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दुनिया मेरे आगे: वर्चुअल आकर्षण की हकीकत, सोशल मीडिया पर दिखते हैं विनम्र लेकिन असलियत में अहंकारी

कुछ समय पहले आज के शहरी खाते-पीते घरों के खाए-अघाए हुए कुछ युवकों ने एक देहाती बच्चे की एक पेड़ पर उलझी हुई पतंग निकालने में मदद की तो सभी ने बारी-बारी से उस पर ‘फेसबुक रील’ बनाई। इस जद्दोजहद में वह पतंग ही फट गई। वह बच्चा मायूस होकर चला गया। मगर उन युवकों की वह पतंग वाली पोस्ट सोशल मीडिया के सभी मंचों पर हिट हो रही थी।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: February 20, 2024 10:01 IST
दुनिया मेरे आगे  वर्चुअल आकर्षण की हकीकत  सोशल मीडिया पर दिखते हैं विनम्र लेकिन असलियत में अहंकारी
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संदीप पांडे ‘शिष्य’

आज वैचारिक और वैश्विक स्तर पर पसरती संकीर्णता के दौर में यह जीवन भी सिमटता जा रहा है और कई बार हम अपनी लघुता पर भी इतराते फिरते हैं। हैरानी की बात यह है कि सार्वजनिक जगहों पर ओछेपन को सराहने वाले लोग भी दिख जाते हैं। सड़क पर सोशल मीडिया के लिए ‘रील’ बनाते युवा लोकप्रियता के लालच में हर तरह की मर्यादा को भूल रहे हैं। अपने पर आए जोखिम को लेकर भी लापरवाह हो रहे हैं। सोशल मीडिया एक दर्शन पर काम करता है कि जो दिखता है, वही बिकता और टिकता है। विविध आनलाइन मंचों का दायरा आज काफी विस्तृत हो गया है। इसलिए इसका असर भी व्यापक होता है। मगर इस चालू सिद्धांत के मोहजाल में फंसकर युवा जिस तरह के अंदाज, ढंग और भाषा को बरत रहे हैं, वह नितांत खोखलेपन का शिकार हो रहा है। यह विडंबना ही है कि एक असभ्य भाषा सोशल मीडिया पर खूब प्रसार पाती है या पसंद की जाती है। सवाल है कि क्या हमारा समाज इसी तरह का बन रहा है!

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नई पीढ़ी फटाफट संस्कृति पर करती है भरोसा

आज भले ही बड़ी-बड़ी डिग्री गले में लटका कर सारी दुनिया को शान से कितना भी दिखाते चलें, मगर तमगे नहीं, आखिरकार व्यक्ति का आचरण और तौर-तरीका ही पहचान बनाता है। इसे आज की पीढ़ी सिरे से भूल रही है। अजीबोगरीब ‘इमोजी’ की भाषा में बात करना और रटे-रटाए दो-तीन जुमले बोलने से कोई आधुनिक नहीं बन जाता। यह बात आज की पीढ़ी को समझ नहीं आ रही है। सच यह है कि यह सजगता और होश की कमी है जो आज की ‘फटाफट संस्कृति’ की देन है। नए-नए प्रसाधन लगाकर खुद को चमका लेना एक बात है और एक ठहराव तथा गंभीरता होना दूसरी बात।

फैशनेबल बनना, सोशल मीडिया में छाना केवल भ्रम है

अष्टावक्र को आठ जगह से टेढ़ा माना जाता था, मगर जब व्यवहार और ज्ञान की बात आई तो राजा के दरबार में एक से बढ़ कर एक उपाधि वाले सभासद से लेकर महाज्ञानी बनकर इठलाने वाले विद्वान, उन सबको अष्टावक्र के सामने नतमस्तक होना पड़ा था। कुल मिलाकर नए फैशन के कपड़े या सोशल मीडिया में शाहकार मचाने से केवल भ्रम पैदा होता है। इसका ताजा उदाहरण हाल में आया जब एक ‘इवेंट कंपनी’ के येन-केन-प्रकारेण कर्म से जिन-जिन नेताओं के सोशल मीडिया में चार लाख या उससे भी अधिक ‘फालोअर’ थे, जिन्हें अपनी सोशल मीडिया पोस्ट पर हजारों में टिप्पणियां मिल रही थीं, उनको वास्तव में एक हजार वोट तक नहीं मिले। इससे साबित होता है कि बातों के तोते उड़ाना और आभासी मंच पर छा जाना कोई बड़ी बात नहीं है और हकीकत बहुत अलग हो सकती है।

