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दुनिया मेरे आगे: जीवन में दूसरों के लिए जगह, निजी परिवार के दायरे से बाहर निकलने का सुख

आज का मनुष्य ‘सैद्धांतिक आसमान’ यानी ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ से गिरकर ‘खजूर पर’ यानी ‘मानव केंद्रित’ भी नहीं रह सका, बल्कि सीधा नीचे आकर ‘स्वकेंद्रित’ हो गया। इसका ही यह परिणाम है कि आज किसी को दुख और कष्ट में देखकर भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: February 12, 2024 09:52 IST
दुनिया मेरे आगे  जीवन में दूसरों के लिए जगह  निजी परिवार के दायरे से बाहर निकलने का सुख
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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चेतनादित्य आलोक

हमारी संस्कृति हमें न तो ‘स्वकेंद्रित’ रहने की प्रेरणा देती है और न ही ‘मानव केंद्रित’ होने का पाठ पढ़ाती है। यह शुरू से ही हमें यह सिखाती आई है कि हमारे जीवन में सदा दूसरों के लिए भी स्थान होना चाहिए। यहां पर ‘दूसरों’ का तात्पर्य सिर्फ ‘दूसरे लोग अथवा व्यक्ति’ से ही नहीं होता, बल्कि इसका तात्पर्य अपने शरीर के अतिरिक्त अन्य तमाम प्राणियों से होता है, जिनमें मनुष्यों के अलावा पशु-पक्षी और कीट-पतंगे आदि समस्त जीवधारी शामिल होते हैं।

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संपूर्ण पृथ्वी हमारा घर है और निवास करने वाले समस्त प्राणी परिवार

दूसरे शब्दों में कहें तो हमारी संस्कृति हमें अपने आसपास के रहवासियों के प्रति तो जिम्मेदारी का भाव रखना सिखाती ही है, लेकिन शारीरिक रूप से हमसे दूरस्थ प्राणियों के साथ भी चिंतन और सरोकार के माध्यम से संबद्ध रहने की प्रेरणा देती है। इसी महती भावना की अभिव्यक्ति हमारे धार्मिक एवं आध्यात्मिक ग्रंथों के माध्यम से ऋषि-मनीषियों ने समय-समय पर की है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ जैसा आर्ष वाक्य इसका एक सटीक उदाहरण है, जो महोपनिषद के चतुर्थ अध्याय के एकहत्तरवें श्लोक ‘अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतसाम्, उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्’ का हिस्सा है। इसका अर्थ है- ‘वसुधा यानी पृथ्वी ही परिवार है।’ इस सिद्धांत पर केंद्रित होने का तात्पर्य यह होता है कि यह संपूर्ण पृथ्वी हमारा घर है और इस पर निवास करने वाले समस्त प्राणी एक ही परिवार के सदस्य हैं।

चिंतन, सोच और सरोकार अब निजी परिवार तक ही सिमट कर रह गए

जाहिर है, ऐसे में तो हमें प्रत्येक मनुष्य ही नहीं, बल्कि सभी जीव-जंतुओं और कीट-पतंगों के प्रति संवेदनशील और जिम्मेदार होना चाहिए। इस मामले में अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य की जिम्मेदारी सर्वाधिक बनती है, क्योंकि प्रकृति ने मनुष्य को वह क्षमता प्रदान की है, कि वह अपने और दूसरों के अच्छे-बुरे को भली-भांति समझ सकता है। दुर्भाग्य से आज की आपाधापी वाली जिंदगी में मनुष्य के पास इतना समय नहीं है कि वह अपने छोटे से निजी परिवार के दायरे से बाहर जाकर दूसरों के बारे में कुछ सोचे-विचारे। उसके चिंतन, सोच और सरोकार तो अब उसके निजी परिवार तक ही सिमट कर रह गए हैं।

