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दुनिया मेरे आगे: खोई हुई बहादुरी की तलाश, बदल रही है विचारों की दुनिया और लोगों की सोच

आजकल मुकाबला, संघर्ष की वीरता, महंगाई नियंत्रण, भ्रष्टाचार उन्मूलन या बेकार कांपते हाथों को काम देने में नहीं दिखाई जाती, बल्कि घोषणा संस्कृति का अभिषेक करते हुए और भी शेखचिल्ली होने में दिखाई जाती है। पढ़ें सुरेश सेठ के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: April 04, 2024 14:33 IST
दुनिया मेरे आगे  खोई हुई बहादुरी की तलाश  बदल रही है विचारों की दुनिया और लोगों की सोच
‘दया धर्म का मूल है’ दोहराने वाले बहुत से वाक्यवीर पैदा हो गए।
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सफलता के आंकड़ों की तश्तरी परोसते रहने की बहादुरी आजकल असल वीरता कहलाती है। उसके लिए उत्सवों का सिलसिला बना लेने की तैयारी बड़प्पन है। उससे निकलती है विकास गति, जो देश को एक अमूल्य छवि प्रदान करती है और उसे इस धरा पर एक असाधारण उपलब्धि हो जाने की गुंजाइश छोड़ जाती है, लेकिन यहां करोड़ों मरते-जीते लोगों को देखते हैं, उनकी बेआवाज सिसकी को सुन पाते हैं तो लगता है कि इस वीरता और सफलता का उत्सव मनाने में व्यस्त शूरवीरों से हमारा इलाका वंचित हो गया। फिर भी हर मौसम में नए-नए वीर पैदा कर दिए जाते हैं, जो विजयनाद करते हुए एक ऐसे बदलाव की ओर इशारा कर दें कि जिसके कारण यह ऊर्जाहीन होती धरती सनसनीखेज खबरों से भर जाए। गोदी मीडिया को पुचकार मिले और हम डिजिटल हो जाएं।

असल वीरता के अभाव ने पूरे देश में अवसाद और बेचारगी को जन्म दे दिया था। आज जिसके साथ जो भी हो रहा है, वह उसे एक दीर्घ उच्छवास से स्वीकार कर लेता है। हर नई महामारी का अंदेशा मृत्युभय बन जाता है। एक भय की विदाई दूसरे भय की आगवानी हो जाती है और लोग अपने-अपने मास्क, नकाब उतार कर खुल कर सामने आ जाते हैं। जिंदगी के विषाणु के भय से कमरों में अकेला बंद होकर जीने के लिए कब तक मजबूर रहें? इसके बावजूद बेकारी बढ़ रही है, महंगाई ने बंटाधार करना शुरू कर दिया है और महाभ्रष्टाचार सुर्खियों में है।

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ऐसे में लगता है कि महामारी की एक विदाई बेला में लोग अब सच, हक और ईमानदारी के लिए अपनी खोई हुई वीरता को फिर से प्राप्त कर लेंगे। अपनी नागरिकता के अधिकार के साथ समय की सरकार से काम देने के अधिकार की मांग करेंगे। मृत्यु भय से छुटकारा पाना शुरू करने के बाद उत्पादन न होने पर भी चोर-बाजारियों द्वारा पैदा की गई महंगाई का मुंह नोच लेंगे और भ्रष्टाचार को आज के समाज से बहिष्कृत करके नैतिकता और आदर्शों को जिंदा करने की वीरता दिखाएंगे। मगर गंभीरता से समाज को टटोला, तो पाया कि ऐसा नया समाज बना सकने वालों की वीरता शायद दिवंगत हो गई। अब काम का अधिकार मांगने वाले राहतों, रियायतों और सस्ती साझी रसोइयों से निबटा दिए गए हैं। जो जितनी दूर की हांक सके, उतना ही बड़ा इस देश का नवनिर्माता।

