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मुकेश भारद्वाज का कॉलम बेबाक बोल: मणिपुर की बात

आजादी के बाद के इतिहास में मणिपुर अभूतपूर्व स्थिति से गुजर रहा है। दो समुदायों की जातीय लड़ाई में सौ से ज्यादा लोगों की जान चली गई तो 35 हजार से ज्यादा लोगों को शरणार्थी शिविरों में रहने के लिए मजबूर कर दिया गया है। मणिपुर में दो समुदायों की हिंसा के बाद राज्य जिस तरह से अदृश्य हो गया, उसने गृह-युद्ध जैसे हालात पैदा कर दिए हैं।
Written by: मुकेश भारद्वाज
Updated: June 24, 2023 00:35 IST
मुकेश भारद्वाज का कॉलम बेबाक बोल  मणिपुर की बात
Manipur Violence: मणिपुर में हिंसा की तस्वीर। (फोटो सोर्स: PTI)
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चुनावों के पहले जिस पूर्वोत्तर को सिर-आंखों पर बिठाया जाता है, वोट मिलते ही वहां के नक्शे से ही आंखें मूंद ली जाती है। दिल्ली केंद्रित सत्ता और आम जनता के लिए आज भी पूर्वोत्तर एक पर्यटन स्थल भर ही है। इतने भयंकर हालात के बाद मदद का जमीनी स्तर पर दिखना तो दूर मदद करने की कोशिश तक नजर नहीं आई है। मणिपुर का आहत समुदाय उस वक्त की सोच रहा है जब राष्ट्रवाद के नाम पर नेता उनके वोट के प्रार्थी थे, और अब राष्ट्र के भुला दिए जाने जैसी स्थिति पर शिविर में शरणार्थी हैं। बेबाक बोल में मणिपुर की बात।

इस वक्त वहां
कौन धुआं देखने जाए
अखबार में पढ़ लेंगे
कहां आग लगी थी
-अनवर मसूद

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हिंसा को ना कहें, हमारी शांति बहाल करें। शांत मणिपुर विकसित मणिपुर।
मुंबई के आजाद मैदान में वे लोग जुटे थे, जिनका अस्तित्व मणिपुर में हिंसा की आग से झुलस रहा था। उनके हाथों में इसी तरह के पोस्टर थे। मणिपुर की सिनेमा कलाकार लिन लेश्राम भी मणिपुर में शांति बहाली की अपील करने वाले पोस्टर लेकर खड़ी थीं। एक अंग्रेजी अखबार के ‘पेज थ्री’ पर वैसी खबर थी जो आम तौर पर अखबारों के पहले पन्ने पर थी या होती है। लेकिन, जब पहले पन्ने की खबरों पर भी सत्ता के जिम्मेदार आंखें मूंद लें तो फिर उसका असर ‘पेज थ्री’ तक आता है। मनोरंजन और संपन्नता के पन्नों पर भी मणिपुर में फैला स्याह अपना अंधेरा दिखा रहा हैं।

मणिपुर में जातीय संघर्ष के साथ बहुत सारी गलतफहमियां भी है

‘मैरी काम’ और ‘रंगून’ जैसी फिल्मों से जुड़ी अदाकार लिन लेश्राम का कहना था कि मणिपुर में जातीय संघर्ष के साथ बहुत सारी गलतफहमियां भी फैली हुई हैं। लिन के अनुसार, यह कोई मजहबी नहीं बल्कि सामुदायिक लड़ाई है। लिन और वहां मौजूद लोगों की चाहत थी कि सरकार इस पर कुछ बोले। जब हम चारों तरफ से बर्बाद हो रहे हैं तो हमारी थोड़ी फिक्र कीजिए, हमें थोड़ी मोहब्बत दीजिए। आजाद मैदान में खड़े लोगों का संदेश था कि हम बड़ी विविधताओं से भरे विविध संस्कृति वाले देश हैं। इस विविधता को हम अपनी कमजोरी नहीं बनने दें, यह हमारी सबसे बड़ी मजबूती है।

आजाद मैदान से जिस विविधता को मजबूत करने की बात कही जा रही है, क्या वह मणिपुर के मसले पर कहीं दिख रही है? लिन का आरोप है कि रिचा चड्ढा जैसे एक-दो कलाकारों को छोड़ कर पूरे बालीवुड ने भी इस पर खामोशी ओढ़ ली है। मणिपुर से जुड़े कई कलाकारों व उद्यमियों ने भी दो महीने से जल रहे मणिपुर पर राजनीतिक और सामाजिक चुप्पी पर सवाल उठाए हैं।

