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दुनिया मेरे आगे: अपने कार्य और परिवार के बीच सामंजस्य स्थापित करने की जरूरत

रिश्ते समय-समय पर मरम्मत की मांग करते हैं। जिस तरह एक दरार पड़ा मकान मजबूत नहीं होता और किसी भी समय उसके ढह जाने का डर हमें सताता रहता है, उसी तरह मूक अलगाव के चलते हमारे रिश्ते का खत्म हो जाने का भय हमारे मन और मस्तिष्क पर लगातार प्रहार करता जाता है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 10, 2024 10:25 IST
दुनिया मेरे आगे  अपने कार्य और परिवार के बीच सामंजस्य स्थापित करने की जरूरत
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(सोशल मीडिया)।
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दीपिका शर्मा

जीवन गतिशील है। जब तक सांसें हैं, यह चलता रहता है, लेकिन परिस्थितियां हैं जो आए दिन बदलती रहती हैं। जब अच्छा समय रहता है तो सब कुछ आसान लगने लगता है और जब कठिन दौर आता है तो जीवन में हताशा और मायूसी छाने लगती है। जीवन मानो अंधकार में लीन हो जाता है। ऐसा ही हमारे रिश्तों में होता है। जब रिश्ते मधुर होते हैं तो सब कुछ रंगीन होता है, मानो दुनिया में सब बेहद खूबसूरत है और हम दुनिया के सबसे भाग्यशाली व्यक्ति हैं।

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मगर उन्हीं रिश्तों से हमें आघात पहुंचता है तो हम टूट जाते हैं। तब दुनिया बेरंग हो जाती है। हम अकेलेपन को अपना साथी मान बैठते हैं जो धीरे-धीरे हमें अंदर से खोखला करता जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि किसी भी परिस्थिति में हमारे पास खुद पर काबू पाने का हुनर होना चाहिए, क्योंकि सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जिसमे निरंतर बदलाव होना स्वभाविक है। फिर रिश्तों में हताशा क्यों?

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पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह हमारे देश में पश्चिमी संस्कृति पांव पसार रही है, उसका असर हमारे रिश्तों पर बहुत अधिक पड़ने लगा है। हमारे भारतीय समाज में शादी को जन्म-जन्मांतर का रिश्ता माना जाता है, लेकिन अब धीरे-धीरे लोगों की सोच बदल रही है। इसका सबूत है तलाक और अलगाव के बढ़ते मामले। इसमें पारिवारिक व्यवस्था का क्या होगा, कहा नहीं जा सकता।

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इसका कारण क्या है? बढ़ती शिक्षा दर, आधुनिकता, सहनशीलता में कमी या कुछ और? यह समझने की जरूरत है कि पति-पत्नी का रिश्ता बेहद संवेदनशील होता है। जिसे हम विश्वास, ईमानदारी और साझेदारी के बीजों की माला बनाकर वरमाला के रूप में एक दूसरे को पहनाते हैं। मगर आज का दौर इस कदर बदल गया लगता है कि शादी के कुछ दिन या महीने बाद ही एक दूसरे से किए वादों की अनदेखी कर दी जाती है, जिससे एक दूसरे के बीच मतभेद, लड़ाई-झगड़े की नौबत आती है। हालात अगर संभाले नहीं गए तो रिश्ता तलाक तक पहुंच जाता है। अन्यथा पति या पत्नी में से दोनों या कोई एक मौन अलगाव का सहारा लेता हैं, जिसे मूक अलगाव या ‘साइलेंट सेपरेशन’ कहा जाता है। यह कोई कानूनी दांवपेच से नहीं, बल्कि खुद के फैसले से होता है।

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एक मजबूत रिश्ते की नींव समानता पर आधारित है, जहां दोनों सम्मानित, सराहना और मूल्यवान महसूस करते हैं। मगर तनाव और अलगाव इन सभी पर वार करता है और रिश्ते को खामोशी की तरफ ले जाता है। वहीं यह खामोशी भावनात्मक रूप से दोनों को अलग करने का काम करती है और अंदर ही अंदर एक नासूर बन जाती है, जिसका असर शारीरिक और मानसिक रूप से देखने को मिलता है।

ऐसे में मस्तिष्क में ‘हैप्पी हारमोन’ यानी खुशी पैदा करने वाले रसायन का बनना कई गुना कम हो जाता है। हम चाहे खुद को कितना भी व्यस्त रख लें, लेकिन एक रिश्ते की टीस खत्म नहीं होती। चाहे महिला हो या पुरुष, इसका दर्द दोनों को ही होता है। फर्क इतना है कि महिलाओं में इसका असर कुछ ज्यादा होता है, जिसका कारण है अपने जीवन साथी से उम्मीदों का भाव ज्यादा होना।

वहीं आज के समय में आमतौर पर दोनों का कामकाजी होना भी मूक अलगाव का एक कारण है, लेकिन कामकाज भी परिस्थितियों की भी मांग होती है। ऐसे में जरूरी है कि अपने काम और परिवार के बीच सामंजस्य बिठाया जाए। पूरे दिन में एक ऐसा समय निर्धारित किया जा सकता है, जिसमे दोनों एक दूसरे से अपने मन की बातों का आदान-प्रदान कर सकें और बेहद जरूरी यह कि अपने काम की परेशानियों को दफ्तर में ही छोड़कर आया जाए, ताकि परिवार के साथ अच्छा वक्त बिताया जा सके। किसी भी लड़ाई झगड़े को लंबा खींचना या मन ही मन घुटते रहना अवसाद की ओर ले जाता है, जिसके बाद व्यक्ति चाह कर भी अपने रिश्ते को सुधारने में नाकाम रहता है। इसलिए समय रहते अपने जीवनसाथी से मन में उठ रहे सवालों पर प्यार से चर्चा कर लेना ही इसका अचूक उपाय है।

मूक अलगाव एक ‘खामोश हत्यारे’ की तरह काम करता है। जिस तरह शरीर में उच्च रक्तचाप का बना रहना शरीर के लिए खामोश हत्यारे का कार्य करता है और शरीर के महत्त्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचाता रहता है, उसी तरह मूक अलगाव भी हमारी खुशियों पर ग्रहण की तरह रहता है। यह हमें सिर्फ इस बात की तसल्ली देता है कि हम लड़ाई झगड़ों से दूर शांतिपूर्वक अलग-थलग एक छत को साझा कर रहे हैं, जिसमें हम खुश रहने की भरपूर कोशिश करते हैं।

मगर यह मन का वहम है। यह खामोशी भीतर तक खोखला करता रहता है और तनाव के साथ अकेलेपन की ओर धकेलता रहता है।रिश्ते समय-समय पर मरम्मत की मांग करते हैं। जिस तरह एक दरार पड़ा मकान मजबूत नहीं होता और किसी भी समय उसके ढह जाने का डर हमें सताता रहता है, उसी तरह मूक अलगाव के चलते हमारे रिश्ते का खत्म हो जाने का भय हमारे मन और मस्तिष्क पर लगातार प्रहार करता जाता है। किसी भी रिश्ते को सुरक्षित रखना चौबीस घंटे की नौकरी करने के बराबर है। साथ ही समय समय पर इसे निरंतर रखरखाव और मरम्मत की आवश्यकता बनी रहती है। रिश्तों को संजो कर रखना एक स्वस्थ और खुशहाल जीवन की पहचान है।

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