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दुनिया मेरे आगे: निजी और सार्वजनिक जीवन को संतुलित बनाने की जरूरत

एक सामाजिक प्राणी और मनुष्य होने के कारण हमारा परम कर्तव्य है कि हम एक-दूसरे के सुख-दुख को समझें।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: February 28, 2024 12:05 IST
दुनिया मेरे आगे  निजी और सार्वजनिक जीवन को संतुलित बनाने की जरूरत
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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रितुप्रिया शर्मा

मनुष्य होने के नाते हम सभी यह जानते हैं कि सामाजिकता हमारा मूल स्वभाव है और इसी के नाते हमारी यह कोशिश रहती है कि हम समाज के सभी अंगों से जुड़े रहें। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए हम कई तरह के प्रयास करते हैं। हम न केवल अपने आस-पड़ोस और रिश्तेदारों से संबंधों को मजबूत बनाते हैं, बल्कि दूसरे लोगों से भी जुड़ने का प्रयास करते हैं।

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यह बहुत स्वाभाविक है कि हमारे इस सामाजिक जीवन में हमें कई तरह की कठिनाइयों से भी गुजरना पड़ता है। इसके बावजूद हम अपने सामाजिक संबंधों को बनाए रखते हैं। सुख और दुख जीवन के दो पहलुओं का नाम है, क्योंकि ये सदा ही साथ चलते आए हैं। मानव-जीवन ही सुख-दुख की छाया है।

एक सामाजिक प्राणी और मनुष्य होने के कारण हमारा परम कर्तव्य है कि हम एक-दूसरे के सुख-दुख को समझें। प्रश्न यह उठता है कि व्यक्तिगत रूप से हमारा एक-दूसरे के प्रति कैसा भाव है? अगर हम अपने हृदय में वसुधैव कुटुंबकम का भाव रखते हैं तो हम भाईचारे की पक्की नींव रख सकते हैं। मनुष्य से संबंध अत्यंत अटूट है, लेकिन इतना होना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि आज का युग नितांत व्यक्तिगत हो गया है।

वैयक्तिकता किस सीमा तक हो? जीवन पूरी तरह सार्वजनिक नहीं जिया जा सकता है। इसलिए निजता और सामाजिकता के बीच का उचित तालमेल स्थापित करना ही होगा। आज हमारा सामाजिक दायरा सोशल मीडिया द्वारा निर्धारित हो रहा है। यही यह तय करता है कि किसी क्षेत्र में हम कितने सफल हैं, कितने सामाजिक हैं और क्या कर रहे हैं।

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क्या वाकई हम सभी लोग सारा सच सोशल मीडिया पर व्यक्त कर सकते हैं? क्या सोशल मीडिया अभिव्यक्ति के सामाजिक होने की खानापूर्ति नहीं बनती जा रही है? ये प्रश्न हमारी सामाजिकता के प्रति एक अलग सोच को अभिव्यक्त करते हैं। सबसे जरूरी बात यह है कि क्या यही हमारा कर्तव्य है समाज के लिए कि किसी घटना पर सोशल मीडिया पर विचार प्रकट किए जाएं और बस काम हो गया!

माना जा सकता है कि आज के दौर में इसका महत्त्व है, लेकिन हमें खुद समाज के बीच उतरकर प्रयास का अमृत बरसाना होगा। निजता को हावी नहीं होने देने को कहा जाता है, वहीं अपने व्यक्तिगत जीवन की उपादेयता को भी सर्वोपरि रखना चाहिए। हमें संतुलन की ओर बढ़ना होगा, वरना संतुलन का अभाव हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा। जिस तरह से हम मोबाइल और लैपटाप को अपने निजी जीवन में एक जरूरी आवश्यकता के तौर पर ले रहे हैं, उसमें वह दिन दूर नहीं है, जब हम पूरी तरह इन पर ही निर्भर हो जाएंगे।

कोई भी सोशल मीडिया मंच कभी भी मूल कार्यक्रम और सेवाओं की जगह नहीं ले सकता। इसके लिए तो समाज में जाकर, लोगों के बीच उनके सुख-दुख में सहयोग देकर, सहायता और उत्साह भर कर ही हम सामाजिक-सार्वजनिक जीवन की उपादेयता सिद्ध कर सकते हैं। सोशल मीडिया मंच पर विचार प्रकट करना कोई बुरी बात नहीं है। इससे भी लोगों में जागरूकता आती है, लेकिन ज्यादातर वक्त पर ये सब चीजें लोगों के वक्त गुजारने का एक तरीका मात्र है। कई बार तो इनका इतना नकारात्मक प्रभाव होता है कि लोग अपनी मूल विचारधारा को ही भूल जाते हैं।

सोशल मीडिया मंचों पर कई बार ऐसे मुद्दों पर बात की जाती है, जो समाज की एकता के लिए बहुत ही खतरनाक साबित हो सकते हैं। हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं, जिसमें सभी लोग समान हैं, लेकिन कई बार इन मंचों के जरिए अफवाहें उड़ाई जाती हैं, जिसके घातक नतीजे सामने आते हैं। प्रामाणिक खबरों पर विश्वास करना चाहिए, वरना अव्यवस्था फैल जाएगी।

आज भी अखबारों का महत्त्व कम नहीं हुआ है। समाचारों की अहमियत तब होती है, जब वे प्रामाणिक हों और इसके लिए लोग इन्हें विश्वसनीय मानते हैं। जबकि सोशल मीडिया से सबसे ज्यादा हमारी युवा पीढ़ी प्रभावित हो रही है। उनका ज्यादातर वक्त पढ़ाई-लिखाई और काम करने के बजाय इन्हीं चीजों में गुजर रहा है। कई बार तो बच्चे इनमें उलझकर अपने जीवन को भी बर्बादी की ओर ले जाते हैं।

किसी चीज को जान-समझ कर अपनाने में कोई बुराई नहीं है। मगर इन मंचों में लीन युवा आज सामाजिक तो दूर, वे अपने परिवार से भी दूर होते चले जा रहे हैं। घरवाले अगर कोई काम करने को कहते हैं, उनका मानना होता है कि उनका वक्त बर्बाद हो रहा है और सोशल मीडिया मंचों पर कितना वक्त बेकार चला जाता है, उन्हें पता भी नहीं चलता। मनोरंजन, गेम और बातचीत के नाम पर अपने परिवार को ही दरकिनार कर दिया जाता है। ऐसे में निजी और सार्वजनिक जीवन को संतुलित बनाने की जरूरत है।

इससे इतर कई युवा दंपतियों का गृहस्थ-जीवन सोशल मीडिया ने बर्बाद कर दिया है। एक-दूसरे के प्रति शक और सामंजस्य की कमी को बढ़ाया है। बुजुर्ग मां-पिता के प्रति अपना ध्यान केंद्रित करने के बजाय लोग अपने महंगे स्मार्टफोन पर अधिक ध्यान देते हैं। सामाजिक कर्तव्य के नाम पर कोई टिप्पणी लिख देना फैशन है।

लोग नहीं समझ पा रहे है कि इसका कोई रचनात्मक पहलू निकाला जाए और समाज को कुछ अच्छा दिया जाए। सोशल मीडिया मंचों पर जाने में बुराई नहीं है, मगर इसका मतलब यह नहीं है कि इनकी वजह से हम अपना सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन और उसका स्वरूप बिगाड़ लें। दोनों चीजों से संतुलन बनाए रखना हमारी आवश्यकता है।

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