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रविवारी: पढ़िए पल्‍लवी सक्‍सेना की कहानी मुक्ति

एक दिन लंबी अमावस के बाद पूर्णिमा के चांद की तरह एक इंसान नम्रता के जीवन के अंधेरे को चीरता हुआ हौसला बनकर आता है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
Updated: October 22, 2023 10:37 IST
रविवारी  पढ़िए पल्‍लवी सक्‍सेना की कहानी मुक्ति
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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पल्‍लवी सक्‍सेना

मां यह मुक्ति क्या होती है? मां कुछ कहतीं, उससे पहले ही बच्चे के दादा जी ने कहा, ‘इधर आओ बेटा, मैं तुम्हें बताता हूं मुक्ति का मतलब क्या होता है। मुक्ति का अर्थ होता है सांसारिक मोहमाया का हमेशा के लिए छूट जाना।’मतलब…?अब आसान शब्दों में कहूं तो जैसे जब कोई मर जाता है, तो वह एक तरह मुक्त हो जाता है।

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अच्छा लाइक फ्रीडम… या ऐसा ही कुछ और, है ना? हां बिल्कुल, फिलहाल तुम ऐसा ही मान सकते हो। ओके दादू।यह देख नम्रता अपनी आंखों में भावनाओं का पानी लिए अपने घर की उस भगवा दीवार की ओर देख रही है, जिस पर बीता हुआ कल बनकर टंगी है उस परिवार की रूह। जिसे अब भी मुक्ति की तलाश है।

उसके चहरे पर ऐसे भाव देखकर न सिर्फ दादू, बल्कि दादी की आंखों में भी एक अजीब सी विडम्बना है। एक ऐसी उलझन, जिसे जानते समझते सभी हैं, परंतु उस पर कोई बात नहीं करना चाहता। बस एक हूक सी उठा करती है सभी के मन में रह-रह कर और बस सब उस एक टीस, एक बेबसी एक कभी न खत्म होने वाली उदासी के साथ जिये जा रहे हैं। जब सच को जानते हुए भी सच को स्वीकारा न जा सके, तब शायद ऐसा ही हुआ करता है।

बहुत साल हो चुके हैं उस हादसे को, परंतु जैसे उस घर के हर एक सदस्य का जीवन दफन हुआ पड़ा है उस भगवा दीवार में, सभी की जिंदगी एक मशीन की तरह हो चुकी है, जिसमें कभी कोई नया सवेरा नहीं होता, कोई नया जोश नहीं दिखता, कोई नई उमंग नहीं उठती, जीवन के प्रति कोई उत्साह नहीं होता।

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फिर एक दिन लंबी अमावस के बाद पूर्णिमा के चांद की तरह एक इंसान नम्रता के जीवन के अंधेरे को चीरता हुआ हौसला बनकर आता है। यह और कोई नहीं, बल्कि उसके पति का को-पायलट कैप्टन राजवीर ही था। देखते ही सवाल अपने आप उभर आया- अरे आप इतने सालों बाद यहां ? सब कुछ यहीं जान लोगी या अंदर भी बुलाओगी?

ओह हां, आइये ना…।नमस्ते अंकल… कैसे हैं आप..? ओह हो…! राजवीर बेटा, आओ, आओ बहुत अच्छा लगा तुम्हें यहां देखकर। कैसे हो और घर में सब कैसे हैं ? जी बस, आपके आशीर्वाद से सब ठीक हैं। अच्छा चलो फिर तो यह बढ़िया है और शादी-वादी की या नहीं अभी तक तुमने…?नहीं अंकल, अभी तक तो नहीं…।

क्यों भई, सारी जिंदगी कुंवारे ही रहने का इरादा है क्या? ‘अभी तक मेरी पसंद की कोई लड़की मिली ही नहीं अंकल।’नम्रता ने बात घुमाने के लिए राजवीर से कहा, आप बैठो, पापा से बातें करो तब तक मैं चाय बनाकर लाती हूं। और वह कहते हुए रसोई में चली गयी।पिंटू ने पूछा, अंकल क्या आप मेरे पापा के बेस्ट फ्रेंड हो ?

