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दुनिया मेरे आगे: रिश्तों का अनूठा पुल, ‘मैं तुम्हें फिर मिलूंगी, उसने जिस्म छोड़ा है, साथ नहीं’

इमरोज के साथ अपने संबंधों के बारे में स्वयं अमृता ने भी ‘रसीदी टिकट’ में बहुत कुछ बयान किया था- ‘अजनबी! तुम मुझे जिंदगी की शाम में क्यों मिले, मिलना था तो दोपहर में मिलते।’
Written by: चंद्र त्रिखा
नई दिल्ली | Updated: December 25, 2023 09:32 IST
दुनिया मेरे आगे  रिश्तों का अनूठा पुल  ‘मैं तुम्हें फिर मिलूंगी  उसने जिस्म छोड़ा है  साथ नहीं’
कवयित्री अमृता प्रीतम और इमरोज़। (Express archive)
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चंद्र त्रिखा

इमरोज से मेरी पहली मुलाकात उदयपुर में हुई थी। आकाशवाणी के एक कार्यक्रम के सिलसिले में वे अमृता जी के साथ आए थे। मुझे वहां एक सत्र में अमृता जी से कुछ सवाल पूछने थे। कार्यक्रम के निर्माता को मालूम था कि मैं इन दोनों से पहले कई बार मिल चुका था। वहां मेरे सहज सवाल, उन दोनों की पहली मुलाकात और आपसी संबंधों की पाकीजगी के बारे में थे। उनके जवाब अभी भी जेहन में जीवित हैं। लगभग सत्तानबे वर्ष की उम्र में इमरोज ने जो आखिरी सांस ली होगी, उसमें भी शायद अमृता के नाम या अहसास की एक हल्की दबी-दबी गूंज रही होगी।

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इमरोज और अमृता प्रीतम की प्रेम कहानी दुनियाभर में प्रचलित है

तब इमरोज ने बताया था, ‘हमारी पहली मुलाकात 1957 में हुई थी। बात उनकी किसी कृति के मुखपृष्ठ को लेकर चली थी, मगर धीरे-धीरे उनकी लगभग सभी कृतियों में मेरा प्रवेश सहज भाव से होता चला गया। शून्य में तकते हुए तब उन्होंने यह भी कहा था, तब भी लगा था कि मुलाकातों व आपसी परिचय का सिलसिला शायद हम दोनों के जन्म से भी पहले शुरू हो चुका था। कब से किस जन्म से, कुछ पता ही नहीं चला। इमरोज का अमृता प्रीतम से विशेष संबंध रहा। उनकी और अमृता प्रीतम की प्रेम कहानी कई मंचों पर दुनियाभर में प्रचलित है।

अमृता ने अपने आखिरी पलों में इमरोज के लिए एक कविता लिखी थी

अमृता प्रीतम के आखिरी लम्हों में भी इमरोज उनके साथ ही रहे। 31 अक्तूबर, 2005 को अमृता का निधन हुआ था। वे उन्हें ‘जीत’ कहकर बुलाती थीं। अमृता के जाने के बाद इमरोज भी कविता लिखने लगे। अमृता ने अपने आखिरी पलों में इमरोज के लिए एक कविता लिखी थी। इस कविता के शब्द थे- ‘मैं तुम्हें फिर मिलूंगी’। इमरोज ने भी अमृता के लिए कविता लिखी थी, जिसके शुरुआती शब्द थे- ‘उसने जिस्म छोड़ा है, साथ नहीं।’

26 जनवरी, 1926 को पाकिस्तान में जन्मे इमरोज का असली नाम इंद्रजीत सिंह था। उनका जन्म लाहौर से लगभग सौ किलोमीटर दूर एक गांव में साधारण परिवार में हुआ था। अमृता के दुनिया से जाने के बाद से ही इमरोज गुमनामी का जीवन जी रहे थे। उन्होंने पिछले कुछ सालों से किसी से मिलना-जुलना बंद कर रखा था।

