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दुनिया मेरे आगे: दिखावे के जाल में फंसकर ऐश्वर्य का प्रदर्शन करता समाज

दिखावे के चक्कर में लोग दूसरों के जैसा बनने की कोशिश करने लगते हैं। अपनी मौलिकता और बुनियाद भूल जाना भी उन्हें परेशान नहीं करता। जबकि जितनी कोशिश हम दूसरों के जैसा बनने की करते हैं, उतनी कोशिश अगर खुद को संवारने में करें तो ज्यादा अच्छा हो।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 04, 2024 10:50 IST
दुनिया मेरे आगे  दिखावे के जाल में फंसकर ऐश्वर्य का प्रदर्शन करता समाज
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(सोशल मीडिया)।
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चंदन कुमार चौधरी

जेब खाली है, लेकिन समाज के लोग, रिश्ते-नातेदार क्या सोचेंगे, इसकी चिंता कुछ लोगों को सताए जा रही है। ऐसे लोग सोच नहीं पा रहे हैं कि उनके यहां जो काम है, वह सामान्य तरीके से करें या समाज में लोगों की परवाह करते हुए दिखावा करते हुए करें। दिखावे के चक्कर में रुपया ज्यादा खर्च होगा और जो काम है, वह बहुत कम खर्च में हो जा सकता है। मगर क्या करें कि आज की तारीख में लोगों के लिए दिखावा ज्यादा जरूरी हो गया है।

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सामान्य तरीके से कोई काम कराने के बजाय जिसे देखो वही दिखावा करने में लगा हुआ है। दिखावे के इस शौक की सीमा आखिर कहां है? पड़ोस के घर में जब से एक सामाजिक काम होना तय हुआ था, तब से उस घर के लोगों से काम के कदम-कदम पूछे जा रहे थे। यह भी पूछा जा रहा था कि वह काम साधारण तरीके से किया जाएगा या शानो-शौकत के साथ।

उस घर के व्यक्ति ने बताया कि काम साधारण तरीके से किया जाए, तो उसके बाद लोगों के हाव-भाव बदल गए और उनकी टीका-टिप्पणियों में अंतर आ गया। लोग बताने लगे कि आजकल तो साधारण से साधारण लोग भी ‘अच्छे से’ काम करते हैं, और आप तो समाज के गणमान्य व्यक्ति हैं। अगर आप ही ऐसे साधारण तरीके से करेंगे तो फिर दूसरे लोग क्या करेंगे! लोगों का विचार सुनने के बाद उस घर के लोगों के दिमाग में अपने खानदान और पूर्वजों की शान की याद उमड़ने-घुमड़ने लगी।

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उनके नाम के ‘कीर्तिमान’ याद आने लगे। उसके बाद आपस में यह बात हुई कि अगर हम कुछ नहीं करेंगे तो हमारी मान-मर्यादा क्या रह जाएगी। पहले की शानो-शौकत के बरक्स आज नौबत कर्ज लेने की थी, मगर घर के लोग इसके लिए तैयार हो गए। उन्हें समाज में रहने के लिए दिखावे का रास्ता अपनाना जरूरी लगा।

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यह मामला एक उदाहरण भर है। आज की तारीख में हमारे इर्द-गिर्द इस तरह के हजारों लोग हैं, जो स्वेच्छा से या मजबूरी में दिखावा करते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें लंबे समय तक आसपास के लोगों की आलोचनाएं सुननी पड़ेंगी। ऐसे में वे कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते हैं।

जबकि यह समझने की बात है कि दिखावा और उद्देश्य की पूर्ति, दो अलग-अलग चीज है। हर किसी के घर में समय-समय पर कोई न कोई काम होता रहता है। लोगों की माली हालात जैसी भी हो, लेकिन ज्यादातर कामों पर दिखावा हावी होता है। हालांकि अगर हम अपनी जरूरत को समझें और सिर्फ काम पूरा करने उद्देश्य की पूर्ति पर जोर दें तो बहुत कुछ बदल सकता है। इसके लिए सोच में बदलाव की जरूरत है।

जब हम किसी के यहां जाते हैं तो उसके बारे में अगले कुछ समय तक हमारे मनो-मस्तिष्क में बातें चलती रहती हैं। अगर हम उनका जीवन वैभव या विलासितापूर्ण देखते हैं तो हम भी उन्हीं की तरह जीना चाहते हैं। मन ही मन हम तुलना करने लगते हैं। हमें लगता है कि हम भी उनके जैसा बनें। उनके घर में कोई सामान देखा तो अपने घर में भी वैसा ही चाहते हैं। यह सामाजिक हैसियत का विषय हो जाता है।

इस चक्कर में कई लोगों को काफी परेशानी उठानी पड़ती है और परिवार में खटपट भी होती है। लोग दूसरे को बताते हैं कि हमारे पास वह सामान है और मैंने वह वहां से लिया है। उसकी यह खासियत है… कीमत इतनी है। हो सकता है कि जिस व्यक्ति के पास वह सामान है, उसे उसकी जरूरत होगी। जिसके पास वह नहीं है, उसे उसकी जरूरत नहीं होगी।

सिर्फ किसी के घर में कोई सामान देख कर बिना जरूरत के हम वही चीज अपने लिए अलग से लेते हैं तो यह दिखावा ही है। अगर व्यक्ति अपनी हैसियत और जरूरत के हिसाब से कदम उठाए तो वह कई परेशानियों से बच सकता है। हमारे आसपास अक्सर ऐसे लोग मिलते हैं जो बताते रहते हैं कि हमने वह सामान इतने में खरीदा है और वह उतने में। यह बताने की कोई जरूरत हो या नहीं, फिर भी वे लोगों को बताते हैं।

लोग भी ऐसे लोगों की बातों को काफी ध्यान से सुनते हैं और उनकी तारीफ करते हैं। बताने वाले को शायद लगता है कि हमें अपना ऐश्वर्य का प्रदर्शन करना चाहिए और सुनने-देखने वाले को लगता है कि हमें उनका दिखावा देखना चाहिए। इसके बाद लोग सोचने लगते हैं कि अगर मेरे पास वह सामान नहीं होगा या हम उनके जैसा कपड़े नहीं पहेंगे तो शायद हमारी सामाजिक स्थिति कमतर हो जाएगी। हालांकि यह समझने की जरूरत है कि कपड़े या कोई चीज होने या नहीं होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। अगर फर्क पड़ता है तो समाज को चाहिए कि वह इस फर्क को समाप्त करे। कई बार तो लगता है कि यह दिखावा एक रोग है, जिसे हर हालात में बदलना चाहिए।

इस दिखावे के चक्कर में लोग दूसरों के जैसा बनने की कोशिश करने लगते हैं। अपनी मौलिकता और बुनियाद भूल जाना भी उन्हें परेशान नहीं करता। जबकि जितनी कोशिश हम दूसरों के जैसा बनने की करते हैं, उतनी कोशिश अगर खुद को संवारने में करें तो ज्यादा अच्छा हो। आखिर हम अपने हिसाब से जीवन जीना क्यों नहीं पसंद करते हैं? हम दूसरों के हिसाब से जीवन क्यों जीने लगते हैं? क्या हमारे जीवन जीने का तौर-तरीका कोई बाहरी व्यक्ति तय करेगा? यह हमें तय करना चाहिए। यह निर्धारित करने का अधिकार हमारा होना चाहिए। अगर हम ऐसा करेंगे तो हमें अंदर से खुशी मिलेगी जो बाहरी और कृत्रिम खुशी से कई हजार गुणा अच्छी होगी।

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