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दुनिया मेरे आगे: धैर्य जीवन के लक्ष्य का खोल देता है द्वार, धैर्य के अतिरिक्त उस द्वार की कोई और कुंजी नहीं

धैर्य वाला इंसान, आत्मविश्वास की नाव पर सवार होकर मुसीबत की हर नदी को सफलता से पार कर सकता है। यह एक अर्जित गुण और अंतरात्मा की औषधि है, जो अंधकार को देर-सबेर हटाकर रौशन करने में मदद करता है। धीर-गंभीर कभी उबाल नहीं खाते। पढ़ें राजेंद्र प्रसाद के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: March 28, 2024 02:52 IST
दुनिया मेरे आगे  धैर्य जीवन के लक्ष्य का खोल देता है द्वार  धैर्य के अतिरिक्त उस द्वार की कोई और कुंजी नहीं
अगर मृत्यु न हो तो जीवन भार बन जाएगा, यह संसार कांटों की तरह चुभने लगेगा। व्यक्ति में जीने की जो चाह है, वह मृत्यु के अप्रत्यक्ष कारण से ही है।
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अमूमन जिंदगी में धीरज और सब्र एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। जब कोई बेचैन या अधीर हो तो सबसे पहले उसका धीरज जवाब देता है और ऐसी में सब्र का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। उदाहरण के तौर पर माली प्रतिदिन पौधों में पानी देता है, मगर फल सिर्फ मौसम में ही आता है। इसीलिए जीवन में धैर्य की भूमिका बढ़ जाती है। बीज अपने समय पर ही फलेगा। आमतौर पर जिंदगी में किसी न किसी मोड़ पर न्यूनाधिक उथल-पुथल मचना स्वाभाविक है। ऐसे में अगर व्यक्तित्व कमजोर है तो अपने आप को नियंत्रण में रखना असंभव नहीं तो मुश्किल है। किसी अनजानी उलझन में बहुत से लोगों में सुलझने की समझ नहीं मिलती, क्योंकि हमने जीवन-दर्शन को इस हद तक पुष्पित-पल्लवित नहीं किया है, जिसके अभाव में अचानक आए संकटों से जूझने में दिक्कत होती है।

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अति उत्साह से नुकसान होता है, अधीरता ठीक नहीं

किसी गुरुकुल में गुरुदेव शिष्यों को बाण चलाना सिखा रहे थे। एक अति-उत्साही शिष्य ने धनुष को इतनी जोर से खींचा कि उसके दो टुकड़े हो गए। गुरुदेव ने शिष्य को ज्ञान दिया कि अधीरता से योग्यता का अपव्यय हो जाता है। लक्ष्य भेदने के लिए जितनी ऊर्जा की जरूरत है, उससे अधिक या कम ऊर्जा के प्रयोग से लक्ष्य साधना कठिन है। हमारा जीवन धनुष की तरह है। अगर धैर्यपूर्वक ऊर्जा को धीरे-धीरे संचित करने के बाद नियंत्रण के साथ इसे खर्च करने की विधि सीख ली जाए तो लक्ष्य कितनी ही दूरी पर क्यों न हो, उसे भेदना असंभव नहीं है। धैर्य जीवन के लक्ष्य का द्वार खोल देता है, क्योंकि धैर्य के अतिरिक्त उस द्वार की कोई और कुंजी नहीं है।

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जिन पेड़ों ने पतझड़ सहे हैं, बसंत उन्हीं पर आता है।

जिन पेड़ों ने पतझड़ सहे हैं, बसंत उन्हीं पर आता है। संकट के समय धैर्य धारण करना ही मानो आधी लड़ाई जीत लेना है। अति-उत्साह या असंयम कार्यफल को सही से फलित नहीं होने देता। जैसे चाक पर चढ़े कच्चे घड़े को अगर समय से पहले उतार लिया जाए तो उसका आकार विकृत हो जाता है। हम परिवर्तन के फल की जल्दबाजी में धैर्य खो बैठते हैं और शीघ्र फल आकांक्षा की हड़बड़ी से ऐसे निर्णय ले बैठते हैं, जिनसे भविष्य बिगड़ सकता है। जिस तरह दो पत्थरों के आपस में रगड़ने से उनका खुरदरापन मिट जाता है, उसी तरह धीरज के साथ काम करते रहने से कार्य भी सहज हो जाते हैं।

