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दुनिया मेरे आगे: धनाढ्य तबकों की भोजन की बर्बादी और निवाले को तरसते लोग, खाली पेट सोने की मजबूरी

थाली में परोसे गए भोजन को बर्बाद करने वाला समाज का वह कौन-सा तबका होता है? और कौन-सा तबका होता है, जो भोजन की उम्मीद में हर रोज सुबह उठता और अक्सर धनाढ्य तबकों की भोजन की बर्बादी की हकीकत देखते हुए रात में खाली पेट किसी तरह सोने की कोशिश करता है? पढ़ें अलका ‘सोनी’ के विचार
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: March 30, 2024 12:05 IST
दुनिया मेरे आगे  धनाढ्य तबकों की भोजन की बर्बादी और निवाले को तरसते लोग  खाली पेट सोने की मजबूरी
वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत की स्थिति अब भी गंभीर है। सवा सौ देशों की वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत अब एक सौ ग्यारहवें स्थान पर आ गया है।
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कहते हैं कि इस संसार की हर घटना के पीछे एक उद्देश्य होता है। वह घटित होकर हमें कुछ न कुछ सिखा जाती है। यह बात अच्छी और बुरी दोनों ही घटनाओं के लिए कही जा सकती है। अब यह हम पर है कि हम उनसे कितना सीख पाते हैं और उन्हें अपने जीवन में कितना आत्मसात कर पाते हैं। प्रकृति हमें बार-बार आंखों में अंगुली डाल कर दिखाती रहती है और हम लापरवाही से अपनी आंखें फेरे बैठे रहते हैं। फिर चाहे वह कोई युद्ध हो, अकाल या कोई महामारी।

आपदाओं से मिलने वाली कई सीखों में से एक है ‘भूख’

इन सबसे मानव जाति हताहत होती रही है। भूख-प्यास, दर्द और तकलीफ से अपना जीवन खोती रही है। जब कभी हम इन परिस्थितियों का सामना कर रहे होते हैं तो आमतौर पर मन में यह जरूर भाव आता है कि बस यह किसी तरह गुजर जाए और उसके बाद फिर हम अच्छे से रहेंगे। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो पाया है कभी! परिस्थितियां बिगड़ती और बनती रहती हैं, लेकिन हम वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं। अपने संकल्प को फिर से भूल जाने के लिए। इन आपदाओं से मिलने वाली कई सीखों में से एक है ‘भूख’।

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कोरोना काल में भूख-प्यास से तड़पते रहे हजारों लोग

हमने लगभग हर आपदा में अन्न के लिए संघर्ष करते और भूख से मरते लोगों को देखा है। फिर चाहे वह किसी युद्ध के बाद भूख से बिलबिलाते लोगों का राहत शिविर में बेचैनी से रोटी बांटने वालों की बाट जोहना हो या फिर अकाल के समय भोजन-पानी के लिए मची जद्दोजहद हो। महज कुछ साल पहले की बात करें, तो कोरोना काल में भूख-प्यास से तड़पते हजारों लोगों ने किस तरह संघर्षों से अपने आपको बचाया, यह वही जानते होंगे। बहुत सारे लोग अपने प्राणों से हाथ धो रहे थे। इस बीच ऐसे तमाम लोग थे, जिन्हें सिर्फ पेट भर अन्न के लिए घंटों पंक्ति में खड़े होने के बाद भी कई बार खाली हाथ लौट जाना पड़ता था।

भूख की चुनौती को झेलना काफी कठिन होता है

जिन्हें आर्थिक अभाव था, उनकी तो दूर, आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को भी कोरोना काल में भोजन के लिए चिंतित होते हुए देखा गया, जब वे पैसा रहते भी भोजन नहीं खरीद पाते थे। हालांकि गरीबी और लाचारी की वजह से भूख से तड़पना और संसाधन रहते हुए भी भूखे रहने की नौबत का सामना करने में बहुत बड़ा फर्क है और दोनों को संवेदना के एक धरातल पर रख कर नहीं देखा जा सकता। बहरहाल, भूख की चुनौती से किसी तरह बाहर आने और बच जाने के बावजूद क्या हम अन्न की अहमियत समझ सके हैं? क्या उनका अपनी जरूरत भर ही संग्रह करना समझ सके हैं?

वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत की स्थिति अब भी गंभीर है। सवा सौ देशों की वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत अब एक सौ ग्यारहवें स्थान पर आ गया है। इतना ही नहीं, भारत में सबसे ज्यादा खराब बाल कुपोषण की स्थिति है जो 18.7 फीसद है। भारत की यह स्थिति वर्ष 2022 से और ज्यादा खराब हो गई है। गौरतलब है कि पिछले साल आई रपट के मुताबिक इस सूचकांक में भारत 107वें स्थान पर था।

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एक ऐसे देश में, जहां प्राचीन युग से ही अन्न को भगवान माना गया है, हमारे यहां अन्नपूर्णा की पूजा की जाती है, अन्न को व्यर्थ न करने की नसीहतें दी जाती है, वहां इसी देश से कुल खाद्य अपशिष्ट में से साठ फीसद हिस्सा हमारे ही घरों से निकलता है। इसे महज विरोधाभासी स्थिति मानकर हम टाल नहीं सकते।

हमारे यहां नवासी हजार करोड़ रुपए का खाना हर वर्ष बर्बाद हो जाता है। थाली में परोसे गए भोजन को बर्बाद करने वाला समाज का वह कौन-सा तबका होता है? और कौन तबका होता है, जो भोजन की उम्मीद में हर रोज सुबह उठता और अक्सर धनाढ्य तबकों की भोजन की बर्बादी की हकीकत देखते हुए रात में खाली पेट किसी तरह सोने की कोशिश करता है? इन हालात में क्या यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी नहीं है कि हम अपने हर दिन के उपयोग पर नजर रखें। साथ ही हर वह कदम उठाएं, जो अन्न की बर्बादी को रोक सके और उसे जरूरतमंद तक पहुंचाने में भी कारगर साबित हो?

मसलन, हम अपने घर की जरूरत के हिसाब से ही अन्न अपने पास रखें या खरीदें। इसके समान ही बेहद अहम पक्ष यह भी है कि उतना ही भोजन पकाएं जो एक वक्त में खत्म हो जाए। ऐसा नहीं कि हमने तो बना लिया, फिर जो फालतू बच गया उसे कूड़ेदान में डाल दिया। या फिर बिना यह सोचे भोजन लेना शुरू कर दें कि कितनी भूख लगी है! इसके बाद कहीं परोसे जा रहे भोजन की जगह पर थाल भर कर खाना ले लिया और उसमें जितना खा सके, खाया और फिर बाकी बचा हुआ फेंक दिया। बिना इस बात की चिंता किए कि हमारे घर या उत्सव के बाहर भी एक दुनिया है, जहां लोग दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहे हैं। वे हमारे फेंके हुए भोजन को हसरत भरी नजरों से देख रहे हैं। उनके लिए राजसी भोजन तो दूर, दो निवाले भी मुहाल हैं।

अगर हम अपनी इस दुनिया से बाहर निकल कर झांकेंगे तो हमें और भी कई दुनियाएं दिखेंगी, जो हमसे आगे या पीछे चल रही होंगी। वे आपको कभी आपदाओं से घिरी, भूख से तड़पती, तो कभी आर्थिक तंगी से जूझती मिलेंगी। इसलिए कोशिश करनी चाहिए कि अन्न का कोई दाना बर्बाद न हो। अगर ऐसा संभव हो सका तो हमारी जरूरत से ज्यादा अनाज जरूरतमंदों तक पहुंच पाने का रास्ता भी आसानी से निकल जाएगा।

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