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दुनिया मेरे आगे: हर पांच साल पर क्रांति और बदलाव का इंतजार, जनता को विश्वास जल्दी ही होगा बड़ा उत्सव

अपने लक्ष्य से भटकी हुई क्रांति हर बदलाव को व्यर्थ कर रही है। उसकी तलाश में देश की गरीबी रेखा से नीचे छिटके लोगों की भीड़ और बढ़ गई। लोग अब एक जून की रोटी भी नहीं खा पा रहे। महामारी ने उनकी भीड़ और बढ़ा दी और सरकार ने समाधान के लिए मुफ्त और सस्ती वस्तुओं की दुकानों की संख्या बढ़ा दी। पढ़िए सुरेश सेठ के विचार-
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | July 02, 2024 06:55 IST
दुनिया मेरे आगे  हर पांच साल पर क्रांति और बदलाव का इंतजार  जनता को विश्वास जल्दी ही होगा बड़ा उत्सव
प्रतीकात्मक तस्वीर
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मौसम बदला तो क्षितिज के उस पार से नगाड़ों के बजने का स्वर गूंजने लगा। हमें बताया गया था कि जिस पौन सदी से क्रांति और बदलाव का इंतजार था, ये नगाड़े फिर उसका आभास दे रहे हैं। नगाड़ों का कसब भी अजीब है। हर पांच साल के बाद यह क्रांति हो जाने का आभास देते हैं और अगर मध्यावधि चुनाव हो जाएं तो नगाड़ों के स्वर और भी करीब आ जाते हैं। ये नगाड़े शोभायात्राओं में चलते पैरों की धमक और उनके जिंदाबाद के स्वरों पर जीते हैं। बहुत जल्दी एक नया उत्सव मनाने की घोषणा कर देते हैं। शून्य भ्रष्टाचार, महंगाई को जड़मूल से उखाड़ना और आम आदमी की खुशहाली के सूचकांक को शीर्ष पर पहुंचा देना क्रांति के इन नगाड़ों का स्वर है, पर यह स्वर लगातार भर्राता गया है। मगर आज भी कई लोग विश्वास करते हैं कि जब क्रांति होगी तो सबके अच्छे दिन आ जाएंगे।

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वक्त बदलेगा और काम मांगने वाले उस कतार में नहीं खड़े होंगे, जो सिफारिश के धक्के से आगे बढ़ती है। काम देने वाले ‘जागते रहो’ की आवाज के साथ जो जिस योग्य है, उसके बिना पूछे ही काम बांट देंगे। काम दिलाने वालों की वह जमात खत्म हो जाएगी, जो आपको अपने इलाके में जीने का उपहार बांटते और अपनी नान-कचौरी का थोड़ा-सा और जुगाड़ करने के बाद कह देते हैं, ‘अरे भई मन विदीर्ण हो गया। देश में गरीबी तो और बढ़ गई। इसे जड़ से मिटाना एक पीढ़ी का काम नहीं। इसके चिह्न मिटाने के लिए केवल हम नाकाफी रहेंगे। हमारे संघर्ष की विरासत हमारी अगली पीढ़ी अंगीकार करेगी।’

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यों यहां क्रांति एक अचानक फूटता हुआ विप्लव नहीं। यह वह लावा है, जो परिवारवाद के कंधों पर सवार होकर फूटता है। यह अच्छे दिनों की वह डोली है, जिसे हमारे खेत रहने के बाद हमारे नाती-पोते तक उठाते हैं। कैसी स्पंदित कर देने वाली वह याद है, जब आज से सतहत्तर बरस पहले रात के बारह बजे घुप्प अंधेरे में एक युगपुरुष की आवाज गूंजी थी। इस आवाज में सदियों से पड़ी देश की बेड़ियां कट जाने की सूचना थी। आधी रात को एक नया सूरज उगा देने का वचन था। लोकराज लाने का वादा था। समाजवाद के सूरज के सातों घोड़े समतावाद, गरीब और अमीर का भेद मिटा देने के सपने की अगवानी कर रहे थे। हर हाथ को काम, हर पेट को रोटी और हर नागरिक को अपना सिर ऊंचा कर जीने का संदेश दे रहे थे। खून-खराबा नहीं लोकतंत्र के विस्तृत पथ पर योजनाबद्ध आर्थिक विकास की रेलगाड़ी पर सवार करवा कर सबके लिए अच्छे दिन ला देने का विश्वास था उस वाणी में। उसके बाद युग पर युग बीत गए, लेकिन भूख से तड़पते हुए आम आदमी ने खंडित सपनों का तकिया छोड़ने से इनकार कर दिया। बदलाव नेताओं के लिए दावों, भाषणों और घोषणाओं की लक्ष्मण रेखाओं में कैद हो गया। मुक्ति की वैतरणी के वादे आज भी हैं। मध्यजन उसके लिए उस पार नौकाएं भी लेकर आ जाते हैं बार-बार, लेकिन इनमें बाकी सबके लिए जगह कहां? यह तो पहले ही उनके प्यादों से भरी हुई थी।

