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दुनिया मेरे आगे: कामयाबी की कसौटी, कक्षा में बैकबेंचर्स रहे बच्चे जिंदगी की पाठशाला में रहते हैं अव्वल

जो बच्चे पीछे की बेंच पर चुपचाप बैठ रहे होंगे, जिन पर कोई ध्यान नहीं देता होगा, वे बच्चे भी बड़ी शांति से अपनी जिम्मेदारियां निभा जाएंगे। दो जोड़ दो बराबर चार तपाक से बता देना काबिलियत नहीं, बल्कि दो जोड़ दो चार कैसे किया जाए, असल काबिलियत यह है। पढ़ें अमन आकाश के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: April 12, 2024 09:09 IST
दुनिया मेरे आगे  कामयाबी की कसौटी  कक्षा में बैकबेंचर्स रहे बच्चे जिंदगी की पाठशाला में रहते हैं अव्वल
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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हर वर्ष दसवीं-बारहवीं की परीक्षाओं के परिणाम आने के बाद सबसे ज्यादा अंक लाने वाले बच्चों के अभिभावक बेहद खुश होते हैं। बच्चों को शुभकामनाएं देकर, मिठाइयां खिलाकर उनका प्रोत्साहन करते हैं। यह होना भी चाहिए। सोशल मीडिया, पबजी, इंस्टाग्राम रील, समाज में बढ़ती नशाखोरी के दौर में बच्चे अगर इन सबसे दूर रहकर परीक्षाओं में बेहतर परिणाम ला रहे हैं तो उनका अभिनंदन बनता है। उनको फूलमालाएं पहनाई जानी चाहिए, मिठाइयां बांटी जानी चाहिए। पर इस सब के बीच एक चीज खटकती है। उन हजारों बच्चों के अभिभावक और समाज कहां होते हैं, जो द्वितीय या तृतीय श्रेणी में पास करते हैं। वे पास तो कर जाते हैं, मगर उनका नंबर कम आता है। कायदे से उन अभिभावकों को भी हिम्मत दिखानी चाहिए कि शाम को अपने बच्चे को लेकर मिठाई खिला आएं या उनके द्वितीय या तृतीय श्रेणी में पास करने की खुशी सोशल मीडिया पर साझा करें। असली प्रोत्साहन की जरूरत उन्हें है। प्रथम श्रेणी में न आकर वे बच्चे कर्महीन या फिसड्डी नहीं हो जाते हैं।

दरअसल शिक्षा की नींव ही हमने गलत रखी है। कक्षाओं में शिक्षकों को वे बच्चे ज्यादा पसंद आते हैं, जिन्हें पाठ जल्दी याद होता है। जो शब्दों के अर्थ झट से बता देते हैं। जो गणित के हिसाब ठीक-ठीक लगा लेते। न्यूटन के नियम से लेकर आर्किमिडीज का सिद्धांत, किसी जटिल पहाड़े से लेकर संस्कृत के श्लोक या धातु रूप जिनकी जबान पर रहता है। जो समय से कक्षा में आकर बैठ जाते हैं और जिनके घरों से उनकी शिकायतें न के बराबर आती हैं। स्वभाविक है कि ऐसे ही विद्यार्थियों को पाकर शिक्षक सुरक्षित महसूस करते हैं। कोचिंग की कक्षाओं की भी यही परंपरा है। चाहे शिक्षक लाख कह लें कि सभी विद्यार्थी हमारे लिए समान हैं, लेकिन यह संभव नहीं हो पाता। पीछे की बेंचों पर बैठने वालों से उनको कम उम्मीद रहती है। संयोग से पास हो गए तो श्रेय मिलना ही है और नहीं हुए तो यह तमगा कि ‘पढ़ने-लिखने में तो मन लगता नहीं था तुम्हारा…. आवारागर्द कहीं के!’

