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दुनिया मेरे आगे: अपने और अपनों से दूर, जिंदगी पर ही हावी हुए जीवन की कुछ जरूरतें पूरी करने वाले ‘उपकरण’

सब कुछ आनलाइन है। अब कोई कुछ कर भी नहीं सकता। इन सोशल मीडिया उपकरणों से दुनिया भर के साथ संपर्क साधना आसान होता जा रहा है। इसलिए इनके गुलाम बनकर हम और भी सीमाएं तोड़कर आगे जा रहे हैं। मतलब परिवार, समाज, रिश्ते की सीमा तोड़ कर आगे जा रहे हैं। पढ़ें मुग्धा के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: June 17, 2024 08:55 IST
दुनिया मेरे आगे  अपने और अपनों से दूर  जिंदगी पर ही हावी हुए जीवन की कुछ जरूरतें पूरी करने वाले ‘उपकरण’
सोशल मीडिया पर एक हजार मित्र हैं, मगर सामाजिक और भावनात्मक रूप से अकेलापन बढ़ रहा है।
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आज के समय में तेज, तेज और तेज भागना ही जीवन का मंत्र बन चुका है। कहीं आना-जाना हो तो सबसे तेज रफ्तार गाड़ी चाहिए, किसी से बात करनी हो तो सबसे तेज नेटवर्क का फोन चाहिए और कुछ जानना हो तो रंगीन या श्वेत-श्याम पन्नों वाली कोई अच्छी-सी किताब नहीं चाहिए, बल्कि सबसे तेज चलने वाला फोन या लैपटाप चाहिए। अगर कोई इस बात की चर्चा करने लगे कि मुश्किल से तीन-चार दशक पहले तक हजारों गांवों और कस्बों में बैलगाड़ी से आना-जाना भी आनंद देता था, तो शायद आज के किशोर इस पर यकीन न करें और सयाने लोग कहेंगे कि कैसा इंसान है कि विज्ञान की उन्नति के विरुद्ध बात करता है।

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जल्दी, जल्दी, और जल्दी ने शरीर को वाहन का इतना आदी बना दिया है कि थोड़ी दूर भी पैदल चलना बोझ लगने लगा है। मन भी इस हड़बड़ी के जंजाल में फंस गया है। तरह-तरह के ‘टैबलेट’ और कंप्यूटर आज सब कुछ जल्दी-जल्दी और घर बैठे उपलब्ध कराने में सक्षम हैं। किसी को कुछ जानकारी चाहिए तो एक क्लिक पर तरह-तरह का ज्ञान हासिल कर सकते हैं। इतना ही नहीं, कुछ खाना-पीना है, तब भी बीस मिनट के भीतर किसी को खाने-पीने की चीजें या पेय पदार्थ, चूरन, मिठाई, सब कुछ हाथ पर मिल रहे हैं। हमारा रुपया बैठे-बैठे एक बटन दबाते ही हमारी चाहत के अनुसार इधर-उधर जा सकता है। कपड़े-लत्ते, जूते-चप्पल- जो भी खरीदना है, बस एक बटन दबाते ही हमारे सामने पूरी दुकान खुल जाती है।

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निजी स्वतंत्रता का दर्शन सप्रमाण आज की तकनीक ने उपलब्ध करा दिया है। हमको कुछ देखना है, तो अकेले देख लें, कोई दखल नहीं देता। कुछ खाना है तो मंगाते ही दरवाजे पर हाजिर। कुछ सुनना है, तो कान में इयरफोन लगाएं और अकेले-अकेले सुनें। निजी स्वतंत्रता के इस आभास में निजता का अधिकार कहां है, कुछ नहीं पता!

