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दुनिया मेरे आगे: महिलाओं से जुड़े विषयों पर आज भी नजरिए में बदलाव की जरूरत

एक महिला और उसे घेरे में लिए संकुचित विचारधारा वाले बीमार लोगों पर गौर किया जा सकता है, जिनका इलाज अभी तक मिल नहीं पाया है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: March 08, 2024 02:36 IST
दुनिया मेरे आगे  महिलाओं से जुड़े विषयों पर आज भी नजरिए में बदलाव की जरूरत
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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एकता कानूनगो बक्षी

एक समय था जब कई बीमारियां लाइलाज होती थीं। चेचक, मलेरिया और यहां तक कि सामान्य-सा ज्वर भी लंबे समय तक पीड़ादाई बना रहता था। स्वास्थ्य विज्ञानियों द्वारा लगातार अनुसंधान की बदौलत अधिकांश रोगों का इलाज अब है। महत्त्वपूर्ण यह है कि हम अपने कौशल और प्रयासों से अपनी परेशानियों का हल सफलतापूर्वक ढूंढ़ ही लेते हैं। इसके बावजूद कुछ बीमारियां अभी भी लाइलाज बनी हुई हैं।

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यहां तक कि इनसे पीड़ित व्यक्ति अपने स्तर पर संघर्ष करता है, पर अभी भी उसे उसके हिस्से की स्वस्थ हवा मिलना मुश्किल है। अगर हमारा वातावरण दूषित हो, आसपास के लोग बीमार हों तो हम कभी न कभी अस्वस्थ हो ही जाते हैं। दरअसल, यहां उस वैचारिक बीमारी की भी बात है जो हमारे आसपास सामान्य रूप में विद्यमान है। इस बीमारी को कुछ इस तरह स्वीकार कर लिया गया है, मानो यह सब स्वाभाविक है और कोई गंभीर मुद्दा है ही नहीं।

एक महिला और उसे घेरे में लिए संकुचित विचारधारा वाले बीमार लोगों पर गौर किया जा सकता है, जिनका इलाज अभी तक मिल नहीं पाया है। यह भी देखने में आता है कि आत्मनिर्भर शिक्षित महिला भी हमें अक्सर संघर्ष करती दिखाई दे जाती है, जिससे हम समझ सकते हैं कि यह रोग बाकी बीमारियों की तरह कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता के लोगों को ही प्रभावित नहीं करता यह मजबूत लोगों को भी व्यथित कर देता है।

हम एक ऐसे प्रगतिशील समय में जी रहे हैं, जहां बहुत सारे परिवार अपनी बच्चियों को अपने बेटे की तरह ही हर क्षेत्र में उड़ने की इजाजत देते हैं। यहां तक कि महिलाओं से जुड़े छोटे-बड़े आयोजनों में बेटियों की शिक्षा, विकास और उनके सशक्तीकरण जैसे मुद्दों को उठाया जाता रहा है। कभी शिक्षा, कभी साधन, कभी आरक्षण की मदद उन्हें दी जाती रही है। हर जरूरतमंद तक मदद का हाथ आवश्यक रूप से जाना ही चाहिए।

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अपनी बच्चियों और महिलाओं को सहूलियत देते हुए हम भीतर से अपने आप को संतुष्टि के भाव से भर लेते हैं, गौरवान्वित होते हैं कि हम स्वस्थ मानसिकता के व्यक्ति हैं, मगर हममें से अधिकांश लोग अधकचरे ज्ञान और समझ से भरे हुए होते हैं। कुछ जगह प्रगतिशील दिखाई देते हैं तो कहीं पीढ़ियों से चली आ रही रूढ़िवादी चीजें हमें लोकलाज के चलते ठीक लगने लगती हैं। ऐसे में हम स्त्रियों पर कुछ बातें जबरदस्ती थोप देते हैं या फिर भावनात्मक रूप से प्रभावित कर परंपराओं और मान्यताओं के बंधन में जकड़ लेने का प्रयास भी करने लगते हैं।