आज किसी को दुख और कष्ट में देख भी किसी को फर्क नहीं पड़ता

आशय यह कि आज का मनुष्य ‘सैद्धांतिक आसमान’ यानी ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ से गिरकर ‘खजूर पर’ यानी ‘मानव केंद्रित’ भी नहीं रह सका, बल्कि सीधा नीचे आकर ‘स्वकेंद्रित’ हो गया। इसका ही यह परिणाम है कि आज किसी को दुख और कष्ट में देखकर भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। राह चलते कोई दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है, तो उसकी सहायता करने के बजाय लोग वीडियो और सेल्फी बनाने लगते हैं। यह न केवल हमारी संवेदनहीनता को दर्शाता है, बल्कि छीजती सांस्कृतिक गरिमा और परंपरा तथा नष्ट होते संस्कारों का द्योतक भी है।

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कष्ट में रह रहे जीव को बचाने की जगह उसका आनंद लेते हैं लोग

इस वर्ष जब देश भर में बड़े ही धूमधाम से मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जा रहा था, तब यह देखकर बेहद दुख हुआ कि पतंग के मांझे में बुरी तरह से उलझा एक घायल, लहूलुहान कबूतर को घेरकर कुछ युवक खड़े हैं। उनमें से कई वीडियो या सेल्फी बना रहे थे, तो कई मांझे से निकलने के कबूतर के असफल प्रयासों को मनोरंजन का साधन मानकर चीख-चिल्ला रहे थे… सीटी और तालियां बजा रहे थे। युवकों को समझाने की कोशिश बेकार थी। उल्टे कबूतर को माझे के फंदे से छुड़ाने की कोशिश पर कुछ युवक हंसने लगे।

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दुख इस बात का अधिक है कि मकर संक्रांति पर पतंगें उड़ाने की पुरानी परंपरा को तो हमारे समाज ने देश भर में जीवित रख लिया, लेकिन ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ जैसी आदर्श परंपरा और विचारधारा को अपने व्यवहारों में बनाए रखना जरूरी नहीं समझा। देखा जाए तो प्रत्येक वर्ष पतंगबाजी के कारण सैकड़ों दुर्घटनाएं घटित होती हैं। दर्जनों लोगों को प्राण गंवाना पड़ता है और न जाने कितने परिंदों की पतंगों में प्रयुक्त होने वाले मांझे से कट कर मौत हो जाती है।

दुर्भाग्य से हम प्रत्येक वर्ष ऐसी घटनाओं को घटित होते देखते-सुनते और पढ़ते हैं, फिर चुपचाप अपने निजी कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं। जबकि आज हमें यह समझने की आवश्यकता है कि हमारे आसपास रहने-जीने वाले न केवल मनुष्यों, बल्कि पशुओं एवं कीट-पतंगों समेत तमाम प्राणियों, यहां तक कि जीवाणुओं तथा विषाणुओं की मनोदशा का भी हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जरा सोचिए कि ये पक्षी जब हमारे घर-आंगन, बालकनी में चहकते-फुदकते हैं तो महज कुछ देर तक उनका सान्निध्य पाकर ही हमारा मन-आंगन कैसे प्रसन्नता से भर जाता है। क्या यह सच नहीं है कि इन परिंदों का सामीप्य पाकर ही किसी व्यक्ति की तमाम निराशा और उदासी छू-मंतर हो जाती है?

बहरहाल, आंकड़ों की बात करें तो केवल इस वर्ष देश भर में सौ से भी अधिक दुर्घटनाएं घटित हुईं। छतों, बालकनियों और मैदानों से उठे वो काटा… वो मारा… ढील दो… खींचो… काटो… शाबाश… आदि के शोर के बीच किसी पक्षी की गर्दन कटी तो किसी का गला कटा, कोई इंसान घायल होकर अस्पताल में पड़ा रहा, तो कोई टांके लगवाकर घर लौटा। इनके अतिक्ति देश भर में न जाने कितनी जानें गई होंगी। यह स्थिति तब है, जबकि 2016 में ‘राष्ट्रीय हरित पंचाट’ ने चीनी मांझे को पूरी तरह से प्रतिबंधित करते हुए इसके विक्रेताओं और उपयोगकर्ताओं को पांच वर्ष की जेल और एक लाख रुपए तक जुर्माना वसूलने का आदेश दिया था। प्रश्न है कि हम दूसरों की जिंदगियों के मोल अपने लिए खुशियां कब तक जुटाते रहेंगे!

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