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दुनिया मेरे आगे: स्वतंत्रता के दायरे और रिश्तों की मिठास, बंधन से मुक्त जीवन में सहजता का आनंद

कृतिक स्वतंत्रता घातक बिल्कुल भी नहीं है। अगर व्यक्ति स्वतंत्रता के साथ भावनाओं को भी जीवन में स्थान देगा तो उसे सामाजिक जीवन और रिश्तों में तालमेल बनाने में समस्या नहीं आएगी और न ही उसके संपर्क में आने वाले लोगों को दिक्कत होगी। पढ़ें मेघा राठी के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | March 27, 2024 08:02 IST
दुनिया मेरे आगे  स्वतंत्रता के दायरे और रिश्तों की मिठास  बंधन से मुक्त जीवन में सहजता का आनंद
सच है कि व्यक्ति को अपने संबंधों में यह विश्वास होना चाहिए कि वह जैसा है, जिस रूप में है, जिस स्वभाव में है, खुद को उसी रूप में किसी के समक्ष प्रकट कर सके।
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कहते हैं कि किसी भी रिश्ते में व्यक्ति को बांधना नहीं चाहिए, उसे स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए, ताकि रिश्तों की मिठास और गरमाहट बनी रह सके। वास्तव में व्यक्ति स्वतंत्र प्रवृत्ति के साथ ही जन्म लेता है। शैशवास्था और बाल्यावस्था के आरंभिक काल में वह स्वतंत्र रूप से व्यवहार करता है, लेकिन बड़ा होते हुए परिवार और समाज में रहकर वह सीखता है कि उसकी स्वतंत्रता के दायरे कहां तक हैं। रूसो ने कहा है- ‘मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुआ और हर जगह जंजीरों में जकड़ा हुआ है।’ दरअसल, ये जंजीरें कैद करने वाली कारा की जंजीरें नहीं हैं, जो कष्ट देती हैं। अगर ये जंजीरें न हों तो स्वच्छंद समाज में व्यवस्था की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

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हम अपने लिए जैसा व्यवहार चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार दूसरों के साथ करें

खानपान, रहन-सहन, विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यानी व्यक्तिगत, आर्थिक, राजनीतिक, नागरिक स्वतंत्रता किसी भी देश का कानून अपने मानकों के आधार पर दे सकता है। हम अपने स्वतंत्र विचारों के प्रवाह में भले ही समाज के बनाए नियमों, रीति-रिवाजों के विरुद्ध हो भी जाएं और उनका सामना करें, फिर भी व्यक्ति किसी न किसी रूप में बंधन में रहेगा ही। पूर्ण मुक्त हो पाना असंभव है। अगर ऐसा होता है तो दूसरों के साथ ही व्यक्ति स्वयं को भी ठेस पहुंचाता है, क्योंकि जो लोग इस स्वतंत्रता के कारण चोटिल होते हैं, वे उसे भी प्रतिक्रिया में अपने व्यवहार या वचनों द्वारा चोट पहुंचा ही सकते हैं और इसके लिए कम से कम वे लोग उनके खिलाफ शिकायत नहीं कर सकते, जिन्होंने उन्हें चोट पहुंचाया होता है। सभी अपने व्यवहार और वचनों के लिए स्वतंत्र हैं। यों भी हम अपने लिए जैसा व्यवहार चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार हमें दूसरों के साथ करना चाहिए।

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संबंधों में स्थायित्व के मूल अर्थ में व्यक्ति की वास्तविकता को पाना है

यह सच है कि व्यक्ति को अपने संबंधों में यह विश्वास होना चाहिए कि वह जैसा है, जिस रूप में है, जिस स्वभाव में है, खुद को उसी रूप में किसी के समक्ष प्रकट कर सके। उसे किसी बनावट के व्यवहार के लिए विवश नहीं होना पड़े, लेकिन यह बहुत बार सामने वाले पर भी निर्भर करता है कि वह उसके मूल रूप को कितनी सहजता से स्वीकार कर पाता है। किसी भी प्रकार के संबंधों में स्थायित्व के मूल अर्थ में व्यक्ति की वास्तविकता को पाना है और जब इंसान के मूल रूप को स्वीकार करने के बाद भी भाव वैसे ही बने रहें, तो उनके मध्य प्रेम समाप्त नहीं होता और न ही दुख का कारण बनता है। इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य पूर्ण स्वच्छंद हो जाए। उसे जो भी करना है, वह बिना सोचे-समझे करे। इसकी फिक्र न करे कि उसके किसी कार्य का दूसरे व्यक्ति पर क्या प्रभाव पड़ेगा। लेकिन इसकी प्रतिक्रिया भी तो उसी के मुताबिक आनी है!

