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दुनिया मेरे आगे: भरोसे की शक्ति और मन की गांठ, इंसान को कमाना पड़ता है अपने हिस्से का विश्वास

उम्मीदें टूट रही हैं। मन में गांठें पड़ रही हैं। रिश्तों में मनमुटाव का ऐसा असर हो रहा है कि तन-मन दोनों रोगग्रस्त होने लगे हैं। ये सारी स्थितियां बदल सकती हैं। टूटा विश्वास दोबारा से जुड़ सकता है, अगर हम दिल से क्षमा करना सीख लें। अपने मन की गांठों को खोलना शुरू कर दें। पढ़े अंशु सिंह की रिपोर्ट।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: May 15, 2024 07:40 IST
दुनिया मेरे आगे  भरोसे की शक्ति और मन की गांठ  इंसान को कमाना पड़ता है अपने हिस्से का विश्वास
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(सोशल मीडिया)।
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इंसान की स्मृति ऐसी होती है, जो आमतौर पर कुछ भी विस्मृत नहीं होने देती है। खासतौर पर तब जबकि अगर कोई मानसिक-शारीरिक रूप से स्वस्थ हो। कागज पर लिखे हुए शब्दों को साफ किया या मिटाया जा सकता है, लेकिन उसे नया नहीं किया जा सकता है। जैसे धागा अगर टूट जाए तो उसमें गांठ लगानी पड़ती है, तभी वह जुड़ता है। ठीक ऐसे ही, जब कोई हमें धोखा देता है या हमारा विश्वास तोड़ता है, तो कई बार हमें बेहद निराशा होती है। अगर किन्हीं हालात में जब फिर से उसके बहाल होने की स्थितियां पैदा होती हैं, तब कहते हैं कि उससे रिश्ते की गर्माहट खत्म हो जाती है। जिस तरह टूटा शीशा दोबारा पहले जैसा नहीं रह जाता है, वैसे ही एक बार भरोसा टूटने पर दोबारा करना कठिन हो जाता है।

रोते बच्चे को मां की गोद में जाकर ही शांति मिलती है

बचपन से देखा जाए तो एक बच्चा अपने माता-पिता पर विश्वास करके ही चलना और आगे बढ़ना सीखता है। उनके साथ रह कर वह खुद को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करता है। परिवार में एक शिशु को दुलार करने वाले चाहे कितने ही संबंधी हों, दादा-दादी, नाना-नानी हों, लेकिन जब उसे कोई तकलीफ होती है, वह रोता है, तो मां की गोद में जाकर ही शांत होता है। बच्चा जब बड़ा होता है और शिक्षा के मंदिर में पहुंचता है, तब उसके विश्वास का दायरा थोड़ा और बढ़ता है। वह अपने शिक्षक और सहपाठियों पर भरोसा करने लगता है। यह भी देखा गया है कि कई बार शिक्षक की दी हुई सीख के आगे वह अपनी मां या परिजनों की सलाह को भी मानने से इनकार कर देता है। बातें कई बार बहस में तब्दील हो जाती हैं।

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बच्चों पर शब्दों का होता है गहरा असर

यह बताता है कि एक शिक्षक का कितना गहरा प्रभाव किसी बच्चे के मन-मस्तिष्क पर पड़ सकता है। हम कह सकते हैं कि बच्चे को अगर अपने शिक्षक पर इतना भरोसा हुआ, तो शिक्षक ने भी उसका विश्वास जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यानी हर इंसान को अपने हिस्से का विश्वास कमाना पड़ता है। हां, यह है कि उसमें समय लग सकता है।

हाल ही में खाद्य वस्तुओं का निर्माण और कारोबार करने वाली एक जानी-मानी अंतरराष्ट्रीय कंपनी को लेकर एक विवाद सामने आया। बताया गया कि कंपनी ने यूरोपीय देशों की तुलना में भारत जैसे कम विकसित देशों में अधिक चीनी की मात्रा वाले शिशु आहार की बिक्री की। हालांकि कंपनी ने अपनी ओर से सफाई आई कि यह सही नहीं है, मगर जो मांएं अपने शिशु के आहार को लेकर काफी सतर्कता बरतती हैं, स्वाभाविक ही उनका भरोसा एकदम से हिल गया। कुछ साल पहले आई एक खबर में यह बताया गया कि एक अध्ययन के मुताबिक मैगी में सीसे की मात्रा ज्यादा होती हैं। इस खबर के खुलासे के बाद बड़े पैमाने पर चिंता फैल गई थी। तैयार खाद्य वस्तुएं बेचने वाली कोई भी कंपनी अपने ग्राहकों के साथ इतना बड़ा धोखी करेगी, इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। जाहिर है, उसके बाजार में वापस नए रूप में आने के बावजूद सवाल बने रहे, मगर लोगों ने शायद उस पर फिर भरोसा किया।

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अब इसके सामाजिक संदर्भों पर बात करें तो इन दिनों परिवारों के बिखरने की दर काफी बढ़ गई है। कहीं न कहीं इसका कारण एक दूसरे पर घटता विश्वास है। कुछ महीने पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मानसिक प्रताड़ना के आधार पर एक पुरुष की तलाक की अर्जी को स्वीकृति दी। साथ में यह भी कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में संशोधन की आवश्यकता है, क्योंकि आधुनिक समाज में संबंध विच्छेद के कारण बदल गए हैं। इससे विवाह जैसी संस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगने लगा है।

यह समझना मुश्किल है कि क्यों हम यह भूल गए हैं कि दो वयस्कों की शादी आपसी विश्वास के आधार पर होती है। एक लड़की जब नए घर और परिवार यानी ससुराल में जाती है, तो उसके आगे की जीवन की डोर इसी भरोसे पर टिकी होती है। वह अपने जीवनसाथी के साथ परिवार के अन्य सदस्यों का विश्वास जीतकर उनके दिलों में अपनी जगह बनाती है। बदले में उसकी भी आस होती है कि उसके विश्वास को कोई तोड़े नहीं। विडंबना यह है कि उम्मीदें टूट रही हैं। भरोसा तार-तार हो रहा है। मन में गांठें पड़ रही हैं। रिश्तों में मनमुटाव का ऐसा असर हो रहा है कि तन-मन दोनों रोगग्रस्त होने लगे हैं।

ये सारी स्थितियां बदल सकती हैं। टूटा विश्वास दोबारा से जुड़ सकता है, अगर हम दिल से क्षमा करना सीख लें। अपने मन की गांठों को खोलना शुरू कर दें। अतीत की कड़वी यादों को याद करके उसे अपने मन में स्थिर रखने का कोई लाभ नहीं। बीता समय वापस नहीं आता। मन पर बोझ लेकर जीवन की यात्रा कभी सुखद नहीं हो सकती। जीवन आगे बढ़ने का नाम है। अपेक्षा नहीं, स्वीकार करने की जरूरत है। हर इंसान अलग है। उसका व्यक्तित्व, उसके संस्कार अलग हैं। जिसने हमारे विश्वास को चोट पहुंचाई, वह उसकी सोचने-समझने और जीने का तरीका हो सकता है, हमारा नहीं। हम अपने मन में अपनी अच्छी और कल्याण की भावना ही रखें। विश्वास कायम रखें। अगर कोई नकारात्मक या जड़ प्रकृति वाला व्यक्ति अपने स्वभाव को नहीं छोड़ता है, तो हमें अपनी सकारात्मकता क्यों छोड़नी चाहिए। जीवन अगर आगे के सफर पर बढ़ता है, तो उसकी राह सकारात्मक ही हो सकती है।

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