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दुनिया मेरे आगे: अनुभव के मरहम, मन की बेचैनी और जीवन में बदलाव के लिए जरूरी है आसपास की समझ

इस संसार में हर किसी के जीवन का कोई ध्येय होता ही है। अगर गौर किया जाए तो वह ऐसा सजीला होता है कि उसे सुनकर अगले की उम्मीद जोर पकड़ ले और उसके भीतर का झरना भी फूट पड़े। अगर ऐसे सजीव चित्र सामने आते-जाते रहें तो क्या बात है। पढ़ें पूनम पांडे के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: March 15, 2024 08:45 IST
दुनिया मेरे आगे  अनुभव के मरहम  मन की बेचैनी और जीवन में बदलाव के लिए जरूरी है आसपास की समझ
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एक झोंका हवा का, एक किरन दिनकर की, एक लम्हा शीतल चांदनी का, किसी सूखे तिनके को ही तरोताजा नहीं कर देता, खिन्न मन के लिए भी वरदान साबित हो जाता है। इस जगत में हर किसी के जीवन में बदलाव होता है। धीरे या त्वरित पर होता जरूर है। मगर यह बदलाव सकारात्मक तभी हो पाता है, जब इस प्रचलित जीवनशैली और चालू विचारधारा को धकेलकर एक नई सूझ विकसित नहीं हो जाती। अचानक किसी से कोई संकेत या सुझाव मिलता है और यह जीवन विविधतापूर्ण दृष्टिकोण का जश्न मनाने लगता है। एक युवक इक्कीस साल की आयु में अपनी पहली नौकरी की जटिलताओं से बहुत हिला हुआ था और उस पर कष्टप्रद यह कि अपने कामकाजी अति व्यस्त माता-पिता से कुछ साझा करने का समुचित अवसर नहीं खोज पा रहा था।

धीरे-धीरे सब आसान हो जाता है, आनंद आने लगता है

अचानक मन में कुछ आया और दो दिन के अवकाश में वह अपनी नानी के गांव चला गया। ननिहाल में सतर्क और जागरूक नानी उसकी बातों को खूब गौर से सुन रही थी और बातचीत के साथ ही अचानक उससे बोली कि कोई बात नहीं, सबके संग ऐसा ही होता है… यह बस एक-दो साल की ही मुश्किल है। मेरे साथ भी ऐसा हुआ था। धीरे-धीरे सब इतना आसान हो जाता है कि आनंद आने लगता है। यह सुनकर युवक ने नानी की तरफ रोमांचित होकर ऐसे देखा जैसे कि नानी कोई डाक्टर हो और उन्होंने उसकी चोट पर मरहम लगा दिया हो।

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जीवन हर दिन एक जैसा नहीं होता है, मनचाहा हासिल नहीं होता

जीवन हर दिन एक जैसा नहीं होता है। हममें से बहुतों की अंदरूनी दुनिया की किस्मत या मुकद्दर के सिक्के ऐसे खोटे हैं कि मनचाहा हासिल नहीं होता। कभी-कभी तो संघर्ष के दौरान परिस्थितियों से लड़ाई में अवसाद और हताशा की लकीरें बहुत तीखी हो जाती हैं। एक ऐसी स्थिति की कल्पना कर सकते हैं, जिसमें हम सड़कों पर ठोकर मारते से चले जा रहे हों कि अचानक कोई मजदूर पत्थर तोड़ता विलासिता के मोह से परे अपने दुर्भाग्य को चुनौती देता काम पर डटा हुआ हमसे एक बोतल पानी मांगकर उसे अमृत कहकर आत्मीय आभार से हमें देवदूत-सा सम्मान देकर चौंका दे। तब हम अचानक अपने अंतस में झांकते-झांकते कब सामान्य हो गए और कब इस मर्म का खुरदुरापन ठीक हो गया, पता ही नहीं लगता।