हां चैम्प…। इतने में दादू कोई बहाना कर वहां से चले गए और नम्रता चाय लेकर आ गई…। पिंटू और राजवीर एक साथ खेलने लगे। नम्रता चाय ले आई- ‘आप इसे ज्यादा सिर न चढ़ाइए।’‘आप…? कौन है यह आप…? क्या आप इस आप को जानती है…?’कामन नम्रता, हम एक ही फील्ड, एक ही उम्र के लोग हैं और एक-दूसरे को बहुत अच्छी तरह जानते हैं…! तो तुम मुझे मेरे नाम से बुला सकती हो…।

नम्रता के चहरे पर फिर एक बार असहजता के भाव देख राजवीर को लगा कि उसने शायद कुछ ज्यादा बोल दिया…। उसने बात का रुख मोड़ने के लिए चाय का कप उठा लिया।नम्रता ने पूछा, ‘और कहां ठहरे हो… यहां कोई रिश्तेदार वगैरह है तुम्हारा या हमेशा की तरह होटल जिंदाबाद…?’ ‘सही कहा तुमने, होटल जिंदाबाद…। परंतु मैं वहां का बोरिंग खाना खा-खा कर तंग आ गया हूं…।’

‘अरे, तो फिर तुम यहीं क्यों नहीं आ जाते ?अच्छा, एक बात बताओ, तुमने कंटिन्यू क्यों नहीं किया यार? तुम भी तो बहुत अच्छी पायलट रही हो? राजवीर ने बात बदली।‘बस रणवीर के जाने के बाद मन ही नहीं हुआ और फिर उस वक्त पिंटू भी होने वाला था और अचानक से इतना सब हो गया कि मुझे समझ ही नहीं आया कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं।’

रणवीर के जाने से न सिर्फ मैं, बल्कि मां-पापा भी इस कदर टूट चुके थे कि घर में ही रहकर उनका ध्यान रखना मुझे प्लेन उड़ाने से ज्यादा महत्वपूर्ण लगा और बस तब से मैंने….। मेरी छोड़ो…! तुम अपनी कहो, शादी क्यों नहीं की अब तक…?‘तुम्हारे जैसी कोई मिली ही नहीं अब तक।’ थोड़ी देर की चुप्पी के बाद फिर राजवीर को लगा कि उसने कुछ ऐसा बोल दिया है जो शायद उसे इस वक्त नहीं बोलना चाहिए था।

कुछ ही दिनों में राजवीर, रणवीर के परिवार में ऐसा घुल-मिल गया, मानो वह राजवीर नहीं बल्कि रणवीर ही हो। रणवीर के मां-पापा को अब राजवीर में ही अपना बेटा दिखाई देने लगा था और पिंटू को जैसे पापा मिल गए, लेकिन नम्रता के लिए राजवीर अब भी केवल उसका और रणवीर का एक बहुत ही अच्छा दोस्त था और उसके अलावा कुछ नहीं। राजवीर यह बात बहुत अच्छे जान चुका था। एक दिन दोनों शाम को सैर पर निकले तब कुछ इधर-उधर की बातें करने के बाद राजवीर ने नम्रता से कहा… तुम फिर से ज्वाइन क्यों नहीं कर लेती…?

अब तो पिंटू भी बड़ा हो गया है और मां-पापा भी अब ठीक ही हैं। नम्रता कुछ देर सोचने के बाद बोली, ‘नहीं यार, अब शायद वो कान्फिडेंस नहीं रहा कि प्लेन उड़ा पाऊं। इतने साल हो गए हैं, पता नहीं मैं कर पाऊंगी भी या नहीं…!’‘अरे, बस इतनी सी बात। तुम बहुत अच्छे से कर लोगी। मुझे तुम पर पूरा विश्वास है। और वैसे भी मैं हूं न…!’ राजवीर ने उसका हौसला बढ़ाते हुए कहा था।‘हां वो सब तो ठीक है, मगर…’

‘अगर-मगर कुछ नहीं, तुम बस फिर से ज्वाइन कर रही हो। इसके आगे मैं और कुछ सुनना नहीं चाहता।’और फिर दिन आता है जब नम्रता कई सालों बाद यूनिफार्म पहने प्लेन उड़ाने के लिए तैयार खड़ी है। परिवार के सभी सदस्य उसका हौसला बढ़ाने को हवाईअड्डे पर हैं। फ्लाइट की घोषणा होते ही, जैसे ही दोनों चलने को तैयार हुए, राजवीर नम्रता का हाथ पकड़कर उसे अपने साथ ले जाता है, ताकि उसकी घबराहट कुछ कम हो।