किसी अन्य के बजाय व्यक्ति खुद की परिस्थितियों को बेहतर समझ सकता है। किसी भी नियम का अपने जीवन और अपने ऊपर लागू करना खुद समझ सकता है। किसी के ऊपर किसी भी तरह का नियम जबरन लगाना उसके जीवन की स्वाभाविकता पर अतिक्रमण ही होगा। यह कितना उचित है, यह भी समझा जाना चाहिए। यह प्रेम की श्रेणी में नहीं आता, इसे घुसपैठ माना जा सकता है। कहते हैं प्रकृति को बचाने का सबसे सफल तरीका है, उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाए। वह खुद सक्षम है अपने आपको सुरक्षित और स्वस्थ बनाए रखने के लिए। आवश्यकता है हम अपनी हरकतों पर गौर करें, खुद को बेहतर और समझदार बनाएं, ताकि दूसरों के जीवन मे भी प्राकृतिक हवा बह सके।

यह सुखद है कि जीवन के सौंदर्य को बढ़ाते हुए बड़ी ही सावधानी और साहसी कदमों से खुले और स्वस्थ विचार वाले पुरुषों ने अहंकार में लिपटी सोच से एक हद तक खुद को मुक्त किया है। वे संवेदनशीलता के साथ अपने साथी की भावनाओं से जुड़कर साथ खड़े रहने की भरसक कोशिश करते नजर आ रहे हैं। निस्संदेह स्त्रियों के जीवन में ऐसा सहयोग बेहतर उम्मीद जगाता है।

हमारी संकुचित, पूर्वाग्रह से बनाई गई किसी भी व्यक्ति की अच्छी बुरी विशिष्ट छवि हमें और हमारे समूचे वातावरण को बीमार करने के लिए पर्याप्त है। हर व्यक्ति इंद्रधनुष के रंगों की तरह भिन्न होता है। उसके व्यक्तित्व को नापने का कोई एक मापदंड नहीं रखा जा सकता। स्त्रियों को भी उनके स्वाभाविक तरीके से उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में परिपक्व संतुलित नजरिए के साथ देखना और स्वीकार करना जरूरी होगा। महिलाओं से जुड़े विषयों पर आज भी हमारे नजरिए में बदलाव की जरूरत है।

ऐसे में समाज और परिजनों के कुछ सवाल स्त्री के जीवन और उसके हौसलों को निरुत्साहित करने का काम भी कर सकते हैं। मसलन, क्या वह नौकरी करना चाहती है या शादी करना चाहती है या अकेले रहना चाहती है। घर की देखभाल कैसे करेगी, बच्चों का पालन पोषण किस तरह करेगी! ऐसे कई गैरजरूरी सवालों से भरा वातावरण मौजूदा वक्त में ‘प्रदूषण’ की श्रेणी में रखा जा सकता है और स्त्री मन को बीमारी की ओर ही धकेलता है।

हम जब किसी को अपने से कमतर होने की गलतफहमी पाल लेते हैं या उस पर अनावश्यक हक जताने लगते हैं, उसके ऊपर कई जिम्मेदारियों और नियमों का बोझ डाल देते हैं, तब स्वयं को और दूसरों को भी बीमार बनाने लगते हैं। हमें लगता है कि उस व्यक्ति को हमारे हिसाब से चलना चाहिए, तब उसकी मौलिकता को खत्म कर देने की ओर आगे बढ़ रहे होते हैं।

हमें पता ही नहीं चलता कि उस स्वस्थ इंसान का हम कितना मानसिक और शारीरिक नुकसान कर रहे होते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि सामने खड़ा जीता जागता व्यक्ति अपने आप में एक अद्भुत रचना है, जिसकी अपनी खूबियां हैं और उसकी अपनी खूबसूरत यात्रा है, जो वह अपने अनूठे ढंग से जी सकता है। हमें बस कुछ कदम पीछे लेने की जरूरत है, ताकि उसे उसका रास्ता ठीक तरह से नजर आ सके।

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