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दुनिया मेरे आगे: बदलते वक्त के साथ न सिर्फ सोच, बल्कि नजरिया बदलने की भी जरूरत

कितना अजीब और कितना रहस्यमयी है सब कुछ..! कितने कम लोग हैं इस संसार में जो अपना जीवन केवल अपने लिए और अपनी शर्तों पर जी पाते हैं।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: December 28, 2023 11:10 IST
दुनिया मेरे आगे  बदलते वक्त के साथ न सिर्फ सोच  बल्कि नजरिया बदलने की भी जरूरत
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (फ्रीपिक)।
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पल्लवी सक्सेना

जीवन में दर्शन शब्द का एक अर्थ है ज्ञान का प्रेम। व्यापक अर्थ में दर्शन एक ऐसी गतिविधि है, जिस पर मंथन लोग तब करते हैं, जब वे अपने बारे में, जिस दुनिया में वे रहते हैं और दुनिया और एक-दूसरे के साथ अपने संबंधों के बारे में बुनियादी सच्चाइयों को समझना चाहते हैं। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि जीवन का अर्थ खुशी और पूर्णता पाना है, जबकि अन्य का मानना है कि जीवन का अर्थ एक उच्च उद्देश्य की पूर्ति करना या दुनिया को एक बेहतर जगह बनाना है। फिर भी अन्य लोग मानते हैं कि जीवन का अर्थ केवल अस्तित्व में रहना और अपने आसपास की दुनिया का अनुभव करना है।

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इसी वजह से कई बार ऐसा ही लगता है कि जिंदगी का दूसरा नाम ‘चेकलिस्ट’ या पड़ताल-सूची होना चाहिए। यों जिंदगी को देखने का सभी का अपना एक अलग नजरिया होता है। किसी को यह किताब जैसी जान पड़ती है, तो किसी को एक सफर लगती है। किसी-किसी को सड़क जैसी भी प्रतीत होती है जिंदगी। सोचा जाए तो हमें कब, कहां, किस रूप में और किस पहचान के साथ जन्म लेना है, यह प्रकृति पर निर्भर है।

लेकिन हमारे जन्म के साथ ही उसकी पड़ताल-सूची में एक सही का निशान लग जाता है और फिर जैसे-जैसे यह जीवन आगे बढ़ता है, वह पड़ताल-सूची मानो हमारे हाथ या दिमाग में फिट कर दी जाती है या यों कहें कि थमा दी जाती है कि अब तुमने बोलना सीख लिया, विद्या अर्जन के लिए पाठशाला जाना शुरू कर लिया, अब तुमको अर्जित विद्या समझ आने लगी, जीवन से जुड़े निर्णय लेना सीख लिया, पढ़ाई पूरी हुई, नौकरी मिल गई। इसी तरह न जाने कितने आए-गए, छोटे-बड़े अनगिनत मसलों पर कभी हम तो कभी ऊपर वाला यह दर्ज करते हुए ही इस जीवन नैया को पार लगाता रहता है।

कितना अजीब और कितना रहस्यमयी है सब कुछ..! कितने कम लोग हैं इस संसार में जो अपना जीवन केवल अपने लिए और अपनी शर्तों पर जी पाते हैं। जिनके जीवन में ज्यादा नहीं तो कम से कम एक निशान तो ऐसा होता है, जिसे उन्होंने इस सूची के आधार पर नहीं लगाया होता है, बल्कि खुद की चाहत से खुद की पसंद से लगाया होता है। जिसमें किसी भी प्रकार की कभी कोई विवशता नहीं होती, केवल चाह होती है।

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कमाल की बात तो यह है कि इस निशान का कोई पूर्व निर्धारित क्रम नहीं होता। बस अचानक ही कहीं से कोई बात ऐसी हो जाती है कि रास्ते अपने आप बनते चले जाते हैं।सभी के जीवन में ऐसा नहीं होता। वह कोई-कोई ही होता है जो यह निशान लगा पाता है। इस सबके एक नहीं, बल्कि कई उदाहरण हैं।

मसलन, रंक से राजा बने लोग को ही ले लिया जाए, जिन्होंने अपने जीवन में कामयाबी के उन मुकामों को छुआ, जिन्हें हर कोई नहीं छू सकता। या फिर सधारण तौर पर प्रेम प्रसंगों को ही ले लिया जाए। प्रेम करते तो सभी हैं जीवन में, एक बार या दो बार या इससे ज्यादा भी, लेकिन अपने प्रेम को वास्तविकता में पाना और उसे अपना जीवन-साथी बना पाना सभी के भाग्य में कहां लिखा होता है! यहां बात सच्चे प्रेम की हो रही है, क्षणिक आकर्षण की नहीं।

खैर, केवल इस बात से ही खुश हुआ जा सकता है कि कम से कम कोई मुद्दा तो ऐसा है, जिसका स्त्री-पुरुष के पक्ष से कोई संबंध नहीं है। यहां इंसान कसौटी पर है। हालांकि ढूंढ़ने वाले यहां भी स्त्री और पुरुष की जीवनशैली को थोप सकते हैं। ऐसी सोच रखने वालों के जीवन की पड़ताल सूची का एक निशान होगा। ऐसे न जाने कितने निशान हैं हमारे जीवन के, जिनको अगर हम न लगा पाएं तो कितनी बेचैनी होती है। अधिकार का हनन हो गया हो जैसी अनुभूति होती है। जब भी ऐसा कुछ होता है, तब ऐसे ही एक पड़ताल-सूची की तरह महसूस होती है जिंदगी।

क्या तमाम लोग जीवन को उन पुराने नामों से ही जानते-पहचानते हैं? मसलन, सफर, सड़क, किताब, सागर, लहरें आदि। यह सब सोचकर एक प्रकार का जीवन दर्शन-सा लगता है… जीवन को देखने का एक नया नजरिया। अब यह वास्तव में ऐसा है या नहीं, यह नहीं पता। किसी को शायद पता हो! यों इस नजरिए के साथ नई पीढ़ी को जीवन क्या है, यह समझाना आसान होगा या नहीं? यों भी आज की पीढ़ी को भावनाओं से मतलब नहीं होता।

वह तो वैसे भी जीवन में संक्षिप्त रास्ता ढूंढ़ने में ही अधिक विश्वास रखती है। इसलिए दर्शन उन्हें समझाना थोड़ा मुश्किल होगा। शायद बदलते वक्त के साथ न सिर्फ सोच, बल्कि नजरिया बदलने की भी जरूरत है। तभी शायद सही मायने में बदलाव को महसूस किया जा सकता है।

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