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दुनिया मेरे आगे: पढ़ने का अर्थ साक्षर या शिक्षित होना! मनुष्य में संवेदना और दूसरों के प्रति करुणा जगाने का काम करती है शिक्षा

मनुष्य में संवेदना और दूसरों के प्रति करुणा जगाने का काम करती है शिक्षा। अगर प्रेम, मनुष्यता और संवेदना नहीं है तो मनुष्य सिर्फ डिग्रीधारी निस्पंद संवेदनहीन मूरत है, शिक्षित नहीं। शिक्षा का अर्थ केवल कुछ तथ्यों का भंडारण नहीं है। शिक्षा, भीतर सोए मनुष्य तत्त्व को जगाना है। शिक्षा, आंतरिक श्रेष्ठता के जागरण का प्रकल्प है। पढ़ें इनके विचार- गौरव बिस्सा
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: June 08, 2024 00:49 IST
दुनिया मेरे आगे  पढ़ने का अर्थ साक्षर या शिक्षित होना  मनुष्य में संवेदना और दूसरों के प्रति करुणा जगाने का काम करती है शिक्षा
प्रतीकात्मक तस्वीर
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हाल ही में यह खबर आई कि अमेरिका के कुछ स्कूलों में अध्यापकों को बंदूक लेकर आने की अनुमति होगी। निश्चित रूप से इसकी पृष्ठभूमि यह होगी कि पिछले कुछ समय से लगातार किसी बंदूकधारी द्वारा स्कूली बच्चों पर अंधाधुंध गोलीबारी करने की घटनाएं हुईं। मगर सवाल यह भी उठता है कि आखिर अमेरिका की शिक्षा प्रणाली किस जगह अनुतीर्ण हो गई? इंसानी मूल्यों से रहित शिक्षा मनुष्यों के रूप में शैतानों का निर्माण करती प्रतीत होती है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में पैसा कमाने, किसी पद को प्राप्त करने, येन-केन-प्रकारेण सभी सुविधाओं का भंडारण करने को ही सफलता मान लिया गया है। इसके पीछे शिक्षा का एक सबसे बड़ा उद्देश्य पिछड़ता प्रतीत हो रहा है, वह है अच्छे नागरिकों का निर्माण और मनुष्यता का विकास।तथाकथित डिग्रीधारियों का अत्यधिक पेशेवराना रुख विचलित करता है। ‘फायदा क्या है’, ‘पैसा कितना मिलेगा’ आदि की सूचना लेना एक स्तर तक तो सही है, लेकिन सिर्फ इसी विषय को सोचते रहना क्या शिक्षित होना है? यह प्रश्न मन को कचोटता है।

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किसी कक्षा की उपाधि या डिग्री लेना, लिपिक जैसी नौकरी करना, पैसा कमाना और सिर्फ एक प्रतियोगिता का हिस्सा बनकर रह जाना ही क्या जीवन है? यही जीवन है, ऐसी शिक्षा कहां से मिली? दरअसल, वर्तमान समय में शिक्षित होने का अर्थ है आर्थिक क्षेत्र में महारत हासिल करना। शिक्षा तंत्र पैसा कमाना मात्र सिखा रहा लगता है। पैसा कमा लेना बहुत आसान है। उससे ज्यादा मुश्किल है ज्ञान कमाना यानी पढ़कर प्रज्ञा या विद्वता का विकास करना। प्रज्ञा का अर्थ है ज्ञान को जीवन में उतारने की शक्ति। इन दोनों से ही मुश्किल काम है मनुष्यता कमाना यानी लोगों से जुड़ना और उनके सुख-दुख में काम आने का भाव रखना। कष्ट काल में हमारे पास जितने अधिक मित्र होंगे, हम उतने ही सफल और शिक्षित माने जाएंगे। समस्या यह है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली मनुष्य न बनाकर मानो पैसा कमाने वाले यांत्रिक मनुष्यों का निर्माण कर रही है। इस प्रणाली में सभी के पास पैसा, सुविधाएं और संसाधन तो हैं, लेकिन उनमें लोगों से जुड़ कर उन्हें खुशी देने का भाव कमतर है।

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शिक्षित होने का अर्थ इंसानियत का विकास है, मनुष्यता का जागरण है, समानुभूति महसूस करने का प्रक्रम है। अगर ये गुण नहीं तो कैसी शिक्षा, कैसी डिग्री और कैसी सफलता? एक चिकित्सक मरणासन्न मरीज को सामने पड़ा देखने के बावजूद अपनी फीस और खर्च पहले मांगे तो क्या वह शिक्षित है? अध्यापक बालक को पढ़ाने के बजाय उसे कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न देने का कहकर पैसे मांगे तो क्या वह अध्यापक शिक्षित है? ये चिकित्सक या अध्यापक सिर्फ एक डिग्रीधारी साक्षर अनुपयोगी अमानुष हैं। पुस्तकों को रट कर उपाधियां प्राप्त कर चुके संवेदनहीन ऐसे लोगों से समाज भरा पड़ा है। क्या ऐसे लोगों को सफल माना जा सकता है? क्या रोटी कमा लेना, आलीशान मकान और गाड़ी खरीद लेना और सभी संसाधन जुटा लेना ही जीवन है? नहीं। जीवन इससे कुछ अधिक, कुछ बड़ा है।

