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पढ़िए आशा शर्मा की कहानी झोपड़ी की आवाज

‘मां, हम कल से मैडम जी के बंगले पर नहीं जाएगी।’ काकी बोल पड़ी- ‘अरे निशा, तुमने ऐसा क्यों किया? मैडम जी ने तुम्हें कुछ भला-बुरा कहा?’ ‘नहीं काकी, हम कल से कालेज पढ़ने जाएंगे। खुद मैडम बनेंगे। हम अपना बड़ा घर बनाएंगे। हमारी कालेज की मैडम ने पिछले बरस कहा था कि तुम्हारी फीस नहीं लगेगी, किताबें भी मिल जाएंगी।’
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 26, 2024 13:26 IST
पढ़िए आशा शर्मा की कहानी झोपड़ी की आवाज
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(सोशल मीडिया)।
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आशा शर्मा

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‘मैडम का फोन आ जाएगा। उठ जा जल्दी से, देर हो जाएगी।’ ‘मां, बस पांच मिनट और सो लेने दो न। कौन-सी दूर है, वो सामने ही तो है बंगला।’ बंगले का दरवाजा खुला ही था। ‘ऐ छोरी आज फिर देरी से? मुन्ना की वैन आने वाली है। मेरे आफिस को देर हो रही है। साहब का लंच तैयार करना है।’ मैडम ने गुस्से में कहा। बंगले के बाहर वैन हार्न बजाने लगी थी। ‘ऐ छोरी, कान में रूई डाल रखी है क्या? मुन्ना को लेकर क्यों नहीं जाती।’

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निशा ने मुस्कराते हुए मुन्ना को उठाया। बैग-पानी की बोतल लेकर गोद में चढ़ते ही मुन्ना ने निशा को प्यार किया। निशा ने मुन्ना को पुच्ची की और वह वैन में अपनी सीट पर जाकर जम गया।‘देख छोरी! अब मुन्ना के आने से पहले-पहले सारा काम निपटा लेना। ऐसा न हो कि हमारे जाने के बाद सोफे पर पसर कर टीवी देखती रहे।’

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भीतर से भरी निशा अचानक बोल पड़ी- ‘देखो मैडम जी, आप हमारा नाम नहीं जानती क्या? आप बार-बार हमको छोरी-छोरी क्यों बुलाती हो। हमारा नाम निशा है।’ ‘जबान मत लड़ा, मैं तुम्हारी काकी से शिकायत करूंगी। तुम्हारी काकी हमारे यहां काम करती थी तो उससे हमें कोई शिकायत नहीं थी।टेम पर आती थी, कभी जाने की जिद नहीं करती थी।’

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‘आप हमको ऐसे रोज डांटोगी तो हम खुद ही काकी को मना कर देंगे।’ आफिस जा रही मैडम का सारा गुस्सा बैठ गया। सोचा, कहीं सच में न आई तो मैं तो कल ही बिस्तर पकड़ बैठूंगी। निशा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- ‘देखो निशा, तुम्हारे बिना मुन्ना तो स्कूल ही नहीं जाएगा। साहब को तो मेरी बनाई रोटी कहां पसंद आती है। तुम तो हमारे घर की सदस्य हो।’ ‘नहीं मैडम जी, कल से नहीं आएंगे। आज आपके आने तक काम करेंगे।’ मैडम के आते ही अपनी लंबी चोटी लहराती निशा बोली, ‘हम जा रहे हैं’ और चली गई।

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‘मां, हम कल से मैडम जी के बंगले पर नहीं जाएगी।’ काकी बोल पड़ी- ‘अरे निशा, तुमने ऐसा क्यों किया? मैडम जी ने तुम्हें कुछ भला-बुरा कहा?’ ‘नहीं काकी, हम कल से कालेज पढ़ने जाएंगे। खुद मैडम बनेंगे। हम अपना बड़ा घर बनाएंगे। हमारी कालेज की मैडम ने पिछले बरस कहा था कि तुम्हारी फीस नहीं लगेगी, किताबें भी मिल जाएंगी।’

