scorecardresearch
For the best experience, open
https://m.jansatta.com
on your mobile browser.

दुनिया मेरे आगे: यही है सूरत-ए-हाल, रोजगार वाली नई शिक्षा नीति और दूसरे देशों में रोजी-रोटी की आस

चांद-सितारों को छूती अटारियां पाने की तमन्ना के साथ विदेश पलायन की होड़ लगी है, जबकि वहां पहुंचे तो छिप-छिप कर भी जीना पड़ता है। आखिर वहां भी सेना सहायकों के नाम पर जरूरत पड़ती रहती है। जनसंपर्क से लेकर ‘ग्रीन कार्ड’ की जरूरत है, लेकिन जो अपना आधार कार्ड न बचा सके, वे ‘ग्रीन कार्ड’ कैसे पाएं? पढ़े सुरेश सेठ का विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: March 04, 2024 08:58 IST
दुनिया मेरे आगे  यही है सूरत ए हाल  रोजगार वाली नई शिक्षा नीति और दूसरे देशों में रोजी रोटी की आस
नई शिक्षा नीति रोजगारपरक है, मगर लाखों लोगों ने भारतीयता छोड़ने की अर्जी दी है। केवल विशिष्ट सेवा से ही लोग एक देश से दूसरे देश तक जाते हैं। शेष लोग यहां अनुकंपा की आशा में नशे की अंधी गलियों में चक्कर लगाते हैं।
Advertisement

देश में शिक्षा क्रांति के नए माडल आ गए हैं। आजकल चुनावी एजंडे में भी नई शिक्षा नीति के साथ नौजवानों की जिंदगी बदल देने के वादे किए जाते हैं। ग्रामीण अंचलों में मोबाइल टावर नहीं, लेकिन वहां इंटरनेट क्रांति का सपना दिखाया जाता है। नई शिक्षा नीति में कृत्रिम मेधा से लेकर चैट-जीपीटी और डीपफेक की बातें धड़ल्ले से की जाती हैं, लेकिन अध्यापक अपने पुराने बिंदुओं को कक्षाओं में व्यर्थ होता देखकर इस नई उपलब्धि से आंख बचाने की कोशिश करते नजर आते हैं। इसीलिए आज भी इन विद्यालय परिसरों में कला संकायों और विज्ञान की शिक्षा लेने वाले अधिक हैं। कंप्यूटर साफ्टवेयर से उन्हें परहेज है, क्योंकि अध्यापक भी इस नई विद्या पर अज्ञानता से सिर खुजाते नजर आते हैं। पुराना सूत्र है ‘बिन विद्या नर पशु समान’। अब बताइए, कौन-सी विद्या?

बदले माहौल में फिसड्डी साबित हो रही है शिक्षा

यह साफ्टवेयर डिजिटल विद्या या वही कला, विज्ञान या पाठ्यक्रम वाली तोता-रटंत शिक्षा। बेशक देश आजाद हुआ तो शिक्षा क्रांति की घोषणा कर दी गई थी। कहा गया था कि देश में कोई पढ़े-लिखे बिना नहीं रहेगा। पढ़ाई का प्रमाण-पत्र और डिग्रियां हर बच्चे के हाथ में होंगी। वे नौकरी के लिए कतार लगा कर बरसों इंतजार नहीं करेंगे। मगर वास्तविकता यह है कि शिक्षा बदले माहौल में फिसड्डी साबित हो रही है और रोजगार दफ्तरों के बाहर धूल फांकता यौवन अब रियायती दुकानों के बाहर खड़ा है। हालात कुछ इस कदर बदले हैं कि नौजवान पढ़-लिख कर इनके नौकरी दिलाऊ दफ्तरों के चक्कर लगाने के बजाय ठेके पर विदेश भिजवाने के संदिग्ध दफ्तरों के बाहर मोर्चा जमाए हैं।

Advertisement

केवल विशिष्ट सेवा से ही लोग दूसरे देश तक जाते हैं

नई शिक्षा नीति रोजगारपरक है, मगर लाखों लोगों ने भारतीयता छोड़ने की अर्जी दी है। केवल विशिष्ट सेवा से ही लोग एक देश से दूसरे देश तक जाते हैं। शेष लोग यहां अनुकंपा की आशा में नशे की अंधी गलियों में चक्कर लगाते हैं। उधर कोई नहीं पूछता कि इतने लोग रोजी-रोटी की तलाश में अपना देश छोड़ कर दूसरे देश कैसे पहुंच गए! अवैध रूप से वहां पहुंचे लोग दोयम दर्जे के असामान्य प्रवासियों के रूप में जीवन जीने के लिए तैयार हैं, लेकिन अपने देश में अव्वल दर्जे का नागरिक बन जाने के लिए प्रस्तुत नहीं।

