी विचारधारा को चुना था। कोई भी राजनीतिक दल सबसे पहले आर्थिक मोर्चे पर नाकाम रहने के कारण ही विचारधारा से विचलित होता है। आर्थिक मोर्चे पर टिकने के लिए आपको अपनी विचारधारा पर टिके रहते हुए नौकरियों का सृजन करना था।

सृजन जैसे मुश्किल काम से बेहतर आपको हर किसी का आजमाया नुस्खा आरक्षण ही भाया। मतदाता एक की रैली में गया तो उसे इतना आरक्षण पकड़ाया गया, दूसरे की रैली में गया तो उससे ज्यादा पकड़ा दिया। तीसरे की रैली से मिली तोहफे की थैली में लिखा था-हमारे यहां हर तरह के आरक्षण तसल्लीबख्श तरीके से दिए जाते रहे हैं, हमारी कोई दूसरी शाखा नहीं है।

अब जब हर कोई आरक्षण की ही बात कर रहा है, और आप उस मामले में मूल वाले को पूरी तरह पराजित नहीं कर पा रहे हैं तो फिर अपने उस मूल पर लौटने की कोशिश करते हैं जिसके लिए जाने जाते हैं। ‘लौट के मूल को आए’ वाले की भी भविष्यवाणी शुरू हो जाती है। जिस तरह एक बच्चे की गतिविधियां सामान्य तौर पर तय होती हैं कि तीन महीने पर पलटेगा, छह महीने पर घुड़केगा और एक साल होने पर चलने की कोशिश करेगा तो आपका भी चक्र तयशुदा दिखेगा।

चुनावी नतीजों की सटीक भविष्यवाणी तो नहीं हो सकती, लेकिन अगर आप अपने मूल मुद्दे से भटकते हैं तो आपके चुनावी चक्र की भविष्यवाणी कोई भी आराम से करने लगेगा। चुनाव के शुरू में आप अलग दिखने की कोशिश करेंगे और मतदाता मुंह बना कर कहेंगे कि पहले वाले यही कर रहे थे। अगले चरण में आप थोड़ा सा पहले वाले होंगे और मतदाता कहेंगे आ गई अक्ल ठिकाने। उसके बाद तो आप अपने मूल स्वरूप में ऐसे दिखेंगे कि मतदाता कहेंगे कि ऐसा बहुरूपिया बनने किसने कहा था कि अपने चेहरे को ही खराब कर बैठे।

यह बात सिर्फ नेताओं के साथ ही नहीं संस्थानों के साथ भी है। राहुल गांधी ने कुछ समय पहले ट्वीट किया था कि सभी विश्वविद्यालयों के कुलपति एक खास विचारधारा के हैं। अब मतदान के तीसरे चरण के ठीक पहले कुलपतियों का कारवां जो अब ‘कुलगुरु’ कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं राहुल गांधी पर कानूनी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

‘कुलगुरुओं’ की यह कार्रवाई उस चुटकुले की याद दिलाती है कि एक आदमी सड़क पर बैठ कर बड़बड़ा रहा था कि यहां का कुलगुरु मूर्ख है। नगर के कोतवाल ने आकर उसे थप्पड़ मारा कि तुमने कुलगुरु को मूर्ख कहा। बेचारे आदमी ने कहा कि मैं तो पड़ोसी देश के कुलगुरु को मूर्ख कह रहा था। कोतवाल ने उसे दूसरा थप्पड़ मारते हुए कहा कि मुझे पता नहीं क्या कि किस देश का कुलगुरु मूर्ख है।

ऐन चुनाव के समय होश में आए कुलगुरुओं ने गिनती के साथ साबित करने की कोशिश की कि वे किस विचारधारा से जुड़े हुए हैं। राहुल गांधी ने किसी खास कुलपति का नाम नहीं लिया था, सिर्फ व्यवस्था पर वार किया था जो हर राजनेता करता है। लेकिन कुलगुरुओं ने व्यवस्था पर वार को इतना खुद पर ले लिया कि राहुल गांधी पर कानूनी कार्रवाई की मांग कर डाली।

चुनावों के समय में ऐसी मांग, चिट्ठी लेकर साहित्यकारों व संस्कृतिकर्मियों का गुट सामने आता रहता था। चेहरा बदलने की इस लड़ाई में कुलगुरुओं ने जिस तरह से अपना नकाब उतार दिया, उसे देख कर लगा कि यहां पर तो राहुल गांधी रणनीतिक रूप से कामयाब हो गए। जो कुलगुरु विद्यार्थियों की शिकायती अर्जियों को इन दिनों देशद्रोह जैसा समझने लगे हैं वे शिकायत करने आ गए…देखो मुझे इस गुट का बोल दिया? हमारी मेधा पर सवाल उठा दिए। पिछले हफ्ते राहुल गांधी को पप्पू साबित करने निकले विद्यार्थियों की मेधा तो पूरे देश के सामने आ गई, अब कुलगुरुओं की मेधा की खैर रहे, इसी दुआ के साथ।

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