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रविवारी: पढ़िए चंद्र त्रिखा की कहानी- मोरां सरकार

21 वर्ष की उम्र में महाराजा रणजीत सिंह ने सिंहासन संभालते ही मोरां माई को ‘महारानी-साहिबा’ का रुतबा दे दिया था। उसके नाम पर ‘मोरां का सिक्का’ नामक स्वर्ण मुद्रा भी जारी हुई और उसके बाद लाहौर के लोग उसे ‘मोरां सरकार’ कहने लगे।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: January 07, 2024 14:54 IST
रविवारी  पढ़िए चंद्र त्रिखा की कहानी  मोरां सरकार
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में अनेक ऐसे किस्से पनपे जो अभी तक इतिहास के पन्नों में दिलचस्पी का केंद्र बने हुए हैं। इन्हीं में से एक शख्सियत हैं मोरां सरकार। एक कुशल एवं कुशाग्र व महादानी के रूप में जहां एक ओर वह प्रखर शासक, न्यायप्रिय एवं तीक्षण बुद्धिमान महाराजा के रूप में विख्यात रहे, वहां उनके आरंभिक जीवन से जुड़ा एक प्रेम प्रकरण भी चर्चित रहा।

मोरां का जन्म वर्तमान भारत-पाक सीमा पर स्थित गांव वाघा से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित गांव माखनपुरा में हुआ था। उनकी परवरिश एक नर्तकी के रूप में हुई थी और धीरे-धीरे उसका प्रवेश राज दरबार तक हो गया। उनकी महाराजा से मुलाकातें लाहौर व अमृतसर के मध्य स्थित बारादरी में होती थीं। सूत्रों के अनुसार, महाराजा ने इन मुलाकातों के मध्य ही मोरां से वादा भी किया था कि वे उससे विवाह-संबंधों में बंधेगे।

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21 वर्ष की उम्र में महाराजा रणजीत सिंह ने सिंहासन संभालते ही मोरां माई को ‘महारानी-साहिबा’ का रुतबा दे दिया था। उसके नाम पर ‘मोरां का सिक्का’ नामक स्वर्ण मुद्रा भी जारी हुई और उसके बाद लाहौर के लोग उसे ‘मोरां सरकार’ कहने लगे। कोई भी समस्या होती तो लोग उसके सामने हाजिÞर होते और जरूरतमंदों के काम भी प्राथमिकता के आधार पर होने लगे।

कला और भाषा पर मोरां की विशेष पकड़ थी। वह सामाजिक कार्यों में भी गहरी रूचि लेती थी। मोरां ने अपने लिए बाजार चौक-चकता (पापड़ मंडी) में एक बड़ा सा घर भी बनवाया। कुछ वर्षों बाद उसने महाराजा से प्रार्थना की कि उसके साथ ही सटी पापड़ मंडी एक मस्जिद बनवाई जाए। तब उस मस्जिद का नाम मस्जिदे-तवायफान रखा गया। वर्ष 1998 में इसका नाम बदलकर माई-मोरां मस्जिद रख दिया गया और अब यह इसी नाम से जानी जाती है। वर्ष १८६२ में माई मोरां चल बसी और उसे हजÞरत ताहिर बन्दगीज के साथ ही स्थित मियानी साहब कब्रिस्तान में दफन कर दिया गया।

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उस बाजÞार में माई मोरां की विशाल हवेली और खूबसूरत मस्जिद आज भी विद्यमान है। दोनों इमारतें मार्इं के सौंदर्य बोध और कलात्मक रूचियों की गवाही देती हैं। यहां एक और तथ्य का उल्लेख भी जरूरी है। उस समय के अकाली बाबा नेता अकाली फूला सिंह ने महाराजा को दंडित करने की भी घोषणा की थी। यह भी कहा जाता है कि मोरां को बाद में कुछ वर्षों तक जिला पठानकोट के एक कस्बे में भेज दिया गया।

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इसी संदर्भ में एक अन्य स्थल का भी जिÞक्र होता है ‘पुल कंजरी’। यह स्थान अमृतसर-लाहौर रोड पर गांव धनोआ खुर्द के समीप स्थित है। यह भी एक ऐतिहासिक स्थल है। महाराजा रणजीत सिंह के शासन में पुल कंजरी एक ऐसा महत्वपूर्ण स्थल था, जहां महाराजा किसी युद्ध से लौटते या जाते समय अपने सेना नायकों के साथ विश्राम करता था। उन दिनों लाहौर जाते समय कई बार महाराजा व उसके फौजी जरनैलों एवं फौजी दस्तों को रावी नदी पर बनी एक नहर से गुजरना पड़ता था।

वहां की एक नर्तकी गुल बहार से भी महाराजा बेहद प्रभावित थे। बाद में महाराजा ने उसे भी बेगम बना लिया और उसी की जिद्द पर महाराजा ने एक पुल बनवाया था, जिसे ‘पुल कंजरी’ कहा जाता है। पुल पर एक स्रान-तालाब, एक मंदिर, एक गुरुद्वारा व एक मस्जिद का भी निर्माण किया गया था। अधिकांश इतिहासकार गुलबहार और मोरां को एक ही पात्र मानते हैं।

वैसे इस नहर का निर्माण मुगल सम्राट शाहजहां द्वारा कराया गया था ताकि लाहौर के शालीमार बाग की सिंचाई हो सके। उन दिनों पुल नहीं था। एक बार मोरां जब रावी की हंसाली नहर को पार कर रही थी तो उसकी एक बहुमूल्य चप्पल पानी में बह गई। दूसरी चप्पल को अपने हाथ में पकड़े उसे नंगे पांव ही महाराजा तक पहुंचना पड़ा।

जब उसने नंगे पांव आने का कारण बताया तो महाराजा ने तत्काल एक पुल बनवाने का आदेश जारी कर दिया। यही पुल आज भी पुल कंजरी के नाम से जाना जाता है। बाद में कुछ विद्वानों ने ‘कंजरी’ शब्द के बारे में कुछ स्पष्टीकरण भी दिए और कहा कि ‘कंजरी’ एक अपमानजनक शब्द न होकर पर्शियन और संस्कृत के चर्चित शब्द कंचनी का ही अपभ्रंश है जो ‘कंचन’ अर्थात स्वर्ण का स्त्रीलिंग था लेकिन नाम आज भी वही है।

इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि मोरां विवाहोपरांत महाराजा को साथ लेकर एक बार वर्ष 1802 में हरिद्वार भी गई। इस तथ्य का भी उल्लेख है कि महाराजा को मोरां के साथ संबंध रखने के आरोप में अकाल तख्त पर भी तलब किया गया। वहां उसे खालसा पंथ का अपराधी भी घोषित किया गया और कोड़ों की सजा दी गई।

महाराजा ने एक धर्मपरायण विनम्र सिख होते हुए यह दंड स्वीकार किया और स्वयं अकाल तख्त पर क्षमायाचना के लिए उपस्थित हुए। उनकी क्षमायाचना स्वीकार कर ली गई और उन्हें दिए गए कड़े दंड को घटाकर केवल एक कोड़े तक सीमित कर दिया गया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि महाराजा ने अपने जीवन काल में अपने नाम पर कोई सिक्का नहीं चलाया लेकिन मोरां के नाम पर सिक्का चला। मोरां माई की ढेरों स्मृतियां आज भी लाहौर में मौजूद हैं।

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