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मुकेश भारद्वाज का कॉलम बेबाक बोल: नी मैं आपे पप्पू होई…

चुनाव में कोई भी दल जीते, लेकिन हर क्षेत्र में देश की बुरी तरह हार रही लोकतांत्रिक संस्थाओं की असल सूरत इसी समय देखने को मिल रही है। चुनाव जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है पीछे की ओर कदम बढ़ाती राजनीतिक शुचिता अपना अस्तित्व बचाने की गुहार कर रही है।
Written by: मुकेश भारद्वाज | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 04, 2024 05:33 IST
मुकेश भारद्वाज का कॉलम बेबाक बोल  नी मैं आपे पप्पू होई…
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खाक आईना दिखाती है कि पहचान में आ अक्स-ए-नायाब मिरे दीदा-ए-हैरान में आ -जेब गौरी

हिंदू-मुसलमान, जाति, आरक्षण की धुरी पर घूर्णन कर रहे भारतीय चुनाव में एक निजी विश्वविद्यालय के विद्यार्थी आ जाते हैं। हमें पता चलता है कि जाति-धर्म के मसलों पर उलझ कर हम अपने शिक्षा संस्थानों की बात करना तो भूल ही गए हैं। एक राजनेता को ‘पप्पू’ साबित करने में अपनी ऊर्जा झोंक रहे जनसंचार माध्यमों को देखते हुए हमें यह नहीं देखने दिया गया कि हमारे बच्चे अज्ञानी और अनागरिक बनने के दीक्षांत समारोह में खड़े हैं। हमारे अपने युवा ही ऐसे ‘पप्पू’ बनने की ओर अग्रसर हैं जहां लाखों की फीस देने के बाद भी उनके सोचने-समझने का स्तर न्यूनतम है। गांवों के स्कूल के बच्चे दो का पहाड़ा नहीं जानते तक की रिपोर्टिंग से लेकर लाखों की फीस वाले कालेज के बच्चे हिंदी और अंग्रेजी के शब्द शुद्ध नहीं पढ़ सकते के सफर पर प्रस्तुत है बेबाक बोल।

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2024 के चुनाव को जहां कुछ समय पहले तक एकतरफा माना जा रहा था, वहीं अब तीसरे चरण के मतदान तक आते-आते किसी के लिए कुछ भी कहना मुश्किल होता जा रहा है। सात चरणों तक चलने वाली लंबी चुनावी प्रक्रिया पर सवाल भी उठे थे। अक्सर ऐसे सवालों पर देश की बड़ी जनसंख्या और सीमित संसाधनों का ब्रह्मास्त्र चला दिया जाता है। लेकिन, दो चरण के बाद ही जिस तरह की जमीनी हकीकत सामने आ रही है उसे देख कर लगता है कि अच्छा ही हुआ कि चुनाव प्रक्रिया इतनी लंबी चली।

चुनाव में कोई भी दल जीते, लेकिन हर क्षेत्र में देश की बुरी तरह हार रही लोकतांत्रिक संस्थाओं की असल सूरत इसी समय देखने को मिल रही है। चुनाव जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है पीछे की ओर कदम बढ़ाती राजनीतिक शुचिता अपना अस्तित्व बचाने की गुहार कर रही है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की कुलपति का एक साक्षात्कार सामने आया, जिसमें सवाल-जवाब के दौरान ‘मुफ्तखोर’ विद्यार्थियों को लेकर उनकी चिंता दिखी। देश के इस ‘प्रीमियम’ (इस शब्द को अंग्रेजी में लिखना जरूरी है क्योंकि इसका अनुवाद ‘उत्कृष्ट’ इस शब्द के साथ न्याय नहीं करेगा) विश्वविद्यालय के पिछले दस साल के कुलपतियों को देखेंगे तो उनकी दिलचस्पी पुस्तकालय और प्रयोगशाला से ज्यादा विश्वविद्यालय परिसर में ‘युद्धक टैंक’ लगाने की ज्यादा रही है।

जेएनयू जैसे उच्च शिक्षा संस्थान का मकसद शोधार्थी तैयार करना होता है। शोध और ज्ञान कोई मशीनी काम नहीं है या न ही कोई दौड़ प्रतियोगिता है कि कितने समय में पूरा कर लिया। अब ज्ञान और शोध का बोरिया-बिस्तर समेटिए। जब देश की सेना के लिए चार साल का वक्त ही काफी मान लिया गया है तो फिर विश्वविद्यालयों में तो चार साल से ज्यादा पढ़ने वाले, शोध करने वाले ‘शिक्षावीर’ युवा बोझ ही माने जाएंगे।

