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दुनिया मेरे आगे: बनावटी संसार में सुगंध के लिए फूलों पर छिड़का जा रहा इत्र

एक सजीव पौधे को हम अपनी बगिया में लगाते हैं तो उसका बढ़ना देखते हुए प्रफुल्लित होते हैं, उससे संबंधित कितने ही विचार दिमाग में कौंधते हैं। फूलदान में फूल लगाते हैं तो हम उसके खिले रहने और मुरझाने को देखते हैं, क्योंकि वहां जीवन है। जहां जीवन नहीं, वहां कैसा खिलना और कैसा मुरझाना?
Written by: अनुपमा तिवाड़ी | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: March 02, 2024 10:52 IST
दुनिया मेरे आगे  बनावटी संसार में सुगंध के लिए फूलों पर छिड़का जा रहा इत्र
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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कुछ समय पहले एक परिचित का जब मौजूदा जगह को छोड़ कर पैतृक शहर जाना तय हुआ तब उनकी विदाई को यादगार लम्हे में बदलने के लिए उनके सहकर्मी कोई सामान लाने बाजार गए। उन्होंने एक तोहफे के साथ फूलों का एक गुलदस्ता लिया। फूल बेचने और गुलदस्ता तैयार कर रहे व्यक्ति के पास में ही दो प्लास्टिक के छोटे पारदर्शी डिब्बे रखे थे, जिनके भीतर रंगीन खड़ी पतली-पतली कांच की शीशियां रखी थीं।

दुकान फूलों की थी, इसलिए यह अलग-सी चीज के बारे में जब उससे पूछा गया तो उसने बताया कि यह सेंट यानी इत्र है। उसने आगे सवाल किए जाने पर उसने बताया कि इत्र को फूलों पर छिड़का जाता है, ताकि फूलों में खुशबू आ जाए। ऐसे ही संदर्भ के लिए शायद एक गीत की पंक्ति की रचना हुई होगी कि ‘सच्चाई छिप नहीं सकती, बनावट के उसूलों से/ कि खुशबू आ नहीं सकती बनावट के फूलों से’! फूल के प्रतीक से किसी के व्यक्तित्व की व्याख्या करने का वह दौर चला गया। अब खुद फूलों को ही खुशबू के लिए बाहरी सहारे की जरूरत पड़ने लगी है।

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एक समय था जब अलग-अलग तरह के फूलों से इत्र बनाए जाते थे। अब ‘हाइब्रिड’ फूलों की खेती बहुतायत में होने के कारण फूलों में खुशबू ही नहीं बची है और वे कागज के फूलों की तरह ही लगने लगे हैं। मजे की बात यह है कि वे कागज के फूल नहीं हैं, बल्कि सचमुच के फूल हैं। तो क्या अब आगे फूलों की सुगंध की बात तिलिस्मी लगने लगेगी? अब कृत्रिम खुशबू से फूलों को महकाया जा रहा है।

आजकल कितने ही होटलों और घरों में प्लास्टिक के फूल और बेलें सजावट के तौर पर सजाई जाती हैं। इन दिनों किसी भी शादी में जाया जाए, शादी के लिए तैयार उद्यान में प्लास्टिक के फूलों की सजावट की भरमार मिलेगी। लोगों के चेहरे उन फूलों को देखकर खिलते नहीं। कैसे खिलेंगे? वे फूल खुद ही नहीं खिलते। निर्जीव फूलों में जान नहीं हैं तो वे किसी को कैसे जीवंत रख सकते हैं?

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एक सजीव पौधे को हम अपनी बगिया में लगाते हैं तो उसका बढ़ना देखते हुए प्रफुल्लित होते हैं। उसे देखते हुए उससे संबंधित कितने ही विचार दिमाग में कौंधते हैं। फूलदान में फूल लगाते हैं तो हम उसके खिले रहने और मुरझाने को देखते हैं, क्योंकि वहां जीवन है। जहां जीवन नहीं, वहां कैसा खिलना और कैसा मुरझाना?

