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मुकेश भारद्वाज का कॉलम बेबाक बोल: तू शायर तो नहीं…

चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर लंबे समय से चल रही बहस के दौरान हतप्रभ करने वाला मोड़ तब आया जब ‘विद्युत की गति’ से चुने गए उस वक्त के अकेले चुनाव आयुक्त अरुण गोयल ने अपना इस्तीफा सौंप दिया। गोयल की नियुक्ति की प्रक्रिया इतनी तेज थी कि अदालत तक ने सवाल उठा दिए थे।
Written by: मुकेश भारद्वाज | Edited By: Bishwa Nath Jha
Updated: March 23, 2024 06:15 IST
मुकेश भारद्वाज का कॉलम बेबाक बोल  तू शायर तो नहीं…
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शाइरी कार-ए-जुनूं है आप के बस की नहीं वक्त पर बिस्तर से उठिए वक्त पर सो जाइए -जावेद सबा

ईवीएम पर शायरी से सवाल का जवाब देने वाले मुख्य चुनाव आयुक्त से कहना चाहते हैं कि वहां कोई यह भी गाना गा सकता था-दुश्मन न करे दोस्त ने ये काम किया है…। उम्मीद की जाती है कि आप सबके दोस्त हों, लेकिन पिछले समय से आरोप लगते रहते हैं कि आप एक ही पक्ष को अपना दोस्त मानते हुए दूसरे पक्ष को अक्षरश: विपक्ष मान लेते हैं। छवि प्रबंधन के इस युग में निजी नायकत्व के बरक्स चुनाव आयोग से लेकर देश के सबसे बड़े सार्वजनिक बैंक एसबीआइ की छवि जिस तरह से धूमिल हुई , वह अब इतिहास में दर्ज है। ऐन चुनाव के पहले विद्युत की गति की नियुक्ति वाले चुनाव आयुक्त का इस्तीफा हो, सुप्रीम कोर्ट में एसबीआइ की दलील या चुनाव के पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री का इस्तीफा। शायरी के बरक्स लोकतांत्रिक संस्थाओं की छवि पर प्रस्तुत है बेबाक बोल।

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चुनाव आयोग के परीक्षार्थी ने रात भर ईवीएम पर तैयारी की थी। यूं तैयारी की मानो सवाल पत्रकार नहीं विपक्ष पूछेगा। जैसे वह सरकार के प्रवक्ता हों और विपक्ष के किसी आरोप का जवाब देना उनका पहला धर्म हो। खैर, ईवीएम पर तैयारी के उन्हें पूर्णांक मिल सकते हैं। वहीं, एक ऐसा सवाल आ गया जिसे उन्होंने पाठ्यक्रम से बाहर का ही मान लिया। ईवीएम से भी अहम एक सवाल था चुनाव आयोग की निष्पक्षता का। पत्रकार ने सवाल पूछा कि आपने घृणा फैलाने वाले भाषण के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही है। लेकिन, देखा गया है कि विपक्ष के घृणा वाले भाषण पर तो चुनाव आयोग सक्रिय हो जाता है, लेकिन सत्ता पक्ष के जुड़े ऐसे मामलों को नजरअंदाज कर देता है।

पत्रकारिता के लिहाज से यह साधारण सवाल था, जिसके ऐसे ही जवाब की उम्मीद होती है कि आरोप गलत है, हम पूरी निष्पक्षता से काम करते हैं वगैरह। लेकिन पिछले कुछ समय में संस्थाओं का यह हाल हो गया है कि यह अति साधारण सवाल पत्रकारिता के साहस के बिल्ले के साथ वायरल हो गया। सोशल मीडिया पर शायरी की वाह-वाह पर तुरंत पत्रकार की वाह-वाह हावी हो गई।

हमने इस स्तंभ में पत्रकारिता को लेकर एक बात पर जोर दिया है कि पत्रकारिता एक ‘साधारण’ काम है। सत्ता व संस्थाओं से आपको कुछ ‘साधारण’ से सवाल पूछ लेने होते हैं, उसी में उद्देश्य पूरा हो सकता है। इसी तरह सरकारी संस्थाओं के अध्यक्षों की भी पहली योग्यता उनके साधारण बने रहने में होती है। अपने तकनीकी काम को नियमानुसार पूरा करना। लेकिन जब नियम टूट कर ‘विद्युत की गति से’ नियुक्ति होती है और अदालत भी सवाल खड़े कर देती है तो वह साधारणता टूटती है।