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इन दिनों जैसे पैदल चलने वाले कदम बढ़ाने से ज्यादा ‘स्मार्ट वाच’ में अपने कदमों को गिनते हैं, उसी तरह ज्ञान और शोध का भी ‘स्मार्ट’ तरीका खोजा जाने लगा है। पीएचडी में दाखिले के लिए योग्यता तो आसान की जा रही है, लेकिन संसाधन इतने कम किए जा रहे हैं कि इसमें शोध कैसे हो, इस विषय पर कई शोध हो सकते हैं।

जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों की साख को देश के संसाधनों पर बोझ बताने की विफल कोशिश होती रही है, लेकिन ‘करत-करत अभ्यास के’ वाली कहावत और सत्ता की कोशिशों को देखेंगे तो कितने दिन तक इसके बचे रहने की उम्मीद पाली जा सकती है? अब हम कदमों को गिनने से ज्यादा चलने को अहम मानने वाली जेएनयू जैसी सरकारी संस्था से निकल कर उस ‘स्मार्ट’ विश्वविद्यालय की ओर चलते हैं जिसकी शिक्षा-दीक्षा सरकार के लिए कोई बोझ नहीं है। इसके उलट कोई विद्यार्थी वहां ज्यादा दिनों तक रह कर किसी और तरह का ‘ज्ञान’ हासिल करना चाहता है तो वह मुफ्तखोरी नहीं कही जाएगी, वह तो मुनाफा है।

अब एक स्थिति की कल्पना करते हैं। चुनावों के इस समय में जेएनयू, एचसीयू, डीयू के विद्यार्थी कांग्रेस या किसी अन्य विपक्षी दल के घोषणापत्र के समर्थन में निकल कर सत्ता पक्ष वाली पार्टी के मुख्यालय तक पहुंच जाएं। जो बात सत्ता पक्ष के घोषणापत्र में कही भी नहीं गई है उसे पोस्टर में लिख कर नारे लगाएं। इसके बाद क्या होगा? इन विद्यार्थियों पर अनगिनत मुकदमों की बाढ़ आ जाती। जिस ‘अर्बन नक्सल’ शब्द को संसद में गृह मंत्रालय की ओर से खारिज कर दिया गया था, उन्हें उसी का खिताब दिया जाएगा।

ऊपर जिस स्थिति की कल्पना की गई, अप्रत्याशित रूप से एक निजी विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने ऐसा किया। वे कांग्रेस के घोषणापत्र के खिलाफ प्रदर्शन करने पहुंचे। भारतीय जनता पार्टी के आइटी सेल के प्रमुख ने इस प्रदर्शन के एक हिस्से को ट्वीट करते हुए इसे कांग्रेस के क्रूर कर (संपत्ति, विरासत) की प्रस्तावना के खिलाफ स्वागत योग्य कदम बताया। उनके अनुसार पहली बार के मतदाता सूचना पर आधारित विवेक सम्मत फैसला ले रहे हैं न कि कुतर्कों से लिपटे किसी परोसे हुए विचार के आधार पर।

यह दूसरी बात है कि एक टीवी चैनल के पत्रकार ने वहां मौजूद विद्यार्थियों से उन पोस्टरों के बारे में पूछना शुरू कर दिया जो उनके हाथ में मौजूद थे। लाखों की फीस लेने वाले विश्वविद्यालय के विद्यार्थी पोस्टर पर लिखे हिंदी के शब्दों को ठीक से पढ़ भी नहीं पा रहे थे। अब इस पंक्ति के बाद कुतर्क हो सकता है कि इन बच्चों को हिंदी-विंदी पढ़नी नहीं आती। ये विद्यार्थी अंग्रेजी के ‘अर्बन नक्सल’ और ‘वल्चर’ जैसे शब्द भी नहीं पढ़ पा रहे थे। टीवी स्क्रीन पर उनकी समझ का स्तर देख कर देश के हर अभिभावक को चेत जाना चाहिए कि जेएनयू जैसी संस्थाओं को खारिज कर शिक्षा का कौन सा ढांचा तैयार किया जा रहा है।

