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दुनिया मेरे आगे: पहचान का संकट, जहां हमें पहुंचना था, वहां हमसे पहले पहुंच रहा बाजार

जीवन जीने के लिए करोड़ों की संपत्ति नहीं, बल्कि रिश्तों में आपसी सद्भाव, प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति सम्मान और अपनी परेशानी और दुख को साझा करने के लिए रिश्तों में उचित जगह का होना, ये सारी चीजें ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। आज हमारे पास जानने वालों की संख्या बहुत है, पर हमें पहचानने वाला अपना कोई नहीं।
Written by: पूजा खिल्लन
नई दिल्ली | Updated: May 13, 2024 12:17 IST
दुनिया मेरे आगे  पहचान का संकट  जहां हमें पहुंचना था  वहां हमसे पहले पहुंच रहा बाजार
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -सोशल मीडिया)।
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सच्ची शिक्षा, कला और ज्ञान मनुष्य को मनुष्य से जोड़ते हैं। ये हमें एक-दूसरे के निकट ले जाते हैं। हमारी संस्कृति का मूल भी यही है- एक-दूसरे तक पहुंचना। मगर आज हम एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। दरअसल, जहां हमें पहुंचना था, वहां हमसे पहले बाजार पहुंच रहा है। बाजार हमारे घर तक आ पहुंचा है और हम निरुपाय, ठगे से चुपचाप यह तमाशा देख रहे हैं। बाजार ने मनुष्य की पहचान खरीदार के रूप में की है। इसने मनुष्य की परिभाषा ही बदलकर रख दी है। कल तक मनुष्य की पहचान उसके संस्कार और गुण देखकर की जाती थी, आज उसका धन देखकर की जाती है।

बाजार इस सोच से चलता है कि जिसकी जेब में पैसा है वह मनुष्य है, बाकी सब गौण हैं। हमारी संस्कृति कहती है ‘वसुधैव कुटुम्बकम’, यानी विश्व एक परिवार है और हम चाहे किसी भी जाति, धर्म या व्यवसाय के हों, इसके सदस्य हैं। वहीं बाजार और तकनीक का कहना है कि संसार एक ‘ग्लोबल विलेज’ है, मगर व्यवसाय की दृष्टि से। हम घर बैठे कहीं से भी एक-दूसरे से संपर्क साध सकते हैं और वह भी मिनटों में। सवाल यह भी है कि इतने संपर्क और साधनों में मनुष्य अपने संबंधों और नातों में अकेला क्यों होता जा रहा है?

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पिछले दिनों एक खबर आई थी कि एक महिला ने अपनी इमारत की चौथी मंजिल से कूदकर जान दे दी। उसका मानसिक इलाज चल रहा था, पति विदेश में रहता था। इस तरह की दूरी जो हम संबंधों में महसूस कर रहे हैं, पहले नहीं थी। लोग थोड़े से भी संतुष्ट थे और जिंदगी के हर मोड़ पर एक दूसरे का साथ बना रहता था या किसी भी विपत्ति और संकट में मनुष्य अकेला और असहाय नहीं था। आज यह सीख मिल रही है कि ऊंचे-ऊंचे लक्ष्यों को साधें, बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में ऊंचे वेतन पर काम करें। लेकिन इससे जो तनाव युवाओं के जीवन में पैदा हो रहा है वह आज की सबसे बड़ी चुनौती है।

काम के दबाव के चलते हमारे बच्चे मशीन में तब्दील हो चुके हैं। वे अपने सोचने-समझने की शक्ति खो रहे हैं और अंत में इतना एकाकी महसूस करने लगते हैं कि कई बार आत्महत्या तक की नौबत आ जाती है। कुछ समय पहले एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में ऊंचे वेतन पर काम कर रहे युवक ने मरणोपरांत छोड़े गए अपने नोट में लिखा कि वह संबंधों में नितांत अकेला महसूस कर रहा था। क्या उसके द्वारा कमाई गई करोड़ों की दौलत उसका जीवन बचा पाई?

दरअसल, जीवन जीने के लिए करोड़ों की संपत्ति नहीं, बल्कि रिश्तों में आपसी सद्भाव, प्रेम, विश्वास और एक दूसरे के प्रति सम्मान और अपनी परेशानी और दुख को साझा करने के लिए रिश्तों में उचित जगह का होना, ये सारी चीजें ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। आज हमारे पास जानने वाले की संख्या बहुत है, पर हमें पहचानने वाला अपना कोई नहीं। इस मायावी और कृत्रिम दुनिया को देखकर यही बिम्ब उभरता है कि जैसे एक समुद्र है, जिसमें पानी ही पानी है, मगर उसे प्यास नहीं बुझाई जा सकती।

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गलत तरीकों से और प्रकृति का दोहन करके कमाई गई दौलत हमें विनाश की ओर धकेल रही है। जिस समय आजादी प्राप्त करने का बड़ा और ऊंचा लक्ष्य हमारे सामने था, उस समय भी गांधीजी ने शस्त्र नहीं उठाया। अहिंसा और मार्ग की शुद्धता पर बल दिया। चूंकि वे चाहते थे आजादी हमें हमारी शर्तों पर मिले। मगर आज जिसे हम आजादी मानकर धन-दौलत की प्रदर्शन प्रियता पर बल दे रहे है, वह हमें अपने आप से दूर कर रहा है। शक्ति, बल, धन के आडंबर में फंसकर हम अपनी सरलता और सहजता का सौदा कर रहे हैं। जबकि इस देश की सच्ची पहचान इसकी आत्मा की पहचान में निहित है जो इस देश के किसानों, छोटे-छोटे व्यवसाय चलाने वाले कुशल कारीगरों और महापुरुषों द्वारा निर्मित की गई है। फिर भी हम तय नहीं कर पा रहे हैं कि हमें अपनी पीढ़ी को क्या देना है, उससे क्या बनाने की हमें अपेक्षा है।

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सवाल है कि क्या हम इस देश को ऐसे धन्ना सेठ देना चाहते हैं जो हमारा ही धन हमें भीख की तरह लौटाएं और हम सब कुछ छोड़ उनके गुणगान में लिप्त रहें या फिर गांधी, गोखले भगत सिंह जैसे आदर्श, जिन्होंने चिंतन के बल पर इस देश के चरित्र को बनाने में अपना योगदान दिया। हमारे यहां ‘अन्य’ या ‘दूसरा’ कोई नहीं, सब अपने हैं। हमें पृथ्वी के लिए आंसुओं को सहेजना है। उसके लिए जगह बचानी है। जबकि हमें बिना गमगीन हुए कृत्रिम तौर पर ‘हैप्पी’ रहने का पाठ सिखाया जा रहा है और हम अपने बच्चों से यह कह रहे हैं कि कठोर बनो, क्योंकि हंसने वाले के साथ सब हंसते हैं, रोने वाले के साथ कोई नहीं रोता। ऐसा कहते वक्त हम कबीर को बिसार देते हैं, जो कहते हैं- ‘सुखिया सब संसार है, खावे और सोए, दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रोए।’ जो संवेदनशील होगा, वह सोचेगा। जो सोचेगा, उसे आज के संसार पर रोना आएगा। उसकी दशा पर रोना आएगा। पर हम कृत्रिम सुख का लबादा ओढ़कर सुखी होने का ढोंग करना चाहते हैं, जो हमें हमारी पीढ़ी से दूर कर रहा है और हम उसके वास्तविक दुख को नहीं पहचान रहे हैं।

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