एक जमाना था, जब गांव-गांव, देहात और शहर की कालोनी में भी रामलीला, प्रहसन, नौटंकी कंपनी के रंग-बिरंगे कार्यक्रम, कठपुतली के खेल या सर्कस या जादू के खेल सामूहिक रूप से देखे जाते थे। इन सबका काम भी पेशेवर ही था। मनोरंजन करना और धन कमाना। मगर इन सबका एक बेहद खूबसूरत योगदान था कि सब लोग मिलकर इनका आनंद उठाते थे। समूह के समूह संग ताली बजाते और हंसते थे। इस तरह का भोग भी एक उत्सव बन जाता है। इसमें एक शानदार रंगत होती है। अब तो हाल यह है कि एक ही परिवार के चार लोग खाने की मेज पर अगर कभी एक साथ बैठते हैं, तो भी अलग-अलग खा रहे होते हैं। सबके हाथ में स्मार्टफोन है। उस पर कोई वेब सीरीज देख रहा है, तो कोई लूडो और कोई जुआ खेल रहा है। तकनीक का दखल कुछ परिवारों में इतना अधिक बढ़ गया है कि लोग न तो अपने लोगों के साथ गपशप करते हैं, न उनके पास बैठना पसंद करते हैं।

जीवन की कुछ जरूरतें पूरी करने वाले ‘उपकरण’ जिंदगी पर ही हावी हो गए हैं। सब कुछ आनलाइन है। अब कोई कुछ कर भी नहीं सकता। इन सोशल मीडिया उपकरणों से दुनिया भर के साथ संपर्क साधना आसान होता जा रहा है। इसलिए इनके गुलाम बनकर हम और भी सीमाएं तोड़कर आगे जा रहे हैं। मतलब परिवार, समाज, रिश्ते की सीमा तोड़ कर आगे जा रहे हैं। अपने परंपरागत तौर-तरीके की सीमा का उल्लंघन कर रहे हैं। हाल ही में किसी फिल्म का एक संवाद भी बहुत सटीक था कि पहले जो गंदी और खराब बातें सड़क किनारे के शौचालय में लिखी रहती थीं, अब वह सोशल मीडिया के मंचों पर खुलेआम लिखी जा रही हैं।

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इन दिनों फेसबुक और इस्टाग्राम में बेकार की बातों और बेकार की पोस्ट से लोग आपस में कलह-क्लेश भी करने लगे हैं। सोशल मीडिया पर एक हजार मित्र हैं, मगर सामाजिक और भावनात्मक रूप से अकेलापन बढ़ रहा है। यह एक भयानक सच्चाई है। सारी दुनिया का तो पता है, मगर अपने पड़ोस और मुहल्ले की कोई खबर नहीं। आभासी जुड़ाव और सच से दूरी। अब हम आदमी की नहीं, एप की दुनिया में रहने के आदी हो रहे हैं। बस इसी से जीवन का रूप बिगड़ने लगता है।

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दरअसल, इंसान एक सामाजिक प्राणी है। आज से डेढ़ दशक पहले जब एप्पल कंपनी का आइपैड जारी हुआ था, तब कुछ उत्सुक तकनीक प्रेमियों ने उसके मुखिया स्टीव जाब्स से पूछा कि ‘उनका परिवार और खासकर उनके बच्चे इसे कितना पसंद करते है?’ तब उनका जवाब था, ‘मेरे बच्चों ने इसका कभी इस्तेमाल नहीं किया है। मैं यंत्रों से अपने बच्चों को बचाकर ही रखता हूं।’ हाल में एक खबर थी कि यूरोप और अमेरिका में अवसाद और उदासी के बढ़ते मामलों के मद्देनजर ये सख्त नियम बनाए जा रहे हैं कि पंद्रह वर्ष तक के बच्चे मोबाइल, कंप्यूटर और लैपटाप से दूर ही रहें। इसी दशक ने तकनीक के कारण ये बुरे दिन भी देखे हैं कि सुख, संतोष और आनंद सामाजिक नहीं, एकदम निजी होकर रह गए हैं।

कई बच्चे आलसी और थुलथुल हो रहे हैं। वे पार्क में नहीं जाते, कमरे से बाहर निकलना पसंद नहीं करते, खेलकूद, पर्वतारोहण नहीं करते, कुछ साझा नहीं करते। एक और नकारात्मक प्रभाव कि अनगिनत किशोर और युवा सेल्फी लेने के चक्कर में जान से हाथ धो बैठे। दरअसल, इंसान ने ही ये उपकरण बनाए हैं। आत्ममुग्धता ही इंसान की कमजोरी है। इसी कमजोरी का लाभ यह तकनीक उठा रही है। असली दुनिया से दूर रहकर कल्पना में खोए रहना। जरा-सी मेहनत करके लोकप्रिय होना। यही सब तो हासिल हो रहा है इन यंत्रों से।

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