scorecardresearch
For the best experience, open
https://m.jansatta.com
on your mobile browser.

दुनिया मेरे आगे: मनुष्‍य को लक्ष्‍य से विमुख करने में अंतर्द्वंद्व की भूकिका अहम

दुनिया में जिसने भी अपने मन को साध लिया, उसके लिए हर लक्ष्य आसान हो जाता है। मन की एकाग्रता हमें हमारी आत्मा से साक्षात्कार कराकर हमारी सफलता के नए द्वार खोलती है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: February 02, 2024 11:23 IST
दुनिया मेरे आगे  मनुष्‍य को लक्ष्‍य से विमुख करने में अंतर्द्वंद्व की भूकिका अहम
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
Advertisement

रेखा शाह आरबी

मनुष्य के मन का बड़ा ही स्वाभाविक गुण है चंचल होना, यानी एकाग्र न होना। इसके चंचल होने का गुण बार-बार मनुष्य को लक्ष्यों से विमुख करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दरअसल, मनुष्य का मन चंचल भावनाओं और कामनाओं के जाल में बांधकर तरह-तरह के कार्य करता और करवाता है। कभी वह अच्छे कार्य करवाता है, तो कभी बुरे कार्य की ओर भी आकर्षित करता है।

Advertisement

यह व्यक्ति की अपनी बुनावट पर निर्भर करता है। सभी कार्य मन द्वारा ही प्रेरित होते हैं। हमारा मन हमारे शरीर रूपी रथ का सारथी होता है। इसका जिधर मन करता है, वह उधर ही इसको ले जाता है। अच्छाई की राह थोड़ी कठिन और अरुचिकर है। दूसरी ओर, बुराई की राह आमतौर पर रुचिकर और आकर्षण पैदा करने वाली मानी जाती है। जहां आकर्षण है, वहां जाने की संभावना ज्यादा है।

इसीलिए अक्सर यह गलत राह पकड़ लेता है। जबकि अच्छी राह पर चलने के लिए प्रेरणा और समाज-परिवार से हासिल मानसिकता की जरूरत पड़ती है। एक दायरे में मन का अधिक झुकाव विषयों एवं विकारों की तरफ होता रहता है। वहां पर इसको बढ़ने से रोकने की जरूरत महसूस होती है। इसके लिए गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं- ‘हे अर्जुन अगर तुम धर्म कर्म वाले और दृढ़निश्चयी व्यक्ति हो तो मन की चंचलता पर काबू पाया जा सकता है।

मन का मुंहजोर घोड़ा आरंभ में सवार को अपनी पीठ पर आसीन नहीं होने देता है। लेकिन अगर बार-बार कोशिश की जाए तो उसे सवार भी होने देगा और उसकी बात भी मानेगा और उसकी इच्छा के अनुसार चलेगा भी। पर सबसे कठिन है अपने मन को किसी एक लक्ष्य पर टिका कर रखना। यह संभव है, अगर हम खुद को दृढ़ निश्चयी बना लें तो मन के ऊपर नियंत्रण पाया जा सकता है। इसी को कहते हैं अभ्यास की तलवार चलाना।’

Advertisement

यों एकाग्रता की अहमियत सार्वकालिक रूप से सिद्ध रही है। अगर किसी की शिक्षा में तथ्यों के अध्ययन के साथ-साथ और समांतर मन की एकाग्रता और आत्मशक्ति की सामर्थ्य शामिल नहीं है और इसे बढ़ाने का जतन नहीं है, तब उसकी शिक्षा आखिरी तौर पर अधूरी ही रहेगी, क्योंकि इसके बाद ही उसमें अपनी इच्छा के मुताबिक तत्त्वों का संकलन किया जा सकेगा।

दुनिया में जिसने भी अपने मन को साध लिया, उसके लिए हर लक्ष्य आसान हो जाता है। मन की एकाग्रता हमें हमारी आत्मा से साक्षात्कार कराकर हमारी सफलता के नए द्वार खोलती है। इसीलिए सर्वप्रथम मन को ही साधने की जरूरत है। मगर सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मन को एकाग्र कैसे किया जाए। सबसे पहले तो अपने मन के ऊपर अनुशासन करना सीखने की जरूरत होगी।

अगर एक बार हमने अनुशासन करना सीख लिया तो और सारी चीज अपने आप बेहतर होती चली जाएगी। इसके लिए प्रकृति ने हम सभी के पास मष्तिष्क रूपी हथियार दिया है, जो इस बात का निश्चय कर सके कि कौन से कर्म और कौन-सी इच्छा हमारे लिए सही है और कौन-सी गलत है। उसमें से चुनाव करके अपने जीवन में लागू करने की जरूरत है।

मन को एकाग्र रखने में हमारे आसपास का माहौल भी सकारात्मक होना और अच्छा होना बेहद जरूरी है। ऐसे माहौल में रहना मन की एकाग्रता के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होता है। जरूरी नहीं है कि हम पर्वत और पहाड़ों की गुफाओं में ही जाकर अपने मन को एकाग्र कर पाएं। अगर हम जीवन में सात्विक जीवन जीते हुए अपना गृहस्थ जीवन जीते हैं, तो मनुष्य को ज्यादा मानसिक दुविधाओं का सामना नहीं करना पड़ता है।

सबसे ज्यादा मानसिक द्वंद्व ही हमारी मन की एकाग्रता का हरण करते हैं। जितनी ज्यादा हमारी भौतिक साधनों के प्रति आसक्ति रहेगी, उतना ही ज्यादा हम मानसिक अंतर्द्वंद्व के शिकार रहेंगे। तो इसका सबसे ज्यादा अच्छा उपाय यही है कि हम अपनी इच्छाओं को असीमित न होने दें, उनको उनकी सीमाओं में बांधकर रखें।

भौतिक दुनिया में जीवन जीते हुए हम ध्यान और व्यायाम करके भी अपने मन को एकाग्र रखने की कोशिश कर सकते हैं। योग हमारे शरीर को निरोग कर सकता है। निरोगी काया मन को एकाग्र रखने में सहायता कर सकती है। अगर हम शारीरिक रूप से स्वस्थ ही नहीं रहेंगे तो मन की एकाग्रता की अपेक्षा करना व्यर्थ है। अगर हमारे कर्म व्यक्तिगत मूल्यों से मेल नहीं खाते हैं, तो यह चीज भी हमें मानसिक रूप से परेशान करती है।

इसलिए हमें कोशिश करनी चाहिए कि हमारे कर्म हमारे व्यक्तिगत मूल्य के अनुसार ही रहे, जिससे मानसिक झंझावात कम रहे। मन को तनाव के अवसर कम मिले, क्योंकि मानसिक तनाव हमारी बहुत सारी मानसिक ऊर्जा व्यर्थ के कार्यों में खर्च कर देती है। फिर हमारा ध्यान व्यर्थ ही इधर-उधर भटकने लगता है, जिसे एकाग्र करने के लिए हमें मानसिक रूप से अत्यधिक मेहनत करनी पड़ती है।

Advertisement
Tags :
Advertisement
tlbr_img1 राष्ट्रीय tlbr_img2 ऑडियो tlbr_img3 गैलरी tlbr_img4 वीडियो