घर वालों को यह सब दिखाई देता है, लेकिन वे अनदेखा कर देते हैं। क्योंकि रणवीर के जाने के बाद भले ही वह नम्रता को बेटी कहने लगे थे, मगर वह अब भी उनकी बहू ही थी। इसलिए वे यह नहीं चाहते थे कि नम्रता रणवीर को भूला दे, लेकिन फिर धीरे-धीरे राजवीर के प्रति पिंटू का व्यवहार देख उन्हें यह बात समझ आने लगी कि और किसी को हो न हो, किन्तु पिंटू को राजवीर अर्थात एक पिता की बहुत जरूरत है। जिस तरह पिंटू राजवीर के साथ खुश रहता, उसके लिए राजवीर से अच्छा और कोई हो ही नहीं सकता। इसी सोच के चलते, करीब सालभर बाद दादू राजवीर से इस विषय में बात करते हैं।

उनकी बात सुन राजवीर पहले कुछ क्षण चुप रहता है फिर कहता है, ‘अंकल, मुझे तो कोई प्रोब्लम नहीं है, परंतु क्या आपने इस विषय में नम्रता से बात की है? बेटा, अब इस विषय में उससे क्या बात करना, वह एक मां है और एक मां के लिए उसकी संतान से ऊपर कुछ नहीं होता। मुझे यकीन है, उसकी ओर से भी हां ही होगी।

‘जी, लेकिन फिर भी मेरा ऐसा मानना है कि पहले आप उससे एक बार इस विषय में बात कर लें। उसके बाद ही कोई निर्णय लेना चाहिए।’ सुझाव के तौर पर राजवीर ने अपनी बात रखी।अगले दिन नम्रता से इस विषय में बात की जाती है और वह इस रिश्ते से साफ इंकार कर देती है, लेकिन फिर एक बार पिंटू के विषय में सोचकर उसका मन उसे खुद को टटोलने के लिए कहता है, क्योंकि कहीं न कहीं नम्रता को भी यही लगता है कि यदि वह रणवीर को भुलाकर अपने जीवन में आगे बढ़ेगी तो यह उसके और रणवीर के रिश्ते पर एक तरह का धोखा होगा।

इन तर्कों के साथ जब नम्रता अपने मां-पापा को समझा रही थी तो राजवीर ने उनकी बात सुन ली। अब राजवीर ने पहल कर उसे समझाया, ‘देखो, जाने वाले के साथ जाया तो नहीं जा सकता। जो पीछे छूट गए, उन्हें तो अपना जीवन जीना ही पड़ता है। दूसरी बात, इस रिश्ते में रहते हुए भी तुम मेरी तरफ से आजाद ही रहोगी। लेकिन पिंटू हालात का शिकार हो, पिता के प्यार से वंचित हो, यह ठीक नहीं होगा।’ कुछ देर चुप रहने के बाद राजवीर ने फिर उसकी तरफ देखा, ‘बाकी तुम्हारी मर्जी। आखिर यह तुम्हारी जिंदगी है तो इसका फैसला लेने का अधिकार भी तुम्हारा ही है।’

मां-पापा के बहुत समझाने के बाद नम्रता को भी राजवीर के साथ आगे बढ़ने का निर्णय सही लगा और वह इस रिश्ते के लिए हां कह देती है। जिसे सुनकर फिर एक बार उस घर में खुशियों का आगमन हो जाता है और शादी की शहनाई बजने लगती है। इस तरह वह घर उस घर की भगवा दीवार पर टंगी रणवीर की रूह उसके जाने के मातम से हमेशा के लिए ‘मुक्त’ हो जाती है। हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति पा जाती है।

केवल किसी का संसार छोड़कर चले जाना ही मुक्त हो जाना नहीं होता। बल्कि आत्मिक या मानसिक तौर पर भी सांसारिक बंधनों का खत्म हो जाना सही मायनों में मुक्ति कहलाती है। यह तभी संभव होता है, जब उस दिवंगत आत्मा के परिवारजन उसे अपने मोह के बंधनों से मुक्त कर अपने जीवन में आगे बढ़ते हैं।

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