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बजरिए चुनाव आयोग हमारा मकसद उन सभी संस्थाओं पर बात करना है, जिनकी लोकतांत्रिक छवि टूट रही है। वर्तमान समय को कई विद्वानों ने छवि प्रबंधन युग की संज्ञा दी। इसका अर्थ है सजगता और सतर्कता के साथ सार्वजनिक जीवन में किसी की पहचान का निर्माण करना। आप निजी जीवन में कैसे भी हों, लेकिन सार्वजनिक जीवन में सत्यमेव जयते, सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं जैसी छवि ही बननी चाहिए।

ज्यों-ज्यों राजनीति व अन्य संस्थाओं के अगुआओं ने निजी छवि प्रबंधन की रणनीति पर चलना शुरू किया त्यों-त्यों लोकतंत्र से जुड़ी संस्थाओं की छवि पर सवाल उठने लगे। संस्था से व्यक्ति नहीं व्यक्ति से संस्था की मानसिकता ही तैयार की जाने लगी। पिछले लंबे समय से देश में राजनीतिक परिवर्तन का दौर चल रहा है। एक सवाल यह है कि राजनीतिक परिवर्तनों के इस दौर में संवैधानिक संस्थाओं की क्या स्थिति है? इस सवाल को पूछते ही उदाहरण के रूप में ‘विद्युत की गति’ से भारत का केंद्रीय चुनाव आयोग सामने आकर खड़ा हो जाता है।

चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर लंबे समय से चल रही बहस के दौरान हतप्रभ करने वाला मोड़ तब आया जब ‘विद्युत की गति’ से चुने गए उस वक्त के अकेले चुनाव आयुक्त अरुण गोयल ने अपना इस्तीफा सौंप दिया। गोयल की नियुक्ति की प्रक्रिया इतनी तेज थी कि अदालत तक ने सवाल उठा दिए थे। गोयल का इस्तीफा तब सौंपा गया था जब लोकसभा चुनावों की घोषणा होनी थी और आयोग में एक पद पहले से रिक्त था।

चुनाव आयोग पर आरोप लग रहे थे कि वह सत्ता पक्ष के नेताओं के आपत्तिजनक भाषणों को तो एक कान में घुसने भी नहीं देता, लेकिन दूसरे कान से वह भाषण भी सुन लेता है जो विपक्ष के नेता ने दिया भी नहीं और उन्हें संभल कर बोलने की चेतावनी दे डालता है। भारत में अभी सत्ता पक्ष से लेकर जनसंचार के कई माध्यम विपक्ष को बहुत ही गैरजरूरी सा मानते हुए दिखते हैं। लेकिन, चुनाव आयोग व ऐसी ही अन्य संस्थाओं ने विपक्ष की अहमियत बताई है। इनके अस्तित्व के लिए विपक्ष जरूरी है। अगर विपक्ष के नेता नहीं हों तो फिर चुनाव आयोग संभल कर बोलने के लिए नोटिस किसे भेजेगा?

विपक्ष तो छोड़िए इसी देश की अदालत में लोक पर ही सवाल उठा दिए गए थे। चुनावी बांड के मसले पर सीधे तर्क दे दिया गया था कि जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि चुनावी बांड में किसने किस पार्टी को पैसे दिए। एक संवैधानिक संस्था में दूसरी संवैधानिक संस्था के प्रतिनिधि कहना चाह रहे थे कि अब लोकतंत्र में जनता के पास सिर्फ कर्त्तव्य बचा है।

