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दुनिया मेरे आगे: आदत के गुलाम, खुद को बदलने के लिए खुद से लड़ना नहीं, स्वयं को समझाना जरूरी

आदतें तब बनती हैं, जब हम कोई काम इतनी बार करते हैं कि वह सहज हो जाता है। आदत की शक्ति यह है कि यह स्वचालित चीजें बनाती है, जिनके लिए एक बार सचेत, दृढ़ प्रयास की आवश्यकता होती है। आदत का मतलब है कि हम उन चीजों पर कम से कम प्रतिक्रिया करते हैं, जो स्थिर या लगातार और हमेशा होती हैं। पढ़े मनीष कुमार चौधरी के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: June 18, 2024 09:45 IST
दुनिया मेरे आगे  आदत के गुलाम  खुद को बदलने के लिए खुद से लड़ना नहीं  स्वयं को समझाना जरूरी
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(सोशल मीडिया)।
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हम अक्सर आदतों की शक्ति और महत्त्व के बारे में बात करते हैं, लेकिन आदतों के काले पक्षों पर विचार करने की उपेक्षा करते हैं। आदतें हम सभी को प्रभावित करती हैं। हम सभी में ये हैं। कुछ अच्छी, कुछ बुरी। सच यह है कि नई आदत शुरू करने की तुलना में पुरानी आदत को छोड़ना अधिक कठिन होता है। ऐसा इसलिए कि आदतें हमारे दिमाग में गहराई तक बसी होती हैं। वे स्वचालित प्रतिक्रियाएं हैं, जिन्हें हमने समय के साथ विकसित किया है। जब हम किसी आदत को रोकने की कोशिश करते हैं, तो यह किसी तेज गति से भागती ट्रेन को उसकी पटरी पर रोकने की कोशिश करने जैसा है। ट्रेन को रोकने की कोशिश करने के बजाय, अगर हम उसे पुनर्निर्देशित कर सकें तो क्या बेहतर नहीं होगा? याद रखना चाहिए कि यह कोई त्वरित समाधान नहीं है। यह एक यात्रा है। इसमें समय और धैर्य लगता है। इसके लिए दैनिक अभ्यास की आवश्यकता होती है।

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बुरी आदत को छोड़ने के लिए हमें खुद को निर्देशित करना होगा

किसी बुरी आदत को छोड़ना अपने आप से लड़ना नहीं है। यह स्वयं को समझने, अपनी आदतों का अवलोकन करने और एक अलग रास्ता चुनने के बारे में है। अगर हम खुद को थोड़ा-सा बदलते हैं, तो लंबे समय में यह एक बड़ा बदलाव लाएगा। ठीक उसी तरह कि हम समुद्र में एक जहाज पर हैं। अगर जहाज अपनी दिशा को कुछ डिग्री तक बदलता है, तो यह पहली बार में उतना बड़ा नहीं लगेगा। मगर लंबी दूरी पर कुछ डिग्री का मतलब यह हो सकता है कि हम जहां पहुंचेंगे, वहां मीलों का अंतर होगा। हमको रातोंरात खुद को बदलने की जरूरत नहीं है। पूर्ण होने की आवश्यकता भी नहीं है। बस छोटे-छोटे समायोजन करने के लिए अपनी दिशा थोड़ी-सी बदलने के लिए तैयार रहना होगा।

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आदतों का उजला पक्ष अपना दृष्टिकोण बदलना है

एक ही काम को एक ही क्रम में और एक ही तरीके से किया जाए तो धीरे-धीरे ही सही, पूरा जीवन सामान्य दिनचर्या बन जाता है और इस धूसर एकरसता के बाहर की दुनिया शून्य हो जाती है। समस्या तब खड़ी होती है, जब सब कुछ आदतों और दिनचर्या के घने जाल में फंस या उलझ जाता है। हम एक प्रकार के खोल के नीचे दब जाते हैं जो धीरे-धीरे कठोर हो जाता है और हमें कैद कर देता है। आदतों का एक उजला पक्ष भी होता है। अपना दृष्टिकोण बदलना। परिवर्तन तेज नहीं हो सकता और यह हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन समय और प्रयास के साथ, लगभग किसी भी आदत को नया आकार दिया जा सकता है। मार्क ट्वेन ने कहा है कि किसी आदत को खिड़की से बाहर नहीं फेंका जा सकता; इसे एक बार में एक कदम सीढ़ियों से नीचे उतारा जाना चाहिए।

