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दुनिया मेरे आगे: रिश्तों और मासूमियत के भी नीलामघर, बदल रहे जमाने में नायक और खलनायक की पहचान मुश्किल

जमाना बदल रहा है। हमारे समाज के आधुनिक और व्यवसायी होते जाने के साथ-साथ यह शोषण का ठेका व्यवसाय भी सफेदपोश और साफ-सुथरा हो गया है। देश के किसान कानूनों से कायाकल्प के नाम पर इस देश के मूल नागरिकों, धरती पुत्रों या किसानों की जिंदगी संवारने के लिए किसानों की खेती धनिक घरानों को ठेके पर देने, उनकी फसलों के खरीद के ठेके लेने का अधिकार ऊंची अटारी वालों को दे दिया गया था।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: February 05, 2024 09:53 IST
दुनिया मेरे आगे  रिश्तों और मासूमियत के भी नीलामघर  बदल रहे जमाने में नायक और खलनायक की पहचान मुश्किल
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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सुरेश सेठ

आज कदम-कदम पर नीलामघर खुल गए लगते हैं, जो भौतिक मूल्यों की आरती उतारते नजर आते हैं। हर काम राजनीति से लेकर रचनात्मकता तक बिकने लगे। लगता है जैसे जिंदगी ठेके पर चली गई है। लेखन से कलाकृतियों तक का सृजन ‘आर्डर’ पर होता है। जिंदगी से प्यार खत्म करवाने का ठेका पहले कुछ लोगों ने ले रखा था, इन्हें जमींदार या मालिक लोग कहा जाता था और शोषित होते बेचारे अभागे मासूम। अब भूमिका बदल गई। शोषित कौन है और शोषक कौन, इसकी पहचान नहीं होती। शोषण कुछ इस तरह हर जिंदगी की सीढ़ी चढ़ने की इच्छा रखने वाले आदमी के जेहन में घुस गया कि अच्छे और बुरे की तमीज जाती रही और एक स्थान पर शोषक दूसरे स्थान पर अपने शोषित हो जाने का रोना रोने लगा।

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जीवन के कोने-कोने में ठेके पर काम करते दिख रहे नए खलनायक

पहले प्रेम त्रिकोण की असफलता पर न जाने कितनी दर्दनाक फिल्में लिखी जाती थीं, न जाने कितनी प्रेम कहानियां बनती-बिगड़ती थीं, जिनके प्रेम त्रिकोण में तीसरा कोना खलनायक का होता था। अब खलनायक की पहचान करनी कठिन हो गई। जीवन यांत्रिक हो गया और इस जीवन के कोने-कोने में ठेके पर काम करते नए खलनायक प्रेमी से लेकर रस्मो-रिवाज और परंपराओं की दुहाई देकर शादी तुड़वाने वाले बड़े-बुजुर्गों और समाज के मीर-मुंशियों का काम कर जाते। रिश्ता टूट जाता। यों खलनायकों का ठेका व्यवसाय इतना सफल हो गया कि पहले लोगों ने इनकी उसकी भयावहता से डर कर अपने बच्चों के नाम इन खलनायकों के नाम पर रखने बंद कर दिए थे। बीती पीढ़ियों में तो बच्चों के नाम किसी खलनायक से नहीं मिलते थे। अब नायक क्या और खलनायक क्या?

साफ-सुथरे नामों और व्यक्तित्व वाले ही इस दुनिया में खलनायक बने नजर आते हैं। जमाना बदल रहा है। हमारे समाज के आधुनिक और व्यवसायी होते जाने के साथ-साथ यह शोषण का ठेका व्यवसाय भी सफेदपोश और साफ-सुथरा हो गया है।

