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दुनिया मेरे आगे: आधिक्य के भाव में जीने का अभ्यास ही खुशी का संचार करता है

बड़े से बड़ा काम भी बोझ नहीं लगता है और जब हम खुश होने के लिए जीते हैं तो कई बार ऊब और थकान महसूस करते हैं। दबाव और तनाव हमारे ऊपर अपना दुष्प्रभाव छोड़ता है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: April 13, 2024 10:43 IST
दुनिया मेरे आगे  आधिक्य के भाव में जीने का अभ्यास ही खुशी का संचार करता है
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -सोशल मीडिया)।
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नरेंद्र सिंह ‘नीहार’

धर्मशास्त्रों में मानव जीवन का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति को माना गया है, पर एक सामान्य मनुष्य से पूछा जाए कि तुम्हें क्या चाहिए तो उसका सीधा और सपाट उत्तर होगा- खुशी। इसी कड़ी में अगला सवाल हो सकता है कि आपको कितनी खुशी चाहिए! इसके बाद शायद वह दोनों हाथ खोलकर और आसमान की ओर देखकर कह देगा- जीवनपर्यंत। हर साल हर दिन। यानी चौबीसों घंटे और सातों दिन।

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यों यह पूछने वाली कोई बात तो है नहीं! सभी मनुष्य खुश ही रहना चाहते हैं। यह मनुष्य की मूल चाहत है। इस संदर्भ में इतिहास में एक शानदार उद्धरण मिलता है। मकदूनिया का शासक सिकंदर विश्व विजय करना चाहता था। वह अपने अभियान पर निकलने से पहले एक फकीर डायोजनीज से आशीर्वाद लेने गया।

डायोजनीज समुद्र किनारे रेत पर धूप का आनंद ले रहा था। सिकंदर ने कहा कि गुरुदेव, आप मुझे आशीर्वाद दें कि मैं दुनिया को जीतकर विश्व विजेता बन सकूं। इस पर डायोजनीज ने पूछा कि उससे क्या होगा! सिकंदर ने जवाब दिया- ‘मुझे खुशी मिलेगी’। यह सुन कर डायोजनीज ने उसे झिड़कते हुए संकेत दिया- ‘मेरे ऊपर आ रही धूप छोड़ दो, क्योंकि मेरी खुशी बाधित हो रही है।’ सिकंदर उसका मंतव्य जाने और समझे बिना वहां से चला गया।

इस दृष्टांत से एक बात स्पष्ट है कि हमारी खुशी हमारे पास नहीं है। वह किसी व्यक्ति, वस्तु, घटना या सफलता रूपी चिड़िया के पास अलग-अलग रूप में रखी हुई है। हम खुश होने के लिए जी रहे हैं या फिर खुशी के साथ जी रहे हैं। दोनों मनोभावों में अंतर है। जब हम खुशी के साथ जीते हैं तो उत्साह, उमंग और आत्मविश्वास से लबरेज होते हैं।

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बड़े से बड़ा काम भी बोझ नहीं लगता है और जब हम खुश होने के लिए जीते हैं तो कई बार ऊब और थकान महसूस करते हैं। दबाव और तनाव हमारे ऊपर अपना दुष्प्रभाव छोड़ता है। यह हमारे मनोबल को कमजोर कर देता है और आत्मविश्वास डगमगाने लगता है। इसके विपरीत जब हम खुश रहकर सकारात्मक सोच के साथ किसी कार्य को करते हैं तो हमारे सफल होने की संभावना बढ़ जाती है।

खुशी एक आंतरिक मनोभाव है, जिसे सहज ही प्राप्त किया जा सकता है। बस जरूरत इस बात की है कि अपने व्यक्तित्व और सोच-समझ के मुताबिक हम अपनी खुशी की पहचान कर लें। सामान से सम्मान के रास्ते पर चलने वाले हजारों लोग मिल जाएंगे। बड़ा घर और कोई बड़ी गाड़ी पाकर उनकी प्रसिद्धि और प्रसन्नता में भी बढ़ोतरी हो जाएगी। मगर यह मिलने तक ऐसे लोग अतृप्त और व्याकुल ही बने रहते हैं।

सामान की तरह का सुख क्षणिक होता है। हमें खुशी चाहिए तो जीवन से अभावों को निकाल दिया जाए। आधिक्य के भाव में जीने का अभ्यास खुशी का संचार करता है। व्यक्ति की व्याकुल मानसिकता पर विराम लग जाएगा। डायोजनीज के पास कुछ नहीं था, फिर भी वे प्रकृति के सान्निध्य में खुश थे और सिकंदर राजा होकर भी अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अकिंचन बना हुआ था। बड़े से बड़ा पद, प्रतिष्ठा और अकूत दौलत भी किसी को खुशी की गारंटी नहीं दे सकते हैं।

निरंतर शिकायतों और अभावों में जीना हमारे जीवन की रंगत छीन लेता है। हम दुखिया होकर जग भर को अपना दुखड़ा सुनाते रहते हैं। हम जिस तरह के समाज में रहते हैं, उसमें हमसे सहानुभूति जताने या हमारी समस्याओं को दूर करने के बजाय ज्यादार लोग पीठ पीछे मजाक भी बनाते होंगे। दरअसल, यह एक सांस्कृतिक समस्या है कि जन्म से लेकर बड़े होने तक सबको जैसा माहौल मिलता है, लोग उसी में रमते चले जाते हैं।

जिन हालात पर सोचने-समझने का जैसा स्वरूप तय किया गया होता है, वैसे ही सोचने की परंपरा जारी रहती है। बहुत कम लोग होते हैं, जो एक तयशुदा ढांचे से अलग होकर सोचते हैं और नई परिस्थितियां रचते हैं। ऐसे लोगों को अगर अपनी समस्या के बारे में बताया जाए तो उस पर उनकी प्रतिक्रिया सकारात्मक हो सकती है। वे हमें अभाव से निकलने का कोई रास्ता बता सकते हैं। मगर आमतौर पर अभाव की वजह से पीड़ित लोगों से सब बचना ही चाहते हैं।

इसलिए इस भाव से जीने का अभ्यास करना चाहिए कि मेरे पास क्या नहीं है! हाथ-पांव, दिल-दिमाग, बुद्धि-चातुर्य, शिक्षा-नौकरी और परिवार सब कुछ तो है। स्वयं को व्यवस्थित करना है। कुदरत का धन्यवाद करते हुए आगे बढ़ते जाना है। हम अपनी आंतरिक सकारात्मक ऊर्जा से आसपास के वातावरण को तरोताजा बना सकते हैं। हमने अक्सर देखा होगा कि बड़े से बड़े धनवान लोग भी अपने जीवन के लिए सुख की तलाश में सुकून प्राप्त करने वाले ठिकानों को ही ढूंढ़ते हैं।

जो लोग इस समाज में अवसर का लाभ उठाने वाले लोगों की प्रवृत्ति को समझते हैं, वे इस तरह के लोगों को अपने रास्ते में बाधक मानते हैं। अपने ऐश्वर्य से चमकते जीवन के बरक्स वे अपने आसपास के प्रतिस्पर्धी और चापलूसी भरे माहौल से बाहर निकल कर कभी सामान्य व्यक्ति की तरह भी कुछ पलों को जीना चाहते हैं। खुली हवा में सांस भरना चाहते हैं। इस दिशा में प्रकृति का सान्निध्य और उसका कल-कल निनाद सुनना भी सेहत के लिए बहुत उपयोगी हो सकता है। वास्तविक खुशी समझदारी और जीवन को दृष्टा भाव से जीने में ही मिलेगी।

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