बदलते दौर में ऐसे बीज डालने की परंपरा अब खत्म-सी हो रही है, जहां सही रास्ता सीखना, सिखाना, बताना और अपनाना दूभर हो रहा है। लोग आपाधापी में इतने मगन हो जाते हैं कि किसी निष्कर्ष की चिंता किए बगैर अपना संतुलन खोने के लिए हर समय तैयार बैठे हैं। हल्का-सा झोंका भी बड़ी चुनौती या संतुलन को तहस-नहस करने जैसा दिखता है। सौभाग्य से हम इंसान हैं, लेकिन प्राकृतिक रूप से उम्र में बड़े जरूर होते जाते हैं, लेकिन हकीकत में बहुत-कुछ अच्छा या वजनदार सबक सीख नहीं पाते।

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इससे हमारे व्यक्तित्व विकास में धीरज और सब्र-संतोष का योगदान न के बराबर होता है। इससे व्यावहारिकता, सच्चाई, प्रतीक्षा की आदत, दूसरे की कद्र, विपरीत विचारधारा की स्वीकार्यता आदि की कमी से परिवार, भाईचारा, आस-पड़ोस, समाज, देश-प्रदेश में किसी छोटे-से प्रतिकूल झटके में ही उथल-पुथल से स्थिति असहज हो जाती है, जिससे कोहराम मचना स्वाभाविक है। यह तभी होता है, जब हमारे अंदर धीरज की भट्ठी नहीं सुलगती।

जिंदगी सड़क सरीखी है, जो कभी सीधी नहीं होती। हमारे अंदर नकारात्मक या सकारात्मक ऊर्जा रहती है। उसके निखार के लिए संस्कार, परिवार का माहौल, शिक्षा का परिवेश, समाज में मौजूद प्रचलन आदि की गुणवत्ता मशाल का काम करती है। दिक्कत यह है कि मौजूदा शिक्षा ने नौकरी को औजार और जरूरतों ने पैसे को महत्त्वपूर्ण बना दिया है, जो हमारे जीवन पर राज करते मालूम होते हैं।
इससे बहुत सारी चाही-अनचाही वजहें पैदा हो रही हैं। उपयोग और गुणवत्ता में सब मौन-से दिखते हैं, जिससे हम शिक्षित जरूर हो रहे हैं, लेकिन काबिलियत धूल चाट रही होती है। पति-पत्नी में आक्रोश, संतान और बड़ों से खटपट, कुटुंब-कबीले में मन-मुटाव, समाज में गिरावट, गली-मोहल्ले में सामंजस्य का अभाव, विभिन्न धर्मावलंबियों में असहजता आदि धीरज के बिना बढ़ रहे हैं।

युवाशक्ति ऊर्जा का भंडार है और जल्दबाजी में फल को झटकने की लालसा रखती है। ऐसे में ऊर्जा सदुपयोग खतरे में पड़ जाता है। समय आने पर ही कार्य फलित होता है। कभी-कभी प्रगति प्रत्यक्ष न होकर परोक्ष भी होती है। धैर्य वाला इंसान, आत्मविश्वास की नाव पर सवार होकर मुसीबत की हर नदी को सफलता से पार कर सकता है। यह एक अर्जित गुण और अंतरात्मा की औषधि है, जो अंधकार को देर-सबेर हटाकर रौशन करने में मदद करता है। धीर-गंभीर कभी उबाल नहीं खाते। इससे मानसिक ताकत मिलती है। कठिन परिस्थितियों से डरने के बजाय धैर्य से उसका सामना करने की जरूरत है।

हमेशा दिमाग का इस्तेमाल करते हुए समाधान करना चाहिए, क्योंकि बुद्धि बहुत बलवान होती है। अगर धैर्य-गुण हमारे पास है, तब सभी गुणों का भंडार हाथ में है। पक्षी भी जानते हैं कि आकाश में बैठने की जगह नहीं होती। धीर व्यक्तियों का स्वभाव है कि वे आपदा के समय और भी अधिक दृढ़ हो जाते हैं। सब्र की एक बात बहुत अच्छी है कि जब ये आ जाता है तो किसी चीज की तलब नहीं रहती। कबीर ने ठीक ही कहा है कि ‘कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय। टूक एक के कारने, स्वान घरै घर जाय।’

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