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दुनिया मेरे आगे: इंसानियत के दायरे और प्रेम का संदेश बांटने वाली सूनी जगहें, ड्योढ़ी लांघने के पहले की सोच

डाकघर के आसपास अपनापे की सुगंध हुआ करती थी, जिससे हर कोई सुवासित होता रहता था। वहां जाते ही हम अपने प्रियजनों का स्मरण करते थे। उन्हें अपनी लेखनी से अपने विचार भेजते थे। कभी मनीआर्डर के रूप में तो कभी चिट्ठी के रूप में। पढें महेश परिमल के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: March 18, 2024 09:30 IST
दुनिया मेरे आगे  इंसानियत के दायरे और प्रेम का संदेश बांटने वाली सूनी जगहें  ड्योढ़ी लांघने के पहले की सोच
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पहले जिस तरह से रेलवे स्टेशनों पर भीड़ हुआ करती थी, आज वैसी ही भीड़ हवाई अड्डों पर देखने को मिलती है। आजकल बसें भी लंबी दूरी के लिए चलने लगी हैं। इसी तरह, पहले डाकघरों में काफी भीड़ होती थी। लोग न केवल रजिस्ट्री, मनिआर्डर के लिए डाकघर जाते थे, बल्कि पोस्टकार्ड, लिफाफे, अंतर्देशीय आदि भी खरीदते थे। यही वह स्थान है, जो आपसी भाईचारे, स्नेह और प्यार के संदेशों के आदान-प्रदान का केंद्र रहता था। डाकखाना प्रेम के संदेशों से भी चलता था। यहां काम करने वाले भी उतने ही व्यावहारिक हुआ करते थे। काम के दौरान आपसी बातचीत भी हो जाती थी। पर अब यह स्थान आपसी स्नेह और प्यार को बांटने वाला स्थान नहीं रहा।

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अब डाकघर भी ‘स्मार्ट’ हो गए हैं। समय के साथ स्वयं को ढालते हुए व्यावसायिक केंद्र में तब्दील होने लगे हैं। जहां सेवा पर व्यवसाय हावी हो जाता है, वह स्थान बहुत ही जल्द अपनापे से दूर होने लगता है। इसलिए डाकघरों में अब वैसा वातावरण दिखाई नहीं देता, जो पहले दिखाई देता था।

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सब कुछ लुटाकर भी कुछ लोगों को चैन नहीं आता

इससे इतर दूसरी जगहें भी हैं, जहां भाव और भावनाओं की पहचान की जा सकती है। सही है कि समाज में ज्यादातर लोग अदालत के परिसर में जाने के सपने से भी दूर रहना चाहते हैं। मगर ऐसे भी लोग होते हैं, जिनकी तमन्ना होती है कि अपने प्रतिद्वंद्वी को वे अदालत तक घसीटकर लाए। बस इसी तमन्ना या ख्वाहिश के बलबूते टकराव का व्यापार बढ़ता जाता है। इंसान के भीतर का शैतान जागता है, तो उसे अच्छे-बुरे का भान नहीं होता। यह शैतान हमेशा जागता रहे, यही तमन्ना कुछ लोगों की होती है और उन्हें इस लड़ाई को मजबूत करने में वकीलों का साथ भी मिल जाता है। अदालत में ‘तारीख पे तारीख’ लेकर मामले लंबा चलते रहते हैं। लोग अपना धन लुटाते रहते हैं। आश्चर्य इस बात का है कि सब कुछ लुटाकर भी कुछ लोगों को चैन नहीं आता और उसके बाद भी उनकी अकड़ कायम रहती है।