ये ऐसे अदृश्य टोटके हैं कि इनके असर से यह मन अतरंगी होकर लहलहाने लगता है। एक गांव में एक कुम्हार थे। गांव के लगभग साठ घरों के लिए छोटे-बड़े मटके, सुराही, दीपक, हुक्का, तवे, हांडी, गमले, बच्चों के खिलौने, पूजा के भगवान की मूर्ति आदि सब वही बनाते थे। पर वे उससे भी अधिक कुछ और थे। गांव के किशोर जब अपने घर से किसी बात पर डांटे-फटकारे जाते तो कुम्हार के पास ही आते, जो न तो कोई डिग्रीधारी मनोवैज्ञानिक सलाहकार थे और न कोई दवा या टानिक देते। वे बस शिकायतकर्ता को अपने साथ किसी काम में लगा देते और उस नाराज, रूठे या दुखी किशोर की सभी बातें सुन लेते। अंत में वे बस यही कहते, ‘अच्छा, लेकिन ये सब तो मेरे साथ भी होता था!’ यह सुनने वाला खुश मन से अपने घर लौटता।

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इसी तरह एक महिला आसपड़ोस के घर में त्योहार, शादी, नामकरण आदि अवसरों पर जातीं और मन भरकर शगुन गीत सुना जातीं। गांव की बेटी-बहू के लिए वे कोई चमत्कार थीं, क्योंकि सब उनके पास आतीं और दो घड़ी बैठकर अपनी कोई पीड़ा या मन की बात भी कह देती थी। वे खूब रुचि लेकर सुनतीं, पर वे सीता, सावित्री, तारामती या झांसी की रानी और जीजाबाई आदि के नाम गिनाकर अपने भाग्य से शिकवे करने वाली को जता देतीं कि ‘तुम्हारे घरेलू मामले इनसे जटिल तो कतई नहीं।’ उनकी ऐसी कुछ अन्य बातें भी अचूक असर करतीं। यह नजरिया किसी भी नकारात्मक भाव को तुरंत मिटा देता था।

इस संसार में हर किसी के जीवन का कोई ध्येय होता ही है। अगर गौर किया जाए तो वह ऐसा सजीला होता है कि उसे सुनकर अगले की उम्मीद जोर पकड़ ले और उसके भीतर का झरना भी फूट पड़े। अगर ऐसे सजीव चित्र सामने आते-जाते रहें तो क्या बात है। अन्यथा हम सब जिस परिवेश में सांस ले रहे हैं, वहां अपनी मदद के लिए रास्ते की पड़ताल और ऐसा बोलने वाले रिश्तों की तलाश खुद ही करते रहना चाहिए। कितनी बार एक छोटी-सी दिक्कत ही मन को इतना विचलित और उदास कर देती है कि इंसान सब छोड़ कर जीवन को मिटाने के लिए घर से निकल पड़ता है। मगर उसी समय उसके द्वारा फेंके गए खाने-पीने के सामान या शीतल पेय के कूड़े से किसी कचरा बीनने वाले को एक ठीक-ठाक प्लास्टिक का डिब्बा पाकर ठुमक-ठुमक कर खुश होते हुए देख अपनी वही उदासी निरर्थक लगती है।

जो इंसान अपने घटित होने के पहले से लेकर घटित होने के बाद तक हर छोटी से छोटी चीज का खयाल रखे और समय के हिसाब से बदलती इन बातों के तेवर भांप कर खुद का नवीनीकरण करता रहे तभी सब सार्थक है, अन्यथा कितनी ही आलीशान जिंदगी क्यों न हो जाए, कुंठा या तनाव उसका अंत, विनाश और विघटन साथ लिए आता है। यही बात विचार के संदर्भ में भी सोचनी चाहिए।

हमारे आसपास जो भी हमें मानसिक संबल दे रहा है या जिसकी एक मौन सहमति भी हमको हरियाली से सराबोर कर दे उसका अभिनंदन करना चाहिए। अगर जीवन के एक छोर से दूसरे छोर तक समय के सुर साधने हैं तो हमें हर दिन किसी से सुनी हुई छोटी-छोटी बातों का, उनकी गहराई और उपयोगिता का आदर करना सीखना ही होगा।

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