आदतें तब बनती हैं, जब हम कोई काम इतनी बार करते हैं कि वह सहज हो जाता है। आदत की शक्ति यह है कि यह स्वचालित चीजें बनाती है, जिनके लिए एक बार सचेत, दृढ़ प्रयास की आवश्यकता होती है। आदत का मतलब है कि हम उन चीजों पर कम से कम प्रतिक्रिया करते हैं, जो स्थिर या लगातार और हमेशा होती हैं। ये हमें काम आसानी से करने की अनुमति देती हैं। आदतों का एक बड़ा खतरा है कि वे हमें जो देखने की जरूरत है उसे नजरअंदाज करने देती हैं। एक बार जब हम समझ जाते हैं कि आदतें बदल सकती हैं, तो हमारे पास उन्हें दोबारा बनाने की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी आ जाती है। यही वह समय होता है, जब अपनी बुरी आदतों से छुटकारा पाया जा सकता है। अपनी आदतों में कुछ रचनात्मक बदलाव लाने की कोशिश करना चाहिए, भले ही हम कहीं भी और किसी के साथ काम करें।

हमारे मस्तिष्क को काम करने के लिए कुछ आदतन अनुमानों की आवश्यकता होती है और अमूमन सबसे सफल लोग वे होते हैं जो मजबूत आदतें बनाते हैं। हम अक्सर अपनी आदतों से दुखी होते हैं। इसलिए उन आदतों में से कुछ को बदलने और तोड़ने के तरीके खोजने पर विचार करना चाहिए। बुरी आदतों को तोड़ने की तुलना में उन्हें रोकना आसान है। अपनी दैनिक तय गतिविधियों के आराम को चुनौती देकर हम खुद को नए अनुभवों, दृष्टिकोणों और संपर्कों के लिए खोलते हैं। यह मूर्खता होगी कि किसी संकट के आने का इंतजार किया जाए, जिससे हमें आत्मसंतुष्टि से बाहर निकाला जा सके। इसके बजाय हमें विकास करने का लक्ष्य रखना चाहिए, न कि स्थिर रहने का। अगर हम अपने जीवन को निर्देशित करना चाहते हैं, तो हमें अपने निरंतर कार्यों पर नियंत्रण रखना चाहिए। यह वह नहीं है जो हम कभी-कभार करते हैं जो हमारे जीवन को आकार देता है, बल्कि वह है जो हम लगातार करते हैं।

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हमारी आदतें हमें बनाती हैं और हम अपनी आदतें बनाते हैं। दुनिया के लिए हमारी कुल जमा संपत्ति आमतौर पर इस बात से निर्धारित होती है कि हमारी बुरी आदतों को अच्छी आदतों से घटाने के बाद क्या बचता है। परिवर्तन को अपनाना सिर्फ एकरसता से मुक्ति नहीं है, बल्कि उद्देश्य और आनंद से भरा जीवन जीने की दिशा में एक कदम है। दार्शनिक लाओत्से कह गए हैं कि अपने विचारों पर ध्यान दें, वे आपके शब्द बन जाते हैं। अपने शब्दों पर ध्यान दें, वे आपके कार्य बन जाते हैं। अपने कार्यों पर ध्यान दें, वे आपकी आदतें बन जाते हैं। अपनी आदतों पर नजर रखें, वे आपका चरित्र बन जाती हैं। अपने चरित्र पर ध्यान दें, यह आपकी नियति बन जाएगा।

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