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दुनिया मेरे आगे: आबोहवा और हमारा जीवन, जलवायु परिवर्तन के प्रति चिंता तो है, लेकिन बचाव पर अमल की फिक्र नहीं

पर्यावरण से जुड़े मुद्दे हम अपनी दिनचर्या में शामिल नहीं करते हैं, मगर पर्यावरण में आ रहे बदलावों की मार झेलते रहते हैं। हमारे कई तौर-तरीके वातावरण को नुकसान पहुंचाने वाले होते हैं। हमें अब ‘बैक टू नेचर’ यानी प्रकृति के पास जैसे अभियान को चलाने के बारे में गंभीरता से सोचना होगा। पढ़ें अमित चमड़िया के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: June 28, 2024 09:41 IST
दुनिया मेरे आगे  आबोहवा और हमारा जीवन  जलवायु परिवर्तन के प्रति चिंता तो है  लेकिन बचाव पर अमल की फिक्र नहीं
हमने पर्यावरण को अपनी दिनचर्या से जोड़ने का प्रयास कभी नहीं किया, जबकि पर्यावरण के नुकसान का सबसे ज्यादा प्रभाव हमारे दिनचर्या पर ही पड़ता हैं।
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आमतौर पर हम अपने आसपास समाज और अर्थ की सुविधा-असुविधा और जटिलताओं में गुम होते हैं और राजनीतिक मुद्दों पर हमारा ध्यान सिर्फ चुनावों के वक्त ही जाता है। जबकि सच यह है कि राजनीति हमारे सामाजिक और आर्थिक जीवन को प्रभावित करती है। सामाजिक जीवन के दायरे में ही अब देश-दुनिया की आबोहवा की मुश्किलें और उससे जुड़े मुद्दों को भी देखा जा सकता है, जिसे देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में लिए गए राजनीतिक फैसले प्रभावित करते हैं, मगर किसी चुनाव में पर्यावरण और इससे संबंधित बिंदु शायद कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाते।

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हमने पर्यावरण को अपनी दिनचर्या से जोड़ने का प्रयास कभी नहीं किया, जबकि पर्यावरण के नुकसान का सबसे ज्यादा प्रभाव हमारे दिनचर्या पर ही पड़ता हैं। हम लोग बड़े होते ही अपनी जाति और धर्म के बारे पहले सोचने लगते हैं, उसके बाद भूख और रोजगार जैसे मुद्दों में अपनी जिंदगी को उलझा पाते हैं और उन्हीं पर बात करते हैं, भले ही उसका हासिल शून्य हो। इसी तरह, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी चीजें भी शायद ही कभी चुनाव में मुद्दा बन पाती हैं। व्यापक प्रभाव के लिहाज से देखें तो इन सबमें पर्यावरण का मुद्दा इन सब मुद्दों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। पर्यावरण को होने वाले नुकसान का प्रभाव केवल स्थानीय नहीं होता, धरती का एक बड़ा हिस्सा इससे प्रभावित होता है। पर्यावरण से जुड़े छोटे-छोटे मानवीय प्रयास पर्यावरण को ठीक रखने में कहीं न कहीं अपना योगदान देते हैं, जिसका आभास हमें नहीं होता है।

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इसी तरह का प्रयास देश के एक बड़े अनुसंधान संस्थान में प्रयोग के तौर पर किया गया, जिसमें वहां हर सोमवार को कर्मचारियों के बीच ‘रिंकल अच्छे हैं’ अभियान की शुरुआत की गई। इस अभियान के तहत उस संस्थान के सभी कर्मचारियों को बिना इस्त्री किए कपड़े पहनने पर जोर दिया गया है। इसके पीछे उद्देश्य यह है कि एक जोड़े कपड़े की इस्त्री करने से जो बिजली खपत होती है, उस बिजली के खर्च से लगभग दो सौ ग्राम कार्बन डाइआक्साइड गैस वातावरण मे फैलती है।