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एक बार अमृता, इमरोज और मैं उदयुपर से रनकपुर जैन-मंदिर देखने चले गए। अमृता थकान महसूस कर रही थीं। मंदिर के एक चबूतरे के समीप ही चौकीदार की कुर्सी पर बैठ गर्इं। इमरोज मुझे भीतर की ओर ले गए। बोलते गए, मैं सुनता गया- ‘जानते हो ये मूर्तियां तराशी नहीं गर्इं थीं। ये जीती जागती तपस्विनियां थीं, जीते जागते तपस्वी संत-साध्वियां। तपश्चर्या के मध्य ध्यान भटका होगा और ये सब इन प्रस्तर मूर्तियों में बदल गए। अजंता-एलोरा की गुफाएं भी ऐसे ही अभिशापों में उपजी थीं। तभी तो लगता है, अब पत्थर बोलने लगे। कभी-कभी लगता है यह बीबी अमृता भी स्थायी रूप से प्रतिमा बनेगी और मुझे जीते जी इसे निहारते रहना पड़ेगा।’

यह सारी अभिव्यक्ति अनूठी थी। तब कुछ पलों के लिए लगा था, यह कोई इंसान नहीं कोई यक्ष बोल रहा था। इमरोज बता रहे थे, ‘जब नागमणि पत्रिका आरंभ की तो लगा था, लीक से हटकर कुछ हो रहा है। पहले सोचा था अमृता जी संपादक होंगी और मैं सह-संपादक। मैं एक प्रारूप बनाकर ले गया था। उन्होंने काट कर संपादक के स्थान पर ‘कामे’ यानी काम करने वाले, लिख दिया और उसके आगे अपना और मेरा दोनों का नाम लिख डाला।’ कई बार हैरानी भी होती कि इन दोनों की साझी ‘संतान’ नागमणी के न तो सभी अंक जिल्दों में पिरोए गए या प्रकाशित हुए, न ही अमृता के संपादकीय और इमरोज के स्कैन ही एक पुस्तकाकार में आ पाए। चंडीगढ़ में ‘अमृता दीयां धीयां’ नाम से एक संस्था भी उभरी, मगर एकाध साल के बाद सभी को अपनी-अपनी जिंदगी ने घेर लिया, सीमित कर दिया।

इमरोज के साथ अपने संबंधों के बारे में स्वयं अमृता ने भी ‘रसीदी टिकट’ में बहुत कुछ बयान किया था- ‘अजनबी! तुम मुझे जिंदगी की शाम में क्यों मिले, मिलना था तो दोपहर में मिलते।’ अमृता इमरोज से अक्सर इस तरह के सवाल पूछती थीं, क्योंकि इमरोज अमृता की जिंदगी में बहुत देर से आए थे। वे दोनों एक ही घर में एक ही छत के नीचे अलग-अलग कमरे में रहते थे। एक मौके पर अमृता ने इमरोज से कहा कि पूरी दुनिया घूमकर आओ फिर भी तुम्हें लगे कि साथ रहना है, तो मैं यहीं तुम्हारा इंतजार करती मिलूंगी। उस समय इमरोज ने अपने कमरे के सात चक्कर लगाने के बाद अमृता से कहा कि घूम ली दुनिया, मुझे अभी भी तुम्हारे ही साथ रहना है। अमृता ने इमरोज का जिक्र करते हुए कहा कि जब मैं रात को शांति में लिखती थी, तब धीरे से इमरोज चाय रख जाते थे।

‘कलम ने आज गीतों का काफिया तोड़ दिया...'

अमृता को जब राज्यसभा का मनोनीत सदस्य बनाया गया तो इमरोज उनके साथ संसद भवन जाते और घंटों बाहर बैठ कर अमृता के लौटने का इंतजार करते। इमरोज बताते थे, ‘कई बार मैं अमृता को अपने स्कूटर के पीछे बैठाकर घुमाने ले जाता। वह मेरी पीठ पर कुछ लिखती रहती।’ मैं इस बात से अच्छे से वाकिफ था कि मेरी पीठ पर वह जो शब्द लिख रही थी, वह साहिर का नाम था। तब अमृता ने एक बार लिखा था- ‘कलम ने आज गीतों का काफिया तोड़ दिया/ मेरा इश्क यह किस मुकाम पर आ गया है/ देख नजर वाले, तेरे सामने बैठी हूं/ मेरे हाथ से हिज्र का कांटा निकाल दे/ जिसने अंधेरे के अलावा कभी कुछ नहीं बुना/ वह मुहब्बत आज किरणें बुनकर दे गई/ उठो, अपने घड़े से पानी का एक कटोरा दो/ राह के हादसे मैं इस पानी से धो लूंगी..!’ और अब जब एकाएक यह सिलसिला थमा है, तब भी यही लगता है कि वे दोनों तो जिस्मों की कैद से आजाद हो गए, मगर उनकी चर्चा वारिस के हीर-रांझा से कम नहीं होगी।

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