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सही है कि हर कक्षा में कुछ बच्चे होते हैं, जिनका पढ़ने में मन नहीं रमता। कभी सिनेमा देखने निकल गए तो कभी क्रिकेट खेलने चल पड़े दूर गांव में। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा! अगले दिन चार छड़ी खा लेंगे। घर में शिकायत चली भी गई तो देखा जाएगा। ये कोशिश करते भी हैं पढ़ने की, लेकिन रट नहीं पाते। ‘बालकस्य’ की जगह ‘बालकान’ कहने पर इनके कान खींचे जाते, किसी कम प्रचलित शब्द का अर्थ अचानक पूछ दिया जाए तो नहीं बता पाने पर इनके सम्मान में कमी हो जाती। दसवीं तक ऐसे ही मूल्यांकन होता है। पहले की परंपरा आज भी कायम है।

सबको याद होगा कि कक्षा में पीछे बैठने वाले उनके दोस्त कोई द्वितीय तो कोई तृतीय श्रेणी से मैट्रिक पास कर गए, पर वे फिसड्डी नहीं थे। जितनी हीनभावना से उन्हें देखा गया था, उतने के वे अधिकारी नहीं थे। वे उच्चतर शिक्षा हासिल नहीं कर पाए। उनमें से कोई प्रशासनिक सेवाओं या इंजीनियर-चिकित्सक बनने की परीक्षा की तैयारी के लिए कोटा-दिल्ली नहीं जा पाया। कोई सरकारी नौकरी के चक्कर में दस साल से एक ही कमरे में घिस नहीं रहा। मगर आज वैसे तमाम दोस्त जिंदगी की पाठशाला में अव्वल दर्जे पर हैं। अपने पूरे परिवार को संभाल लिया है उन दिनों के लापरवाह कक्षा में पीछे बैठने वाले दोस्तों ने। आज परीक्षाओं की तैयारी करने वाला कोई जब दिल्ली-मुंबई में कहीं उन दोस्तों के कमरों पर परीक्षा के सिलसिले में जाता है तो वही दोस्त कहते हैं कि ‘भाई तू आराम से यहां रह, मस्त परीक्षा दे बिना किसी तनाव के। तेरा दोस्त कमा रहा है न..!’ उन्हें उनके शिक्षक दुत्कारा करते थे।

शाम को निजी कंपनी की नौकरी से थके-हारे दफ्तर से लौटकर जब वे कमरे पर लौटते हैं तो खुलते हैं पिछले दिनों की किताबों के पन्ने। ठहाके लगते हैं। चेहरों पर रौनकें आती हैं, कुछ यादें गुदगुदा जाती हैं, कुछ मायूस कर जाती हैं जब हंसते-हंसाते वे कहते हैं कि ‘भाई पिछले साल छत ढलवा लिया था, इस साल सोच रहा हूं थोड़े पैसे बचाकर प्लास्टर करवा लूं। ये सब भी तो जरूरी है यार। और सोच रहा हूं मम्मी को एक सोने की चेन बनवाकर दे दूं। देखते हैं दिवाली के वक्त तक ‘ओवरटाइम’ लगाकर भी कुछ कर ही लेंगे।’

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कक्षाओं में पीछे बैठने वाले वे दोस्त स्कूल के दिनों में अरस्तू या सुकरात का फलसफा नहीं रटा था, पर जिंदगी के फलसफे में इनका कोई सानी नहीं। गुरुजी आप गलत थे, वे असफल नहीं हुए। आज भी जो बच्चे पीछे की बेंच पर चुपचाप बैठ रहे होंगे, जिन पर कोई ध्यान नहीं देता होगा, जिनको उनके शिक्षक केवल फीस लेने के समय ही टोकते होंगे, वे बच्चे भी बड़ी शांति से अपनी जिम्मेदारियां निभा जाएंगे। दो जोड़ दो बराबर चार तपाक से बता देना काबिलियत नहीं, बल्कि दो जोड़ दो चार कैसे किया जाए, असल काबिलियत यह है। उम्मीद है कि कक्षा में पीछे बैठने वाले दोस्तों की पीढ़ी जब पिता के पद को प्राप्त करेगी, तब अपने बच्चों के द्वितीय या तृतीय श्रेणी पर भी वैसे ही खुशी मनाएगी, जैसे आज का समाज सिर्फ प्रथम को स्वीकारता है..!

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