यों ‘दया धर्म का मूल है’ दोहराने वाले बहुत से वाक्यवीर पैदा हो गए। कार्य संस्कृति की जगह राहत और रियायत उद्घोषक संस्कृति ने कुछ इस प्रकार जन्म लिया कि पेट भरने के लिए भूखे, बेकार और बीमारी से उठे लोगों की कतारें दानवीरों के मुफ्त और रियायती जलपान गृहों के बाहर लगनी शुरू हो गईं। बेईमानी का धंधा करने वाले, महामारी के दिनों में कभी के मनोविज्ञान की बैसाखियों से चोरबाजारी करने वाले अनैतिकता के रणबांकुरे अचानक लंगर और राहतों से उपकार करते हुए अपने इहलोक के साथ परलोक की चिंता करने चल दिए।

इससे छुटकारा पाने के लिए देश की सरकार किसी नई कार्य संस्कृति की रूपरेखा के साथ हाजिर हो सकती है। यह उम्मीद रखना बेजा नहीं, लेकिन कार्य संस्कृति के साथ उद्यम और मेहनत की परेशानी जुड़ी होती है। इसके नतीजे भी हथेली पर सरसों जमाने की तरह तत्काल नहीं आते। इसलिए ऐसी कंटकपूर्ण राह अपनाने के स्थान पर अब सरकारी दरीचों से घोषणावीरों की जमात पैदा हो गई। अब सत्ता की मीनारों पर हर कोई कब्जा करना चाहता है। जो सत्ता पक्ष में जम कर बैठे हैं, उनका लक्ष्य है जब तक जीवन, तब तक लाभ उठाओ और जब जीवन क्षीण हो झुठलाने लगे तो अपनी कुर्सियों के सर्वाधिकार नाती-पोतों के नाम सुरक्षित करवा जाओ। बाहर सड़क पर ट्रैफिक जाम लगा, मोर्चाबंद होता विपक्ष भी है। वह सत्ता पर पुश्तैनी अधिकार मानने वाले महामानवों के नीचे से कुर्सी खींचने की फिराक में लगा रहता है।

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आजकल मुकाबला, संघर्ष की वीरता, महंगाई नियंत्रण, भ्रष्टाचार उन्मूलन या बेकार कांपते हाथों को काम देने में नहीं दिखाई जाती, बल्कि घोषणा संस्कृति का अभिषेक करते हुए और भी शेखचिल्ली होने में दिखाई जाती है। चुनाव करीब हो और लोगों के मत लुभाने की चाहत हो, तो बातों से आसमान में पैबंद लगाने की चाह और भी बढ़ जाती है।

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कोई नहीं कहता कि बेकार हाथों के लिए अब काम की गारंटी होगी। बस यही कहा जाता है कि किसी को अब भूखा नहीं मरने देंगे। यही दिलासा है। महामारी से डरे हुए नौनिहालों के लिए नए शांति निकेतनों की स्थापना पर कोई बल नहीं देता। बस लोगों को बिना स्मार्टफोन के डिजीटल हो जाने का संदेश दिया जाता है। ‘हम शिक्षा को मरने नहीं देंगे’ के दावे किए जाते हैं और ऐसी परीक्षाएं ली जाती हैं कि जिसमें परिणाम सौ में से सौ प्राप्त करने वाले छात्रों का नया समूह निकलता है।

अब एक और घोड़े पर सवार किसी अनोखी महामारी के लौटने की घोषणा हो गई है। इसलिए इसका पूरा मुकाबला करने का दावा करने वाले घोषणावीरों की जमात फिर प्रभावी हो गई। पर्दे के पीछे छिपे कालाबाजारियों ने अपने धंधे के नाक-नक्श संवारने शुरू कर दिए और दानवीरों ने लोगों के खाते में हजार, दो हजार मासिक जमा करवाने का आश्वासन भी दे दिया। यह दिलासा पुराना है। कभी हर खाते में पंद्रह लाख जमा करवाने का वादा भी किया गया था!

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