अच्छे नागरिक की तरह वोटे देने का कर्त्तव्य। जनता सुबह-सुबह दिन के उजाले में जाए, वोट देने वाली मशीन पर बीप सुन कर वापस आए और नीले निशान वाली अंगुली के साथ सेल्फी खिंचवाए। उसके बाद रात में राजनीतिक दल उनके वोटों की सौदेबाजी कर सूरज उगने तक दूसरी सरकार बना दें। रातों-रात एक राजनीतिक दल के नेता दूसरे राजनीतिक दल के साथ सरकार बना लेते हैं, एक मुख्यमंत्री शान से नौवीं बार शपथ लेने चले जाते हैं। विधायकों को रिसार्ट और होटलों में नजरबंद रखा जाता है। यह सब क्या सिर्फ और सिर्फ जनता की भलाई के लिए होता है? राजनेताओं का इसमें कुछ स्वार्थ नहीं होता है? क्या इसमें बड़ी पूंजी की लेनदेन का शक नहीं होता?

राजनेता चुनाव किसी और के साथ लड़ते हैं, कुछ दिनों बाद सरकार किसी और के साथ बना लेते हैं। इस बढ़ती प्रवृत्ति को देख कर तो यह और भी जरूरी लगने लगा है कि जनता को जरूर जानना चाहिए कि राजनीतिक दलों के पास चुनाव के लिए पैसा कहां से आ रहा है। लोकतंत्र के लिए चुनाव में आर्थिक पारदर्शिता रीढ़ की हड्डी की तरह होती है। इसके बिना लोकतंत्र की इमारत पीसा की मीनार की तरह झुकी दिखने लगेगी, जाहिर सी बात है सत्ता पक्ष की तरफ।

अब आते हैं, सरकार के बाद जनता का सबसे बड़ा भरोसा सरकारी बैंक पर। इनका छवि भंजन तो भारत के बैंकिंग इतिहास में अलहदा है। जब हमारे नेता डिजिटल इंडिया का उदाहरण देते हैं, कृत्रिम बौद्धिकता को लेकर हम विश्व गुरु होने का दावा कर रहे होते हैं तो बैंक चुनावी बांड खरीदने वालों के नाम जारी करने के लिए अपनी छवि कितनी खराब कर चुका है, अब यह इतिहास का हिस्सा है।

चुनावी बांड और एसबीआइ की बीच बहस में जब चुनाव आयुक्त इस्तीफा देते हैं तो चौंकना स्वाभाविक था। संस्था की बहस में जब व्यक्ति का इस्तीफा होगा तो कई तरह के सवाल उठेंगे। इस्तीफे की वजह सार्वजनिक नहीं हुई तो बहुविकल्पीय प्रश्नों के अपने-अपने तरह के उत्तर खोजे गए। पहला प्रश्न कि क्या यह इस्तीफा व्यक्ति ने अपने जमीर को बचाने के लिए दिया? कुछ ऐसी स्थितियां थीं जो वे स्वीकार नहीं कर पा रहे थे? दूसरा प्रश्न कि क्या यह इस्तीफा जमीर को गिराने के लिए था? जिस तेजी से नियुक्ति उसी तेजी से विदाई। यानी, अभी इस्तीफे से बहस की दिशा मुड़ जाएगी, इसलिए कुर्बानी दी गई?

खासकर सत्ता पक्ष के खिलाफ बन रहे रुझानों के लिए इस्तीफा रामबाण बन रहा है। लंबे समय तक मुख्यमंत्री हर तरफ नाकाम रहते हुए प्रचंड बहुमत का दावा करते रहें और अचानक से ऐन चुनावों के पहले इस्तीफा दे दें? क्या लोकतंत्र में संस्थाएं इतनी गैरजिम्मेदार होती हैं कि ऐन परीक्षा के वक्त, सवालों के जवाब देने के वक्त अच्छा तो हम चलते हैं, कह कर सारे सवालों को दफन कर दिया जाए।

राजनेताओं व संवैधानिक संस्थाओं के सदस्यों का देर से व रहस्यमय इस्तीफा लोकतंत्र के साथ अन्याय है। न तो पर्ची देख कर चौंका दिया वाला मुख्यमंत्री जनता के लिए ठीक है और न ही अपनी समय-सीमा खत्म होने के जरा पहले बजरिए इस्तीफा देकर व्यक्तिवादी तरीके से ही सब ठीक है का एलान करना। और, न ही पत्रकारों के सवालों का इस तरह जवाब देना कि सामने विपक्ष बैठा है।

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