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दुनिया मेरे आगे: विरह की भावना को प्रेम में बदलना ही है सकारात्मकता

जीवन जब तक नदी की तरह बह रहा है, तब तक जीवन है। जिस दिन ठहर गया, उस दिन वह दुनिया से बिछड़ गया। इसलिए हम स्मृतियों के समांतर जीने के विकल्प की खोज कर सकते हैं। बाहर दूसरे लोगों की निस्वार्थ सेवा एक ऐसा मार्ग है, जहां हमें सुकून मिल सकता है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 02, 2024 10:46 IST
दुनिया मेरे आगे  विरह की भावना को प्रेम में बदलना ही है सकारात्मकता
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(सोशल मीडिया)।
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लोकेंद्रसिंह कोट

अपने किसी प्रियजन को खोने या उनके बिछड़ने के बाद एक ऐसा खालीपन उभर कर सामने आता है, जिसे भरना नामुमकिन-सा रहता है। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि उन दो व्यक्तियों में आपसी लगाव किस हद तक रहा और दोनों एक दूसरे के प्रति कितने संवेदनशील रहे या हैं। कई बार यह आपसी लगाव इतना गहरा होता जाता है कि कभी कल्पना में भी बिछड़ने की वे सोच नहीं सकते। किसी ऐसे ही पल में ये पंक्तियां फूटी होंगी कि ‘मैं घर में एक कमरा रखूंगा… दूंगा नाम तेरा और उसे तन्हा रखूंगा!’

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जीवन और मृत्यु का खेल सभी को पता होता है। सभी को किसी न किसी से बिछड़ना है, यह भी पता होता है। मगर फिर भी मन के किसी कोने से इसका भान ही नहीं होता। कुछ समय पहले एक खबर आई कि लंदन में एक महिला है, जो हर दिन सबवे (मेट्रो) स्टेशन में जाकर बैठती है, केवल 1950 में अपने पति द्वारा रिकार्ड की गई घोषणा को सुनने के लिए। 2003 में मार्गरेट के दिल में एक खाली स्थान छोड़कर ओसवाल्ड की मृत्यु हो गई।

इसलिए मार्गरेट ने पति की उपस्थिति के अहसास को करीब से महसूस करने का एक तरीका खोजा। और वे उनकी रिकार्ड की हुई सूचना सुनने मेट्रो स्टेशन आने लगीं। आधी सदी से भी अधिक समय के बाद इस आवाज की जगह एक इलेक्ट्रानिक रिकार्डिंग ने ले ली। मार्गरेट ने लंदन ट्रांसपोर्ट कंपनी से यह कैसेट टेप मांगा, ताकि वह घर पर अपने पति की आवाज सुन सके।

इस मसले के इतिहास के बारे में जानकारी होने के बाद कंपनी ने उत्तरी लाइन के तटबंध ठहराव पर मार्गरेट के घर के पास वाले स्टेशन पर घोषणा को बहाल करने का फैसला किया, जहां सभी यात्री आज ओसवाल्ड लारेंस की आवाज सुन सकते हैं और यह सोचने के लिए कि शाश्वत प्रेम वास्तव में मौजूद है।

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खालीपन, अकेलेपन से नितांत अलग है। खालीपन मन के किसी कोने का अहसास है जो सिर्फ वही व्यक्ति भर सकता है जो अब नहीं रहा। जाहिर है, अगर वह व्यक्ति किसी रूप में हमेशा के लिए बिछड़ गया है तो उसकी यादें, तस्वीरें, आवाज, बातें सब सहारा होती हैं उस खालीपन को भरने का। समय की गूंज इतनी तेज होती है कि उस खालीपन के अव्यक्त मौन को भी चीर देती है। जब जेहन में किसी व्यक्ति की यादें भरी होती है तो हर कहीं वही दिखाई देता है। हर परिस्थिति में लगता है उसका साथ होता तो वह अभी क्या-क्या कर रहा होता। खालीपन उस श्मशान वैराग्य को भी छीन लेता है जो अक्सर कहता है कि कुछ नहीं रखा इस दुनिया में।

ऐसे अनचाहे दुख से निपटने के लिए हमें कमर कस कर आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि यह खत्म भी तभी होगा, जब हम चाहेंगे। यह इसलिए भी जरूरी है कि जीवन जब तक नदी की तरह बह रहा है, तब तक जीवन है। जिस दिन ठहर गया, उस दिन वह दुनिया से बिछड़ गया। इसलिए हम स्मृतियों के समांतर जीने के विकल्प की खोज कर सकते हैं। बाहर दूसरे लोगों की निस्वार्थ सेवा एक ऐसा मार्ग है, जहां हमें सुकून मिल सकता है।

अनाथाश्रम, वृद्धाश्रम, महिला सुधार गृह, बाल सुधार गृह, जेल, अस्पताल, गरीब बस्ती आदि ऐसी जगहें हैं, जहां अपने दुख कम ही लगेंगे। यों भी सेवा करने से बहुत सारे आंतरिक सीमाएं टूटती हैं। जब हमारे दुख छोटे होने लगते हैं तो फिर अपनों की याद में हम दूसरों का भला कर सकते हैं। हमारी सारी शिकायतें धुल जाती हैं। सेवा का मार्ग हमें और विस्तृत करता है। मैं, मेरा से निकालकर हमें एक विशाल दुनिया का परिचय करवाता है। सेवा करते हुए हम पाते हैं कि जिनको हमने खोया है, उन्हीं की याद दिलाते चेहरे हमें हमारी यादें खुशगवार बना देंगे।

दूसरा रास्ता है प्रार्थना का, समर्पण का। जिस किसी को भी हम मानते हैं, चाहे वह ईश्वर हो, गुरु हो या फिर कोई और सम्माननीय हों, उन्हें समर्पण कर देना चाहिए और प्रार्थना करना चाहिए कि इस परिस्थिति से निकलने में हमारी मदद करें। कहते हैं, सच्चे मन से की गई प्रार्थना सुनी जाती है। ध्यान, प्राणायाम ऐसे माध्यम हैं, जो किसी की भी प्रार्थना को श्रेष्ठ बना सकते हैं, उसके समर्पण को मजबूती दे सकते हैं।

तीसरा रास्ता है अपनी शक्ति की पहचान। हमारे अंदर एक शक्ति है जो हमें अपने बिछड़े साथी, मित्र, बंधु के अधूरे सपने को पूरा करने के लिए प्रेरित कर सकता है। हमें उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने में उनके साथ होने का आनंद मिल सकता है। उनकी याद में गोष्ठी, संगीत, सत्संग, पुरस्कार रख कर हम उन्हें बेहतर ढंग से याद कर पाएंगे।

कुल मिलाकर जो बिछड़ गया है, वह हमारी यादों में सकारात्मक रूप से रहे, यही उसके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी। स्वयं दुखी होकर या नकारात्मक होकर हम दूसरों के और अपने साथ अन्याय कर रहे होते हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम सकारात्मक रहें। कुछ नुकसान की भरपाई कुछ ठोस काम करके या इसके अलावा सेवा, प्रार्थना, सपने पूरे करके की जा सकती है। विरह की नकारात्मकता को प्रेम में बदलना ही खाली जगह को भरना है और यह भी सत्य है कि केवल हममें से कोई खास ही इसके पीड़ित नहीं हैं, संसार में और भी लोग हैं जो इस स्थिति से गुजर रहे हैं, उसका सामना कर रहे हैं।

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