आजकल यह माना जाता है कि इस गैस का वायुमंडल में ज्यादा होना जीवन के लिए खतरनाक है। वास्तव में यह अभियान जलवायु में हो रहे बदलाव से पैदा होने वाले संकट के विरुद्ध एक सांकेतिक लड़ाई हैं। इस समय जबकि जलवायु में बड़ा परिवर्तन होता दिख रहा है, दिनोंदिन औसत तापपान में बढ़ोतरी हो रही है, वैसे में भी जलवायु परिवर्तन से जुड़े मसले देश में चुनाव के मुद्दे नहीं बन पाते हैं।

मसलन, इस बार के चुनाव में भी जलवायु परिवर्तन पर कहीं भी चर्चा नहीं हुई। जब ‘रिंकल अच्छे हैं’ अभियान के जरिए सप्ताह में एक दिन कपड़ों पर इस्त्री न करके कार्बन उत्सर्जन कम करने के प्रयासों के बारे में खबर आई तो एक परिचित विद्यार्थी की याद आई, जो अपने घर सासाराम से दूर पटना के एक विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था। उस समय वह अपने कपड़े को धोने और सुखाने के बाद अच्छे से समेटकर बिस्तर के नीचे रख देता था। अगले दिन जब कपड़े पहनने के लिए निकलता तो कपड़े इस तरह से मिलते जैसे किसी ने कपड़े पर इस्त्री की हो। तब यह बात शायद किसी के दिमाग में नहीं आई कि उस परिचित का यह काम कैसे पर्यावरण का नुकसान होने से बचा रहा है।

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सिक्किम में रहने वाला एक अन्य व्यक्ति अपने घर से कम से कम कूड़ा निकालता है। वह अपनी दिनचर्या में इस बात का खयाल रखता है कि कम से कम चीजें ही कूड़े के रूप में बाहर फेंकी जाएं। रसोई घर से निकलने वाले बेकार हो चुके सामान को वह अपने घर में बनाए गए जुगाड़ से खाद में बदल देता है और इस खाद का प्रयोग वह अपने घर में रखे गमले में कर लेता है।

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यों तो भारत के उत्तर-पूर्व के इलाकों में हरियाली की कमी नहीं हैं, इसके बावजूद इन इलाकों, जैसे सिक्किम, असम, मेघालय में यह देखा जा सकता है कि लोग अपने-अपने घरों में, चाहे वे घर एक कमरे का क्यों न हों, गमले में कई तरह के पौधे उगाते हैं। यह पर्यावरण के प्रति उनकी चिंता को जाहिर करता है। देश के कई हिस्सों में गर्मी के मौसम में घर की खुली छत पर सोने का प्रचलन अब बहुत कम हो गया है। खुली छत पर सोना भी कार्बन उत्सर्जन को कम करता है।

हकीकत यह है कि वातावरण से जुड़े मुद्दे हम अपनी दिनचर्या में शामिल नहीं करते हैं, मगर पर्यावरण में आ रहे बदलावों की मार झेलते रहते हैं। दूसरी ओर, हमारे कई तौर-तरीके वातावरण को नुकसान पहुंचाने वाले होते हैं। हमें अब ‘बैक टू नेचर’ यानी प्रकृति के पास जैसे अभियान को चलाने के बारे में गंभीरता से सोचना होगा। छोटे-छोटे कदम जो पर्यावरण का नुकसान होने से बचा सकते हैं, उनको अपने जीवन में उतारना होगा। हम लोग पर्यावरण के बारे में सोचते तो बहुत हैं, लेकिन अपनी ओर से कुछ ठोस करने के लिए तैयार नहीं होते हैं।

वर्ष 2022 में लगभग पांच हजार भारतीयों के बीच किए गए एक सर्वे के अनुसार यह पाया गया कि इक्यासी फीसद लोग जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंतित हैं, लेकिन इनमें केवल ‘चिंता’ ही ज्यादा दिखाई देती है। अगर इतने लोग अपने दिनचर्या में पर्यावरण को नुकसान से बचाने वाले कार्यों को शामिल कर लें तो निश्चित रूप से हम पर्यावरण को बहुत हद तक बचा लेंगे और औसत तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी को रोक पाएंगे।

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