दरअसल, हमारी सोच की गहराई और हमारा बोलना, उठना-बैठना ही हमारी पहचान होती है। ऐसे कितने ही उदाहरण है कि सोशल मीडिया में विनम्रता आदि का पाठ सिखाने वाले प्रबंधन गुरु असलियत में इतने तुनकमिजाज और अहंकारी साबित हुए कि उनके मुखौटे उतर गए। हर हाल में आंतरिक पावनता और साफगोई ही सबसे अच्छी बात होती है। कितने लोग जो बाहर से चमाचम रहते हैं, मगर अपने मन में कई तरह का कचरा भरकर बैठे रहते हैं। ऐसे लोगों की पहचान करके उनकी बातों को लेकर जरा सावधान ही रहने की जरूरत है।

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कुछ समय पहले आज के शहरी खाते-पीते घरों के खाए-अघाए हुए कुछ युवकों ने एक देहाती बच्चे की एक पेड़ पर उलझी हुई पतंग निकालने में मदद की तो सभी ने बारी-बारी से उस पर ‘फेसबुक रील’ बनाई। इस जद्दोजहद में वह पतंग ही फट गई। वह बच्चा मायूस होकर चला गया। मगर उन युवकों की वह पतंग वाली पोस्ट सोशल मीडिया के सभी मंचों पर हिट हो रही थी। एक जमाना था, जब यह कहावत थी कि जिस दिन किसी का भला नहीं किया, वह दिन ही बेकार चला गया समझना चाहिए, मगर आज के युवक इस कहावत को ऐसे पढ़ते और समझते हैं कि जिस दिन कोई पोस्ट सोशल मीडिया पर नहीं लगाई, वह दिन बर्बाद हो गया।

नए लोगों को जीवन की गुणवत्ता पर गहरा चिंतन करना चाहिए, सोशल मीडिया पर लिखी गई टिप्पणियों पर नहीं। मनोवैज्ञानिक एडलर ने तो यह प्रतिपादित भी किया है कि जो दिख रहा है, जरूरी नहीं कि वही होता भी है। सस्ती लोकप्रियता वाले लोगों के लिए यह बात कही गई थी, जो आज के सोशल मीडिया युग पर खरी उतरती है। आज के कुछ युवा कई बार अब किसी मसखरे जैसा लगने लगे हैं। वे समाज की मुख्यधारा में मिले हुए लगते ही नहीं। वे खुद को सबमें शामिल होने वाला तभी कह सकते हैं, जब अपने आनंद के अलावा दिव्यागों पर, प्रकृति, धरती, गरीब सबके साथ खुद को पहचानें।

बेहतर यही होगा कि हमारे युवा अपने लिए अपनी मौलिकता से जरा-सा अलग, मगर एकदम नया गढ़ें। दूसरों के बनाए फटाफट वाले चालू रास्ते पर चलना, रातों-रात लोकप्रिय होने की ख्वाहिश और उसके लिए ऊटपटांग तौर-तरीके अपनाना दरअसल, सृजनात्मकता बिल्कुल नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि हम कितने कथित आधुनिक हैं। फर्क तब पड़ता है, जब हम अपने आसपास की दुनिया के लिए कुछ नवीन और हटकर सोच पाते हैं। ऐसा कतई नहीं होना चाहिए कि आभासी दुनिया में उलझे हमारे बच्चे अपनी मौलिक सोच, अपने सदगुण, अपनी सहजता को ही खो बैठें और यह दुनिया देखती रह जाए।

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