प्रेम का संदेश बांटने वाले डाकघर एक तरह से सूने होने लगे हैं

शायद यह भी एक वजह है कि आज प्रेम का संदेश बांटने वाले डाकघर एक तरह से सूने होने लगे हैं। नफरत का विषाणु बांटने वाली जगहें विवेकहीन लोगों की भीड़ में और भी मुखर होने लगी है। प्यार स्नेह डाकघरों के अंदर प्रवेश नहीं कर पा रहे हैं। दूसरी ओर, यहां बिना धन के अदालतों में कुछ भी नहीं होता और डाकघरों में प्रेम बांटने का काम पहले दस से पंद्रह पैसे में होने वाला काम अब एक रुपए के पोस्टकार्ड से होने लगा है। आज भी अगर हम निस्वार्थ प्रेम की झांकी देखना चाहते हैं, तो कुछ चुने हुए धार्मिक स्थलों में जाना चाहिए। मसलन, गुरुद्वारों में लोग जिस तरह से सेवा भाव से काम करते दिखते हैं, उससे लगता है कि समाज में आज नफरत को प्यार से जीतने वाले लोग भी हैं। ईश्वर से सच्चे प्रतिनिधि ऐसा ही करते हैं। सभी धर्म अपने मूल में यही संदेश रखते होंगे।

बहरहाल, डाकघर और कचहरियां समाज के दो ऐसे अंग हैं, जहां पहले इंसानियत का वास होता था। डाकघर के आसपास अपनापे की सुगंध हुआ करती थी, जिससे हर कोई सुवासित होता रहता था। वहां जाते ही हम अपने प्रियजनों का स्मरण करते थे। उन्हें अपनी लेखनी से अपने विचार भेजते थे। कभी मनीआर्डर के रूप में तो कभी चिट्ठी के रूप में। उन दिनों डाकिया भी किसी ईश्वर के दूत से कम नहीं लगता था। सुख-दुख का संदेश बांटने वाला यह हरकारा हम सभी को बिना भेदभाव के अपना प्यार बांटता था। कई घरों के लिए वह एक सदस्य था, जहां बैठकर वह पानी भी पी लेता या नाश्ता भी कर लेता था। आज वह बात नहीं रही। अब सब कुछ व्यवसाय में बदल गया है।

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दूसरी ओर अदालत की ड्योढ़ी लांघने के पहले स्नेह, प्यार, अपनापा वहीं छोड़ना होता है। वहां ले जाना होता है क्रोध, आक्रोश, बदले की धधकती ज्वाला। कहते हैं अदालतों में न्याय मिलता है, पर जिसे न्याय मिलता है, वह भी दुखी होता है, क्योंकि जिसे न्याय मिलना चाहिए, वह तो दुनिया को अलविदा कह चुका होता है और जिसे मिलता है, वह उसका मोल नहीं समझता। जिसे न्याय नहीं मिलता, वह स्वयं को तैयार करने लगता है, एक और लंबी लड़ाई के लिए।

डाकघर वह स्थान था, जहां पहुंचने के पहले ही भीतर का इंसान बाहर आ जाता था। अदालत में पहुंचने के पहले भीतर के इंसान को मारना पड़ता है। डाकघर इंसानियत परोसते रहे हैं। मगर अब इनकी संख्या लगातार कम हो रही हैं। इसका आशय यह हुआ कि इंसानियत परोसने वाली संस्थाएं कम हो रही हैं। अदालतों की संख्या बढ़ रही हैं। इससे किन चीजों और प्रवृत्तियों में बढ़ोतरी हो रही होगी, समझा जा सकता है। इसलिए आजकल कई अपराध ऐसे भी होने लगे हैं, जिसे कोई इंसान नहीं कर सकता। अफसोस कि आज समाज में भी शैतानों की संख्या बढ़ रही है।

कुल मिलाकर आज इंसानियत का पाठ पढ़ाने वाले लोग विलुप्ति के कगार पर हैं। उसे जीवित रखने का काम अब दोयम दर्जे का माना जाने लगा है। जबकि आज समाज के जीवित रहने का आधार ही यही मनुष्यता है। इस पर हावी है आज का शैतान, जो यह अच्छी तरह से जानता है कि मानवता से वह कभी जीत नहीं पाएगा। इसलिए वह अपनी कोशिशें छोड़ नहीं रहा है। वह मानवता को कहीं-कहीं शिथिल भी कर रहा है। बच्चों का आदर्श अब वे लोग होने लगे हैं, जो समाज को गलत दिशा दिखा रहे हैं। प्यार और नफरत की इस लड़ाई में इंसानियत कब तक अपने को बचाए रख सकती है, यही देखना शेष है।

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