आम आदमी को समझाया जाता कि इस बीच देश बहुत तरक्की कर गया है, लेकिन तरक्की पसंद देशों के सूचकांक बेकारी, भूख और गरीबी की बढ़ती हुई कतार को देख कर और भी संत्रस्त हो जाते कि आपका देश तो आर्थिक गिरावट की दो-चार पायदान और नीचे उतर गया। आम आदमी पूछता है, इस देश में क्रांति का अर्थ क्या इसका कोलाहल है, जो इसके बारे में देश की संसद में उल्टे-सीधे विधेयक पास करवा देने से पैदा होता है? क्या इसका अर्थ लाखों धरती पुत्रों के सैलाब का राजधानी के बाहर उमड़ आना है, जो यह नारे लगाता है कि हमसे बिना पूछे बनाए कानूनों को हम पर मत थोपो। इन्हें रद्द करो, फिर हमसे सलाह करके नए कानून बनाओ।

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क्रांति क्या जोर-आजमाइश होती है, जिसमें एक पक्ष कहता है इन आततायी कानूनों को रद्द करो और हमसे पूछ कर नये कानून बनाओ। दूसरा पक्ष कहता है, चश्मे का नंबर बदलो। ये हमदर्द कानून तुम्हें आततायी नजर आ रहे हैं? सड़कों पर क्रांति की तलाश में निकले हुए कहते हैं कि ‘इनका रंग-रूप नहीं, इनका दिल बदलो।’ क्रांति के मुखौटे बदलते रहते हैं और इधर योजनाबद्ध आर्थिक विकास का चेहरा भू-लुंठित पड़ा है। योजना आयोग सफेद हाथी कहला कर मृतप्राय हो गया, और उसका मुखौटा नीति आयोग उसक मर्सिया पढ़ते हुए बदलाव को आवाज दे रहा है।

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इस आवाज में कभी कतार में खड़े आखिरी आदमी के उदय की बात होती थी। देश में हर लक्ष्य से पिछड़ने और फिर कोरोना जैसी महामारी का ऐसा प्रकोप हुआ कि अब कतार के इस आखिरी आदमी के अंत्योदय की बात एक प्रहसन लगती है। अपने लक्ष्य से भटकी हुई क्रांति हर बदलाव को व्यर्थ कर रही है। उसकी तलाश में देश की गरीबी रेखा से नीचे छिटके आदमियों की भीड़ और बढ़ गई। ये लोग तो अब एक जून अपनी मेहनत की रोटी भी नहीं खा पा रहे। महामारी ने उनकी भीड़ और बढ़ा दी और सरकार ने समाधान के लिए मुफ्त और सस्ती वस्तुओं की दुकानों की संख्या बढ़ा दी।

इनके खालीपन के बाहर कब तक जिंदगी बदल जाने का इंतजार करते हुए वे उखड़े लोग खड़े रहेंगे? अभी भ्रष्टाचार सूचकांक ने बताया है कि उसके उन्मूलन का दावा औंधे मुंह गिरा है, और रिश्वत लेना और देना अपराध नहीं, जीवन जीने की एक अनिवार्य शर्त बन गई है। यह कैसी क्रांति है जो घटने से पहले ही अप्रासंगिक हो गई।

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