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भारत अगर विविधताओं से भरा देश कहा जाता है तो उसमें बड़ी भूमिका पूर्वोत्तर के राज्यों की है। दुखद है कि देश की राजनीति से लेकर आम जनता तक इन राज्यों को पर्यटन का हिस्सा भर ही मानती है। इनका सुख सिर्फ इसमें दिख सकता है कि श्रीनगर और आसपास के इलाकों में पर्यटकों की कितनी भीड़ है तो इनका दुख सिर्फ इसमें दिख सकता है कि इस बार छुट्टियों में घूमने के लिए आपके पास एक राज्य कम हो गया है। लोग, जिसमें राजनेता का वर्ग भी शामिल है वहां जाकर किराए पर लिए जनजातीय समुदाय के वस्त्र पहन कर हाथ में फूलों का टोकरा लेकर अपने सोशल मीडिया खाते को अद्यतन नहीं कर पाएंगे। वहां की पहाड़ी, वादियों के साथ हैशटैग ‘प्रकृति बुला रही है’ नहीं लगा पाएंगे।

भारत से लेकर यह दुनिया भर की त्रासदी है कि जिन जगहों पर प्रकृति मेहरबान हुई है, संसाधनों से भरपूर किया है, उनमें से ज्यादातर को राजनीति की वजह से तबाह होना पड़ता है। प्रकृति और राजनीति का यह रिश्ता मणिपुर में और विखंडित दिख रहा है, क्योंकि म्यांमार से सटे होने के कारण मणिपुर प्राकृतिक, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होते हुए देश की राजनीति के जिम्मेदारों से सबसे ज्यादा मेहनत मांग रहा है। और, कोई भी उसके लिए कुछ करने को तैयार नहीं दिख रहा है।

देश की केंद्रीय सत्ता और किसी भी तरह के हैशटैग की धारणा तय करनेवाला वर्ग मणिपुर के साथ किराये के जनजातीय परिधान की तरह ही व्यवहार कर रहा है। इस स्तंभ में जिक्र किया गया था कि शायद यह पहली बार है जब पूर्वोत्तर के राज्यों में चुनाव की चर्चा उत्तर प्रदेश की चाय की दुकानों में हो रही थी। दिल्ली दरबार के केंद्रीय नेताओं का वहां जमावड़ा लगा हुआ था। लग रहा था, अब पूर्वोत्तर देश की मुख्यधारा की राजनीति में आ जाएगा।

दिल्ली के जंतर मंतर पर इनकी मांगों को सुनने के लिए तुरंत केंद्रीय प्रतिनिधि आ जाएंगे। लेकिन, मणिपुर की आग की लपटें जब दिल्ली से भी दिख रही हैं तब चारों ओर ऐसी चुप्पी बता रही है कि भारतीय लोकतंत्र अब चुनाव जीतने की मशीन भर बनता जा रहा है। जिसने भी सत्ता पा ली उसके पास सिर्फ यह देखने के लिए आंख है कि कहां और कैसे वोट जुटाया जा सकता है। चुनाव जीतने के बाद किसी के दर्द की आवाज इनके कान तक नहीं पहुंचती। आंख, कान मिला कर सारी ज्ञानेंद्रियों का काम बस वोट जुटाने का ज्ञान हासिल करना भर है।

मणिपुर में मुख्य जातीय लड़ाई मैतेई और कुकी के बीच की है

मणिपुर में मुख्य जातीय लड़ाई मैतेई और कुकी के बीच की है। खास प्रावधानों के कारण लगने लगा कि वहां के प्राकृतिक संसाधनों से लेकर सरकारी नौकरियों तक पर कुकी का कब्जा है। इन सब कारणों से मैतेई समुदाय ने खुद को अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध करने की मांग की ताकि वे पहाड़ी इलाकों पर जमीन-जायदाद खरीद सकें। इसी मांग के साथ उनका कुकी के साथ टकराव हुआ जो आज सत्ता की गैर-जिम्मेदारी के कारण इतना विकराल रूप धारण कर चुका है। जब, केंद्रीय राज्यमंत्री राजकुमार अंजन सिंह के घर को ही आग के हवाले कर दिया गया तो जनजातीय समुदाय के आम नागरिकों को हुए नुकसान का अंदाजा लगाया जा सकता है।कुकी समुदाय मुख्यमंत्री बीरेन सिंह को इसका जिम्मेदार मान रहा है, और बदतरी का आलम यह है कि बीरेन सिंह जिस मैतेई समुदाय से आते हैं उनके बीच भी अपनी साख गंवा चुके हैं।