रात भर सो नहीं सकी निशा। अकेली पहुंच गई कालेज सुबह-सुबह। ‘सर हमें पढ़ना है। आप हमको दाखिला दे दीजिए। हम काम नहीं करेंगे।’ फार्म जमा करा कर उसने शीतल मैडम को सारी हकीकत बता दी। ‘निशा, कल से ही तुम क्लास में बैठ जाना।’ शीतल मैडम ने कहा। ‘तुमने उन बंगलों के जूठे बरतन साफ करने में पहले ही एक साल बेकार कर दिया। तुम्हारी सहेली कमला तुमसे एक क्लास आगे बढ़ गई। मन लगाकर पढ़ो। पहले टेस्ट में अच्छे नंबर लाओ तो सरकार तुम्हें वजीफा भी देगी, जिससे तुम्हारे कपड़े और खाने-पीने की व्यवस्था आसानी से हो जाएगी।’

‘देखो न काकी, किसी तरह निशा का स्कूल छुड़वाकर फिर से काम पर भेजना होगा। निशा आपकी बात मानती है।’ मैडम ने काकी से कहा।‘मेरी भूल थी कि मैंने इसको झुग्गी की छोरियों के साथ स्कूल भेजा, न भेजती तो बात यहां तक कभी नहीं आती।’ काकी ने कहा। मगर निशा पर कोई असर हुआ।वह कालेज जाती रही। पर अब एक नया बखेड़ा शुरू हो गया। मलाड की झोपड़पट्टी में रहने वाला रमेश रेडलाइट एरिया में मैनेजर था। काकी का मुंहबोला भतीजा। ‘देखो काकी आप जितना कहोगी उतना रुपया मैं निशा की मां को और आपको अलग दूंगा, आप मेरी शादी निशा से करा दीजिए।’

‘देख रमेश, परसों निशा का रिजल्ट आना है। मैं उसकी मां से बात करूंगी। काली माई ने चाहा तो उसी दिन तेरी गोटी फिट करा दूंगी। कुछ पैसे तो एडवांस के अभी दे दे।’ बाहर खड़ी निशा और सहेली कमला ने सब कुछ सुन लिया था। निशा और कमला ने एक-दूसरे को आंख मारी। दो दिन बाद। ‘हां तो काकी, तुम्हारी नजर में रमेश बहुत अच्छा लड़का है न।’

‘हां बेटी, निशा, हम तेरे भले की बात सोचेंगे। बुरा क्यों सोचेंगे? कमाता-खाता लड़का है। लो आ ही गया रमेश भी।’निशा और कमला ने रमेश का स्वागत किया। झोपड़ी में लाकर बिठाया। निशा बोली, ‘रमेश मैं तुम्हें पसंद हूं?’ ‘हां निशा, मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूं। तुमसे शादी करना चाहता हूं।’ ‘अच्छा रमेश, एक बात बताओ, तुम मेरे अलावा कितनी लड़कियों से शादी रचा चुके हो?’‘नहीं, नहीं, किसी से नहीं निशा। तुम्हारी कसम।’

‘काकी को कितने रुपए देने की हां भरी है, मुझसे शादी कराने के लिए?… वो बंगले वाली मैडम से मेरा स्वाभिमान उतारने का सौदा कितने में हुआ?’रमेश को काटो तो खून नहीं। पर वह रेडलाइट एरिया का खिलाड़ी था। उसने जेब से पिस्तौल निकाली और शादी का स्टांप सामने रख दिया। ‘इस पर दस्तखत करो निशा, नहीं तो उठा कर ले जाऊंगा।’

निशा बोली, ‘करती हूं, लेकिन इस खिलौने को तो जेब में रखो। लाओ बताओ, कहां साइन करने हैं।’रमेश ने स्टांप आगे कर दिया। निशा ने स्टांप हाथ में लिया और जोर से ताली बजाई। अचानक पुलिस आ गई। रमेश को गिरफ्तार कर लिया।कमला से रहा नहीं गया, ‘आंटी जी, निशा का पीएचडी में एडमिशन हो गया है। कालेज में मैडम बनेगी। तब तक इसे बीस हजार रुपए महीना वजीफा मिलता रहेगा।’ निशा ने मां को गले से लगा लिया। यह झोपड़ी की आवाज है।

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