चुनावों के समय में ऐसे दृश्य आते रहते हैं जहां भाड़े पर लाए गए प्रदर्शनकारियों को यह पता नहीं होता कि वे किन मुद्दों पर नारेबाजी कर रहे हैं। यह मामला चौंकाने के साथ डराने वाला है। ये कोई हाशिये पर पड़े, दो रोटी के लिए मशक्कत करने वाले लोग नहीं हैं। ये एक विश्वविद्यालय के विद्यार्थी हैं। कई अभिभावक अपने खेत बेच कर बच्चों को पढ़ने के लिए यहां भेजते हैं। राजनीतिक समझ तो दूर की बात इन्हें हिंदी और अंग्रेजी के सामान्य अक्षरों का मतलब पता नहीं।

हमें याद नहीं कि पिछले किस चुनाव में स्कूलों और विश्वविद्यालयों की स्थिति को प्रमुख मुद्दा बनाया गया था। बेरोजगारी और महंगाई से तो आगे हम निकल भी नहीं पाए थे कि जाति, आरक्षण और मजहब में उलझे रह गए। स्कूल, कालेज छोड़ हिंदू-मुसलमान के लिए लड़ने लग गए। हर दल आरक्षण को अपना ब्रह्मास्त्र बना चुका है। यहां तक कि आरएसएस को भी अपनी विचारधारा को अल्पकालिक स्मृति लोप में भेज कर बोलना पड़ा कि वह कभी आरक्षण के खिलाफ नहीं रहा है।

हमारा सवाल यह है कि दोनों पक्ष जो आरक्षण पर उलझा पड़ा है वह आरक्षण लागू करेगा कहां? आरक्षण तो देश के सांस्थानिक संसाधनों में ही लागू करना होगा। लेकिन, जब विश्वविद्यालय और नौकरी के संस्थान ही नहीं बचेंगे तो एक शून्य में आरक्षण लेकर हम करेंगे क्या? शून्य होते संसाधन और आरक्षणों की बढ़ती श्रेणी और फीसद को लेकर हम सवालयाफ्ता क्यों नहीं होते?

भारत जैसी बड़ी जनसंख्या और 80 करोड़ मुफ्त राशन लेने वाली जनता के देश में सत्तर सालों में दूसरा जेएनयू तो तैयार हो नहीं पाया, लेकिन ऐसे अनगिनत विश्वविद्यालय खड़े कर दिए गए जो लाखों की फीस लेकर हमारे बच्चों को अनागरिक व अज्ञानी होने के दीक्षांत समारोह में खड़ा कर दे रहे हैं। शिक्षा के ढांचे में बदलाव के नाम पर दीक्षांत समारोह की पोशाक को बस ब्रितानी समय के काले चोगे से बदल कर लड़कियों के लिए साड़ी और लड़कों के लिए कुर्ता-पायजामा कर दिया गया है। साड़ी और कुर्ते के बदलाव के साथ बढ़ती फीस, घटती शोध की सीट, संसाधनहीन पुस्तकालयों पर हमारी नजर पड़ रही है क्या?

देश में पिछले दस सालों की राजनीति में उम्मीद तो व्यवस्थामूलक बदलाव की थी। अफसोस सत्ताधारी दल से लेकर जनसंचार के साधनों की ऊर्जा एक नेता को ‘पप्पू’ साबित करने में खर्च होने लगी। फिर जनता का ध्यान कहां जाता कि उसके बच्चों के लिए किस ढांचे के विश्वविद्यालय और स्कूल कालेज सही हैं। लेकिन, आज टीवी चैनल की एक रिपोर्ट हमें चौंका देती है। राहुल गांधी जो हैं, सो हैं।

लेकिन, बुनियादी मुद््दाविहीन राजनीति और जनसंचार के साधनों के जरिए हमारे अपने बच्चे ही ‘पप्पू’ बनने की कगार पर हैं। इनमें उन बच्चों का कोई दोष नहीं है जो समाचर चैनल पर अपने कालेज की ‘रैंकिंग’ का प्रदर्शन कर रहे हैं। उनके देश की राजनीति और अभिभावकों ने उन्हें यही दिया है। अभिभावकों को भी कहां पता था-पप्पू, पप्पू कर दी नी मैं आपे पप्पू होई…।

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