आम जनजातीय समुदायों से अलग भी है मैतेई समुदाय

इसका कारण यह है कि दोहरे इंजन की सरकार बनाने के लिए भाजपा ने दोनों समुदायों के सहयोगी होने का भरोसा दिलाया। ऐसा माहौल बनाया जाने लगा मानो दोहरे इंजन की सरकार ही सारी समस्याओं का हल है। मैतेई समुदाय आम जनजातीय समुदायों से अलग भी है। इसमें हिंदू, कथित बड़ी जाति, कथित छोटी जाति, मुसलमान, ईसाई सभी तरह की आबादी है। भाजपा के राष्ट्रवाद के झंडे के तले आने के लिए यह तैयार भी हो गया। लेकिन, ये अपने भूगोल को किसी भी तरह से नकार नहीं सकते थे। इन्हें उसी भूगोल में राजनीतिक और आर्थिक हित देखने थे। मैतेई समुदाय राज्य और केंद्र सरकार से जिस हित के जल्दी पूरी होने की उम्मीद लगाए बैठा था, कुकी उसी के विद्रोह में खड़े हो गए। बीरेन सिंह ने वोट जिस आधार पर भी हासिल किया, लेकिन उनकी पूरी जिम्मेदारी थी कि वे दोनों समुदायों में विश्वास बहाली की ओर कदम बढ़ाते। उनका हर गैरजिम्मेदार कदम दोनों समुदायों के बीच खाई और चौड़ी करता गया।

जब कोई राज्य या समुदाय मुसीबत में होता है तो वह अपने राजनीतिक जिम्मेदारों की तरफ उम्मीद से देखता है। लेकिन, लग रहा कि आज के समय में मणिपुर किसी की जिम्मेदारी नहीं है। दो समुदाय लड़ रहे हैं और राज्य पूरी तरह से गायब है। कुकी और मैतेई ऐसी आदिम अवस्था में लड़ रहे हैं जहां सिर्फ भूगोल होता था, न कोई राज्य न कोई कानून। आधुनिक राजनीति शास्त्र की भाषा में ऐसी लड़ाई को गृहयुद्ध कहा जाता है, जहां राज्य शून्य हो जाता है।

मणिपुर में गृहयुद्ध जैसे हालात हैं। वहां के मुख्यमंत्री पर किसी को भी भरोसा नहीं रहा। राजनीतिक विद्वान अस्सी के दशक की नजीर दे रहे हैं जब इंदिरा गांधी ने पंजाब में अपनी ही दरबारा सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। लेकिन, आज के दौर में मणिपुर इस मामले में बेनजीर हो चुका है। जब सरकार के रूप में शून्य दिखाई दे तो फिर किसे बर्खास्त किया जाए? जिम्मेदारी की भी एक शक्लो-सूरत होती है, मणिपुर में उस सूरत का कोई मिल भी नहीं रहा जिसे जिम्मेदार माना जाए।

दिल्ली और उससे सटे मैदानी राज्यों की फितरत है कि उनकी हर समस्या को राष्ट्रीय समस्या मान लिया जाए। यहां ज्यादा गर्मी, ज्यादा बारिश पर पूरा देश दुखी हो, लेकिन पूर्वोत्तर की किसी समस्या को सिर्फ पर्यटक की तरह ही देखा जाए। कितने दिनों तक वहां घूमने नहीं जाया जा सकता है। मणिपुर में एक बार फिर साबित हुआ कि दिल्ली केंद्रित राजनीति के लिए पूर्वोत्तर सिर्फ चुनावी पर्यटन भर है।

आप किसी की मदद करने में सफल हो पाएं या नहीं, यह दूसरी बात है लेकिन मदद करते हुए दिखने चाहिए। मणिपुर का पूरा समुदाय दिल्ली से आहत है कि कोई मदद करते हुए दिखा भी नहीं। इस आहत कौम की आह कब और कैसे सुनी जाएगी यह देखने की बात है।

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