किसानों की जिंदगी बदलने के नाम पर धनी लोगों को दिए जा रहे खेत

देश के किसान कानूनों से कायाकल्प के नाम पर इस देश के मूल नागरिकों, धरती पुत्रों या किसानों की जिंदगी संवारने के लिए किसानों की खेती धनिक घरानों को ठेके पर देने, उनकी फसलों के खरीद के ठेके लेने का अधिकार ऊंची अटारी वालों को दे दिया गया था। यों इस देश के किसानों की शोषित बहुसंख्या इसी प्रकार सूदखोर महाजनों और धनी जमीदारों के पास ठेके पर अर्ध बंटाई या खेत में खड़ी फसलों के औने-पौने दाम पर बिक कर सदियों से किसानों का दुख हरती रही है। लेकिन यह दुख हरा गया या एक शोषित प्रक्रिया के रूप में तब्दील हो गया, यह तो केवल भुक्तभोगी ही जानते हैं।

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हां, पिछले साल इतना अवश्य हुआ कि इन गरीब अभागे किसानों की जमीन धनिकों को ठेके पर देने की वैधानिक मान्यता मिल गई। फसलों को संपन्न घरानों में गोदामों के लौह द्वारों के पीछे कैद करने की कानूनी इजाजत मिल गई। किसानों ने अपनी जिंदगी यों एक साफ-सुथरे ठेके पर उठ जाने का रास्ता खुलते देखा, तो राजधानी की सरहद पर रास्ता बंद कर धरना लगा बैठ गए। उनका साल भर धरना लगा तो ठेके का आह्वान करने वालों की आंखें खुलीं। फिलहाल ठेका और ठेकेदार किसानों की जिंदगी से विदा हुए। अब वे किसी चोर दरवाजे से अपना रूप बदलकर फिर प्रवेश करने की कोशिश कर रहे हैं।

शिक्षालयों के भवन आज भी खड़े हैं, लेकिन विद्या-प्रेरणा रूठती जा रही है

शिक्षालयों की ओर जाते हैं, तो वहां ‘शिक्षा परमो धर्म’ का सूत्रवाक्य अपना चेहरा बिगाड़, ठेके पर उठ गया लगता है। महामारी का फालिज न केवल पुस्तक और अध्यापन अध्ययन संस्कृति पर गिरा, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था ही जैसे सेवानिवृत्ति झेलने लगी है। अब तो अध्यापक नाममात्र वेतन पर ठेके पर रह जिंदगी में किसी स्थायित्व को देने की मांग करते हैं, तो उन्हें कच्चे मुलाजिम कह कर अपने बजट से निकाल दिया जाता है। शिक्षालयों के भवन आज भी खड़े हैं, लेकिन लगता है, उनसे विद्या और प्रेरणा रूठती जा रही है।

हर लक्ष्य तक पहुंचने के लिए चोर दरवाजे और संक्षिप्त रास्ते खुलने लगे हैं। आजकल तप और साधना से पूर्ण शिक्षा प्राप्त करने की बात कौन करता है? विद्या के गुलाबों की खुशबू की जगह कुकुरमुत्तों ने ले ली है। हथेली पर सरसों जमाने की ठेका विधियां दनदनाने लगी हैं। अकादमियां ठेके पर नौकरी-वान डिग्रियों, डाक्टर, इंजीनियर या जनसंपर्क और प्रचारक की डिजिटल संस्थानों के ठेके दिलवाने लगीं।

यही नहीं, देश की नई पीढ़ी को विदेश भिजवाने के लिए ठेका अकादमियां भी खुल गईं। वे अग्रिम भुगतान लेकर किसी को विदेश के किसी कानूनी, गैर-कानूनी विमान या जहाज पर चढ़ा देती हैं। अगर ऐसा न हो सके, तो ठेका शादियों का गुप्त मार्ग खुला है। विदेशों में व्यवस्थित ग्रीन कार्ड होल्डरों की तलाश इनके साथ विदेश पलायन के लिए लालायित सपनों की ठेका शादी होती है। एक बार विदेश की धरती पर पांव रख दिए, तो बाद में यह शादी अपने आप टूट जाएगी। इस मार्ग ने पाणिग्रहण की गरिमा को भी ठेके पर दे दिया, लेकिन नई पीढ़ी की रुकी गाड़ी चल निकली। बस यही चाहिए।

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