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अब कितने ही खाने के रंग और सुगंध, जो प्राकृतिक रूप से भोजन की थाली में होते थे, वे धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। अब हर व्यंजन के लिए बाजार में कृत्रिम सुगंध और रंग उपलब्ध हैं। त्योहारों पर कृत्रिम मावा और व्यंजनों की चमक-दमक दिखाने के लिए खाने की सुगंध और रंगों का खूब इस्तेमाल किया जाता है। सुगंध और खाने के रंग गुर्दे, यकृत को भारी नुकसान पहुंचाते हैं।

नियमित रूप से या कभी-कभी भी कृत्रिम खुशबू, जिसमें ‘रूम फ्रेशनर’ यानी कमरे में खुशबू बिखरे वाले रसायन, परफ्यूम और यहां तक कि सुगंधित मोमबत्तियों और अगरबत्तियों में अनेक प्रकार के रसायन होते हैं जो कई प्रकार की एलर्जी, श्वसन संबंधी रोग, कैंसर, माइग्रेन, सिरदर्द और अस्थमा जैसी बीमारियों को जन्म देते हैं।

अनेक प्रकार के सौंदर्य प्रसाधनों से सांस लेने में कठिनाई और त्वचा के रोग होने की संभावना होती है। सौंदर्य प्रसाधन के अन्य साधन वे कम-ज्यादा चेहरे और शरीर के अन्य अंगों को नुकसान ही पहुंचाते हैं। ये सुंदर बनने के लिए क्षणिक नुस्खे या पैकेज की तरह हैं, जो हमें कुछ समय के लिए सुंदरता तो प्रदान करते लगते हैं, लेकिन इनका शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

यह एक तरह से बनावटी तौर-तरीकों में सुंदरता देखने का मसला है। वह सुंदर है जो दिखता है। बनावटी सौंदर्य, बनावटी चेहरे, बनावटी हंसी यहीं तक नहीं रुकती। वह हमारे जीवन में उस ओर ले कर जाती है, जिसमें जो दिखाई दे रहा है, वह है ही नहीं। बाजार चकमा देने पर उतारू है और हम चकमा खाने पर। ऐसे में हम अनजाने में ही बनावटीपन को पसंद करने लगते हैं। उसका महत्त्व हमारे जीवन में बढ़ता जाता है, जिसमें सब कुछ एक समय के बाद खोखला लगने लगता है।

बात और आगे बढ़ती है और ये फिर रिश्तों की ओर भी जाती है। बहुत से रिश्ते बनावटी बनते जाते हैं और फिर बहुत से लोगों की भीड़ से घिरे रहने के बाद भी कई बार हम अपने को अकेला महसूस करने लगते हैं। बनावटीपन से हम कुछ समय के लिए तारीफ भले ही बटोर लें, लेकिन चेहरे के पीछे छिपा सच चेहरे पर आ ही जाता है। आज महानगरों की चमचमाहट आदमी को इस कदर बेचैन करने लगी है कि अब लोग सप्ताहांत जैसी छुट्टियां मनाने गांवों, जंगलों की ओर जाने लगे हैं। इसके पीछे कितना प्रकृति प्रेम है और कितना भीड़ में शामिल होने और दूसरों के मुकाबले श्रेष्ठताबोध की भूख, कहा नहीं जा सकता।

अब अलग-अलग राज्य की संस्कृति की झलक दिखाते रेस्तरां लोगों को लुभाने लगे हैं। आखिर इंसान शायद लंबे समय तक बनावटीपन के साथ नहीं रह सकता। उसे सुकून तो असलियत में ही चाहिए और यह सुकून भी तब ही मिल सकता है, जब चीज असली हो। मूल रूप से आदमी को सादगी में सौंदर्य ही अधिक लुभाता है, जिसमें सब कुछ कितना सधा हुआ है।

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