रोजाना मनुष्यों के अंग बेच देने, बेवजह शल्यक्रिया करने, अपनी जगह किसी अन्य व्यक्ति को परीक्षा में बिठाने आदि के विषय में पढ़कर पीड़ा होती है। क्या ऐसे काम करने वाले व्यक्तियों के पास उपाधियां नहीं थीं? वे उपाधिधारक थे, लेकिन मनुष्य वेश में अमानुष थे। इनके लिए पैसा ही सब कुछ था। सिर्फ पैसा बनाने लायक हो जाना ही शिक्षित होना है, तो आज कुछ तथाकथित शिक्षितों के माता-पिता वृद्धाश्रमों में क्यों होते हैं? वे वृद्धाश्रमों में इसलिए हैं कि उनकी संतानों के पास सिर्फ उपाधियां हैं, नैतिकता और संस्कार नहीं। वास्तविक शिक्षा नैतिक मूल्य देती है और इससे विहीन शिक्षा विकृत मानसिकता वाले लोगों को जन्म देती है। आंकड़ों के अनुसार, तथाकथित शिक्षित समाज में सर्वाधिक तलाक होते हैं अहंकार के चलते। तुच्छ बातों के कारण तलाक होना, तलाक दर का निरंतर बढ़ना क्या दर्शाता है? शिक्षा यह सिखा न सकी कि शिक्षित होने का दूसरा अर्थ है अहंकार का दमन। ‘इदं न मम’ के भाव का विकास शिक्षा है, जिसके अनुसार जो है वह दूसरों का है, मेरा नहीं।

पैसा कमाना द्वितीयक है। प्रारंभिक कार्य है मनुष्य में जीवन मूल्यों का संचार। इसी पल विचार करके देखा जा सकता है कि हमारा दस वर्षीय पुत्र नकल करके कक्षा में प्रथम आ जाता है। क्या हम उसकी पीठ थपथपाएंगे? नहीं। हम उसे समझाएंगे। बाद में वही पुत्र छब्बीस साल का होता है और रिश्वत देकर नौकरी लेना चाहता है। क्या हम उसे यह कहेंगे कि यह तो सेवा शुल्क है और भ्रष्टाचार ही आज का शिष्टाचार है? हम ऐसा नहीं कहेंगे। इसकी वजह है नैतिक मूल्य। शिक्षा नैतिक आचरण, समाज में योगदान देने की सीख देती है, सिर्फ पैसा कमाना नहीं सिखाती।

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पशुओं के पास अपनी प्रकृति का निवास होता है, सुविधाएं होती हैं, भोजन होता है और सुंदरता भी। इन सबके बावजूद उनमें मनुष्य की तरह की संवेदना नहीं दिखती। मनुष्य में संवेदना और दूसरों के प्रति करुणा जगाने का काम करती है शिक्षा। अगर प्रेम, मनुष्यता और संवेदना नहीं है तो मनुष्य सिर्फ डिग्रीधारी निस्पंद संवेदनहीन मूरत है, शिक्षित नहीं। शिक्षा का अर्थ केवल कुछ तथ्यों का भंडारण नहीं है। शिक्षा, भीतर सोए मनुष्य तत्त्व को जगाना है। शिक्षा, आंतरिक श्रेष्ठता के जागरण का प्रकल्प है। शिक्षा से विनम्रता, प्रेमपूर्ण व्यवहार और राष्ट्रप्रेम के साथ समाज को योगदान देने का भाव जागना चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो वह व्यक्ति शिक्षित नहीं है, वह सिर्फ साक्षर है। पढ़ाई के साथ गुणों का विकास भी जरूरी है। शिक्षा व्यवहार में, सीख में, दूसरों को महत्त्वपूर्ण मानने में, समाज को सम्मान देने में झलकती है।

मनुष्य में संवेदना और दूसरों के प्रति करुणा जगाने का काम करती है शिक्षा। अगर प्रेम, मनुष्यता और संवेदना नहीं है तो मनुष्य सिर्फ डिग्रीधारी निस्पंद संवेदनहीन मूरत है, शिक्षित नहीं। शिक्षा का अर्थ केवल कुछ तथ्यों का भंडारण नहीं है। शिक्षा, भीतर सोए मनुष्य तत्त्व को जगाना है। शिक्षा, आंतरिक श्रेष्ठता के जागरण का प्रकल्प है।

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