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दुनिया मेरे आगे: प्रकृति के किनारे से चलते-चलते देखने पर दिखता है सारा विस्तार, दुनिया एक समांतर

जब हम गति में होते हैं तो दुनिया अपने ही निराले अंदाज में सामने आती रहती है। हम कुछ करें या न करें, चलते-चलते संसार को संसार की तरह देखें, थोड़ा रुकें, थोड़ी बातचीत करें, संवाद करें। आसपास की धरती को और उन जगहों के लोगों को इस तरह देखें कि वे परिचय भर में नहीं हैं।
Written by: विवेक कुमार मिश्र
नई दिल्ली | Updated: June 19, 2024 03:15 IST
दुनिया मेरे आगे  प्रकृति के किनारे से चलते चलते देखने पर दिखता है सारा विस्तार  दुनिया एक समांतर
प्रतीकात्मक तस्वीर
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चलते-चलते एक दुनिया को सामान्य से अलग हट कर देखा जाए तो वह आमतौर पर इस तरह दिखती है कि हम कुछ अलग और अपूर्व देख रहे हैं। गति में संसार एक अलग ही रंग में दिखता है। गति दरअसल, सौंदर्य से, जीवन रस से और अलग ही ढंग से देखने को कहती है। संसार को समझने के लिए गति के पंख को लेकर चलना पड़ता है। गति में पूरी दुनिया पृथ्वी के साथ घूमती हुई दिखती है। जब एक ऊंचाई से संसार को देखते हैं, तो एक अलग ही संसार दिखता है। यह संसार कुछ ज्यादा साफ, कुछ अलग और ऐसे दिखता है कि पहली बार ही वह सब देख रहे हों। भले सैकड़ों बार वह दृश्य आंखों से गुजरा हो, पर गति के क्रम में हर बार अंदाज बदल जाता है। हो सकता है कि हमारे सामने हमेशा से इसी तरह संसार आता रहा हो, पर जरूरी नहीं कि वही संसार आए जो एक जगह बैठे रहने में आता है।

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एक जगह से एक गतिशील दुनिया को स्थिर रूप में देखते हैं, जबकि चलते-चलते स्थिर संसार भी इतना गतिशील हो जाता है कि संसार को गति करते ही देखते हैं। चलते-चलते पहाड़ भी घूमता है। अलग-अलग कोणों से दिखाई देता है। एक भाग जो कह रहा होता है, तो वही दूसरा नहीं कहता। दूसरा सिरा नुकीले रूप में दिखता है तो पिछला सिरा पठार की तरह दिखता है और हर हिस्सा सौंदर्य का अलग-अलग रूप दिखता है। यह दिखना हमारी दृष्टि के साथ हमारी गति और सोच के साथ उस समय की उपस्थिति पर निर्भर करता है।

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यह सब कुछ चलते-चलते ही संभव होता है। जब हम चलते हैं तो सड़क और रेल की पटरियां गति पकड़ती दिखती हैं और अपनी गति से इस तरह जोड़ देती हैं कि हम एक अलग ही दुनिया को देखने लगते हैं। यह भी एक विचित्र दृश्य है कि पटरियां और सड़क तो अपनी जगह स्थिर ही रहती हैं, मगर हमारे चलने के समांतर उनके भी गतिमान होने का दृश्य उपस्थित होता है। हालांकि हम अपने गंतव्य या मंजिल पर पहुंचते हैं तो वही सड़क और रेल की पटरियां हमारा साधन बनती हैं।

दरअसल, भागती हुई दुनिया शुरू से ही आकर्षण का केंद्र रही है। न जाने कितनी कितनी तरह की दुनिया को छोड़ते हुए हम चलते चले जाते हैं। सड़क और रेल की पटरियां बहुत दूर के दृश्य को आंखों में बसा देती हैं। दूर से क्षितिज पर घूमते पेड़ ऐसे दिखते हैं कि बस यही लगता है कि चारों तरफ हरियाली भरी हुई है। इसी के साथ खेत और दूर-दूर तक खेत बाग बगीचे और नदियों, नहर, तालाब से भरी दुनिया के वे दृश्य भी सामने आ जाते हैं, जिससे यह पता चलता है कि धरती पर कितना कुछ है और हम हैं कि ठहर कर रुक कर देखने की जगह बस भागते रहते हैं। अगर कभी चलते-चलते हम थोड़ा-सा ठहर कर इन छूटी हुई चीजों को देखते हैं, इन पर विचार करते हैं तो यह दुनिया एक अलग ही रंग रूप में दिखाई देने लगती है। नए आयाम खुलते हैं और इस तरह हमारे विचार के या सोचने-समझने के दायरे को नया विस्तार मिलता है।

किसी भी रास्ते पर निकल जाएं क्षितिज, पहाड़ और आकाश अलग ही तरह से ध्यान खींचते रहते हैं। पहाड़, खेत, हरियाली और बादलों के बीच एक सहज संवाद बन ही जाता है। जब सड़क के रास्ते चलते हैं तो एक अलग ही दृश्यता ध्यान खींचती है। इतना कुछ इस संसार में है कि अपने-अपने हिसाब से सब दुनिया को देखते ही रहते हैं। सबको अपनी रुचि का संसार अलग-अलग रंग में दिख ही जाता है। दुनिया एक जगह रुके रहने में नहीं होती, वह तो चलते-चलते ही दिखती है।

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इस क्रम में एक नई दुनिया ही सामने आ जाती है। संसार को हम कहीं और से नहीं, प्रकृति के किनारे से ही देखते हैं और यह सारा विस्तार चलते-चलते ही दिखता है। जो एक जगह से ही दुनिया देखने की कोशिश करते हैं, वे एक तरह से बंद आंखों से ही संसार को देखते हैं या यह भी कह सकते हैं कि उनके लिए बस वहीं तक दुनिया होती है, जितना भर संसार वे एक स्थिर गति में देखते थे। पर संसार तो गति में दिखता है। बल्कि यों कहा जाए कि संसार का दायरा हमें तभी समझ में आता है, जब हम अपने दायरे से बाहर जाकर संसार को समझने की कोशिश करते हैं, उस प्रक्रिया में शामिल होते हैं।

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जब हम गति में होते हैं तो एक-एक कर दुनिया अपने ही निराले अंदाज में सामने आती रहती है। हम कुछ करें या न करें, चलते-चलते संसार को संसार की तरह देखें, थोड़ा रुकें, थोड़ी बातचीत करें, संवाद करें। आसपास की धरती को और उन जगहों के लोगों को इस तरह देखें कि वे परिचय भर में नहीं हैं। उनके साथ परिचित होने से कहीं ज्यादा आत्मवत रिश्ता है। जब इस तरह हम गतिमान होते हैं, तो कोई जगह अलग नहीं लगती और न ही हम अलगाव के शिकार होते हैं। बल्कि तब हमारे लिए यह संसार यह सब कुछ इतना परिचित और सहज लगने लगता है कि बस लगता है कि यह सब अपना ही तो है। यह दुनिया अपनी ही है, जिसे सहज गति में हम देख रहे हैं और समझ-बूझ रहे हैं। यह सब चलते-चलते ही संभव होता है।

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