दरअसल, स्वतंत्र विचारों के कारण व्यक्ति को रोक-टोक पसंद नहीं आती। नतीजतन, वह अपने इस प्राकृतिक स्वभाव की वजह से अनजाने में ही खुद से जुड़े लोगों को भावनात्मक रूप से आहत कर देता है। ऐसी परिस्थिति में सहन की सीमा समाप्त होने के बाद लोग उनसे प्रेम होने के बाद भी दूर होने लगते हैं या उन पर ध्यान देना बंद कर उन्हें उनके हाल पर छोड़ देते हैं। हमारी अपनी स्वतंत्रता हमें प्रिय हो सकती है, मगर दूसरों की स्वतंत्रता भी इतनी ही अहम है। एक कहावत भी है, ‘व्यक्ति की स्वतंत्रता वहां खत्म हो जाती है, जहां दूसरे व्यक्ति की नाक आ जाती है।’
कोई भी समाज एक व्यवस्था के तहत चलता है और उसी पर आधारित होता है।

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अगर व्यवस्थाएं न हों तो जनजीवन, सामाजिकता अस्त-व्यस्त हो जाएगी। मनुष्य को स्थायित्व देने में व्यवस्था का बहुत योगदान होता है। स्वतंत्र व्यक्ति को व्यवस्थित होने में मुश्किल पेश आती है। उसे लगता है कि यह उसकी आजादी में दखल है। स्वतंत्र व्यक्ति अपनी आजादी की सीमाएं नहीं बांधना चाहता। वह नहीं चाहता कि वह जैसा करना चाहता है, उसे वैसा करने से रोका जाए। उसे लगता है कि इंसान समझदार होता है, अपना भला-बुरा जानता है और अपने जीवन पर उसका अधिकार है। इसलिए किसी को भी इसमें दखल देने का हक नहीं है। मगर जब वह देखता है कि यह स्वतंत्रता उसे पूर्ण रूप से नहीं मिल पा रही है और वह जैसा है, लोग उसे वैसा ही स्वीकार नहीं कर रहे, तब उनके अंदर आक्रोश उत्पन्न होता है। यह आक्रोश किसी सार्थक बदलाव के लिए सहायक नहीं होता, बल्कि यह कुंठाओं को जन्म देने लगता है। मन की घुटन बढ़ाने लगता है। ऐसे में एक आक्रोशित व्यक्ति न तो वैयक्तिक विकास पर ध्यान देता पाता है और न ही समाज के लिए कुछ कर पाने की अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग कर पाता है।

देखा जाए तो प्राकृतिक स्वतंत्रता घातक बिल्कुल भी नहीं है। उसे नुकसानदेह बना लिया जाता है बंधनों के साथ समायोजन के अभाव में। अगर व्यक्ति स्वतंत्रता के साथ भावनाओं को भी जीवन में स्थान देगा तो उसे सामाजिक जीवन और रिश्तों में तालमेल बनाने में समस्या नहीं आएगी और न ही उसके संपर्क में आने वाले लोगों को दिक्कत होगी। सकारात्मक स्वतंत्रता और नकारात्मक स्वतंत्रता का अंतर समझ कर भी व्यक्ति स्वयं को समायोजित कर सकता है। प्राकृतिक स्वतंत्रता में तलवार की पैनी धार भी होती है, जिसे कुछ हद तक व्यवस्था की म्यान में संभालना आवश्यक है, अन्यथा स्वतंत्रता अकेलेपन की सहगामिनी बन कर रह जाती है।

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