भूख से आई मौत तो शिक्षित-अशिक्षित का अंतर नहीं करती

दरअसल, यहां अव्वल दर्जे का नागरिक बन कर जीने का अर्थ है रोजगार मेलों में नौकरी मांगने के लिए भटकते रहना, फिर हास्यास्पद वेतन पर काम करने के लिए हामी भरना। मनरेगा के नाम पर ऐसी दिहाड़ियों को सिर-माथे पर लेना जो नौकरी करते हुए भी भुखमरी की सौगात दे सकें। नई शिक्षा नीति से देश को रोजगारपरक तरक्की देने के निरंतर दावों के बीच यह देश भुखमरी सूचकांक में कुछ पायदान नीचे क्यों उतर गया? जो भूख से मरे, उनमें पढ़े-लिखे कितने थे और अनपढ़ कितने? भूख से आई मौत तो शिक्षित-अशिक्षित का अंतर नहीं करती। पढ़ा-लिखा काम करने के लिए न जाने कब से तैयार बैठा है और उसे कैसी सलाह दी जा रही है?

जिन शिक्षालयों में सरस्वती की पूजा होनी चाहिए, वहां पूजक नदारद होते जा रहे हैं। उनके इर्द-गिर्द ‘आईलैट्स’ अकादमियां कुकरमुत्तों की तरह उग आई हैं। वहां पढ़ने वालों की नहीं, विदेश भाग सकने वालों की भीड़ लगी है। ऐसे विशेषज्ञ मिल जाते हैं, जो बताते हैं कि मान्य पलायन के लिए अपेक्षित ‘बैंड’ न भी मिले तो भी उन्हें परदेस भिजवा दिया जाएगा। यह दीगर बात है कि अमेरिका या विलायत जाने के बजाय अरब और अफ्रीकी देशों में पहुंचा दिया जाए। चांद-सितारों को छूती अटारियां पाने की तमन्ना के साथ विदेश पलायन की होड़ लगी है, जबकि वहां पहुंचे तो छिप-छिप कर जीना पड़ता है। आखिर वहां भी सेना सहायकों के नाम पर जरूरत पड़ती रहती है।

Advertisement

जनसंपर्क से लेकर ‘ग्रीन कार्ड’ की जरूरत है, लेकिन जो अपना आधार कार्ड न बचा सके, वे ‘ग्रीन कार्ड’ कैसे पाएं? इधर युवाशक्ति के देश के पास किंकर्त्तव्यविमूढ़ अपने नौजवान हैं। नेता कहते हैं, ‘राज्यों की विलक्षणता बदली है कि अब यहां नौकरी पाने के लिए रिश्वत नहीं देनी पड़ती’ और विश्व का भ्रष्टाचार सूचकांक बताता है कि भ्रष्टाचार उन्मूलन के ऊंचे नारों के बावजूद आज भी देश चिंताजनक स्तर पर खड़ा है। अब तो यह हालत हो गई है कि महंगाई बहुत हो गई है, और केवल वेतन में किसी का गुजारा नहीं होता।

नौनिहालों को इंसान बना सकने वाली शिक्षा क्रांति मुंह बिसूर कर निराश बैठी है। महामारियों ने निजी शिक्षा संस्थानों के बखिये उधेड़ दिए। भरोसा करके भारत का भविष्य छात्र-छात्रएं सस्ते सरकारी स्कूलों की ओर भागे। यहां अधिकांश प्राथमिक स्कूल आज भी वृक्षों के साये तले नामालूम इमारतों में लगते हैं। या ऐसी रंग-बदली इमारतें कि जहां विद्यार्थियों को लगे कि यह छत हमारे सिर पर अब गिरी कि तब गिरी।

चुनावी ज्वार में भिड़ते हुए राजनीतिक दल शिक्षा को लेकर ‘तेरी कमीज से मेरी कमीज ज्यादा उजली है’ के नारे बुलंद करते, लेकिन पढ़ाने वाले अध्यापक बरसों से ठेके पर हैं या कच्चे और अस्थायी रह कर निम्नतम वेतन पर जीते हैं। विपक्षी नेता इन्हें धीरज बंधाते हैं और शिक्षा की बदहाली को बेनकाब करते हैं। विद्यार्थियों की कुछ पूछने की जरूरत नहीं, क्योंकि यहां सिर फूटने की खबरें आने लगती हैं और शिक्षा परिसर खाली होते जा रहे हैं। युवा शक्ति पारपत्रों के दफ्तरों के बाहर कतार बनाकर खड़ी है।

Advertisement
Tags :
Advertisement
tlbr_img1 राष्ट्रीय tlbr_img2 ऑडियो tlbr_img3 गैलरी tlbr_img4 वीडियो