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दुनिया मेरे आगे: पारदर्शिता के संसार में चल रहे कुछ नए प्रयोग

आजकल बहुत सारी ऐसी बातें सामने घट रही हैं, जिनमें बाल की खाल उधेड़ना न केवल अमूर्त सुख देता है, बल्कि उससे कई नई आयाम भी निकल आ सकते हैं।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
Updated: November 15, 2023 10:25 IST
दुनिया मेरे आगे  पारदर्शिता के संसार में चल रहे कुछ नए प्रयोग
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (फ्रीपिक)।
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ब्रजेश कानूनगो

कुछ बातें समझने के लिए कोई दार्शनिक होने की जरूरत नहीं पड़ती और न ही दर्शन का कोई अध्येता होने की। खुद को एक दृष्टा समझने के बजाय सिर्फ दर्शक समझ कर चुपचाप दर्शन में लगे रहा जाए, यानी किसी संदर्भ को देखना, निहारना, टापते रहना, तो उसके बारे में कई बार समझना संभव हो जाता है। जरूरत बस इसकी है कि जब कहीं कोई अवांछित बात देखी जाए, तो उस पर गौर किया जाए।

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यों भी आजकल बहुत सारी ऐसी बातें सामने घट रही हैं, जिनमें बाल की खाल उधेड़ना न केवल अमूर्त सुख देता है, बल्कि उससे कई नई आयाम भी निकल आ सकते हैं। हालांकि बाल की खाल उधेड़ने वाले कई लोग ऐसे भी हो सकते हैं, जो अपने भोजन में किसी के धोखे से गिरे बाल को देख लें, तो चुपचाप उसे हटा देते हैं, लेकिन किसी सहज दिखने वाली बातों पर भी सवाल करके उसके वास्तविक अर्थ निकाल लाते हैं।

मसलन, किसी के सुंदर और सौम्य दिखने वाले चेहरे के पीछे उसका विकृत मन भी छिपा हो सकता है। सौंदर्यबोध की पारंपरिक परिभाषा में कुछ धारणाएं ठहरी हुई हैं, मगर जब आधुनिक सौंदर्यबोध में भी कोई प्रश्न नहीं दिखता है तो अफसोस होता है।

बहरहाल, एक होता है समदर्शी और एक होता है पारदर्शी। बड़े कमाल के होते हैं ये दोनों शब्द। समदर्शी तो एक मायने में ठीक ही लगता है। सबको एक निगाह से देखना और एक लाठी से हांक देना जैसी फिजूल बातों को अगर छोड़ दें तो यह एक बेहतरीन विचार है। समानता हर धर्म और मत का सपना रहा है, किसी मानवीय विचारधारा के लिए बेहतर इंसानी समाज बनाने का उद्देश्य रहा है।

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मगर कई बार पारदर्शी शब्द पर गहरे जाकर सोचने का मन करता है। जब भी कोई घोटाला उजागर होता है, तब अपने बचाव में आरोपी पक्ष यही कहता सामने आता है कि हमने संपूर्ण पारदर्शिता बरती थी, लेकिन घोटाला हो गया है। घोटाले के दैत्य पर पारदर्शिता के सुकोमल शब्द-पंख चिपका कर पूरे प्रकरण को अक्सर मनोहारी परिंदे का रूप देकर उड़ा देने के प्रयास होने लगते हैं।

पारदर्शिता का यह नया मुहावरा इन दिनों बहुतायत से चलन में है। व्यक्ति हो, प्रशासन हो या नीति या प्रक्रिया अपनाने की बात हो, हर कहीं ‘पारदर्शिता’ की फिटकरी घुमाकर गंदगी का तलछट हटाने की कोशिश की जाने लगती है। आदमी भले ही बेईमान हो, लेकिन उसका व्यक्तित्व पारदर्शी कहा जाता है, ऐसी प्रक्रिया भले ही अपनाई गई हो, जिससे देश के राजस्व को चूना लगा हो, लेकिन उसे सौ फीसद पारदर्शी सिद्ध करने की कोशिश की जाने लगती है।

आखिर यह पारदर्शी क्या है? शाब्दिक रूप से समझा जाए तो ऐसी चीज, जिसके आर-पार देखा जा सके। जैसे कांच होता है, ठहरा हुआ जल और चश्मे का लेंस होता है। पारदर्शी व्यक्तित्व के अंदर और उसकी पीठ के पीछे जो कुछ छिपा हुआ हो, स्पष्ट नजर आ सकता है। वह छिपा नहीं रह सकता, बल्कि देखा जा सकता है। कहने का मतलब यह भी हुआ कि जो बातें बाहर से दिख रही हैं, वही अंदर भी हैं। यह नहीं कि कहने को किया जा रहा हो कुछ और करने के स्तर पर चल रहा हो कुछ और।

प्रश्न यह उठता है कि अगर किसी व्यक्ति विशेष का व्यक्तित्व पारदर्शी है तो क्या वह इतना पारदर्शी हो सकता है कि अपने अंदर होने वाली या उसकी आड़ लेकर की जानेवाली सारी बेईमानियों को स्पष्ट नजर आने देगा? क्या उसमे इतनी पारदर्शिता बनी रह सकेगी? या फिर वह स्वार्थ की धुंध से अपनी असली पहचान को ही ओझल बना कर लोगों को भ्रमित करने की चेष्टा करेगा?

यह भी हो सकता है कि उसकी पारदर्शिता किसी लेंस की तरह हो जो वास्तविकताओं को छोटा या बड़ा या फिर विकृत बना कर प्रस्तुत कर दे। विज्ञान और तकनीक की दुनिया के विस्तार के साथ-साथ ऐसा लगता है कि पारदर्शिता के संसार में भी कुछ नए प्रयोग चल रहे हैं, जिसमें कई बार आरपार एक-समान दिखने वाले दृश्य भी कई स्तरों पर कुछ और ही संदर्भ लिए होते हैं।

कई राज्यों के दावे रहते हैं कि उनकी सरकार और उनका प्रशासन जनता को समूची व्यवस्था में पारदर्शिता उपलब्ध कराने को प्राथमिकता दे रहा है। यह सुखद लगता है कि प्रशासन पारदर्शी हो और प्रशासन की मशीनरी में होने वाले भ्रष्टाचार और उसमें व्याप्त गंदगियां नागरिकों को स्पष्ट नजर आ सकें।

आम आदमी देख सके कि अपना काम करवाने के लिए कहां और कितनी ‘भेंट’ चढ़ानी पड़ रही है, कहां और किसके संपर्क से काम बन सकता है। पारदर्शिता के कारण लेनदेन या समझौते के सूत्र और गलियारे खोजने मे आसानी हो सकती है। पारदर्शी प्रशासन में सब कुछ साफ-साफ नजर आ सकेगा कि किस नेता को साधने से ‘उत्पादक क्षेत्र’ में स्थानांतरण करवाया जा सकता है।

प्रशासन के किस पेंच में तेल डालकर प्रशासनिक घर्षण को कम किया जा सकता है। प्रशासन का पारदर्शी होना गरीब सुखिया से लेकर करोड़पति सेठ सुखनंदन तक के लिए हितकारी है। सवाल है कि इसमें फर्क कैसे किया जाएगा कि दोनों के हित के संदर्भ में इंसाफ और औचित्य किस पक्ष में खड़ा है!

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