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दुनिया मेरे आगे: जागरूकता की जरूरत, समाज के बिना राजनीति का न कोई अस्तित्व है और न ही कोई भविष्य

विडंबना यह है कि समस्याओं के स्रोत की पहचान लोग कर सकते हैं, मगर कई बार सुविधा का जीवन जीने वाला तबका साधारण लोगों को राजनीति से निरपेक्ष होने की सलाह देता है। जबकि समाज अगर किसी समस्या से दो-चार है तो उसका स्रोत व्यवस्था में छिपा हो सकता है। पढ़ें रितुप्रिया शर्मा के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: April 18, 2024 14:16 IST
दुनिया मेरे आगे  जागरूकता की जरूरत  समाज के बिना राजनीति का न कोई अस्तित्व है और न ही कोई भविष्य
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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समाज में समस्याएं अनेक हैं, निवारण कम। ज्यादातर लोग अपने आप में गुम अपनी समस्याओं से जूझते रहते हैं, मगर उसके कारणों पर विचार करना या तो जरूरी नहीं समझते या फिर उन्हें इस ओर ध्यान देने का वक्त ही नहीं मिलता। कई बार जब समस्याओं या मूल मुद्दों के हल के लिए उसके कारणों की पड़ताल की दिशा मुखर होना शुरू होती है तो कुछ ऐसे मुद्दे सतह पर तैरने लगते हैं, जिसे देखने-सुनने में लोग उलझ जाते हैं और असली मुद्दों और उसके कारणों से उनका ध्यान बंट जाता है। इस तरह के हालात बार-बार पैदा होते हैं या किए जाते हैं और इसके समांतर समस्याएं न जाने कब से अपने स्वरूप में बनी हुई रहती हैं।

समस्याओं के स्रोत को समझने की क्षमता लोगों में हैं

विडंबना यह है कि समस्याओं के स्रोत की पहचान लोग कर सकते हैं, मगर कई बार सुविधा का जीवन जीने वाला तबका साधारण लोगों को राजनीति से निरपेक्ष होने की सलाह देता है। जबकि समाज अगर किसी समस्या से दो-चार है तो उसका स्रोत व्यवस्था में छिपा हो सकता है। इन बातों को लेकर समाज और राजनीति परस्पर जुड़े हुए हैं। समाज एक अति शक्तिशाली संस्था है। राजनीति समाज से निकला एक अंग है जो समाज की इच्छाओं की अभिव्यक्ति करता है।

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सत्ता का नशा चढ़ने पर कुछ भी नहीं सूझता है

समाज के बिना राजनीति का न कोई अस्तित्व है और न ही कोई भविष्य। व्यक्तिगत तौर पर भी जो समस्या हमारे समक्ष आती है, उनका हल कहीं न कहीं हमारी सामाजिक बुनियाद को प्रभावित करने में सक्षम है। आज समाज में बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, जातिवाद, सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, अशिक्षा आदि अनेक समस्याएं व्याप्त हैं। समाज चाहता है कि वह उन समस्याओं से निकलकर एक परिपक्व समाज बने, लेकिन उसकी यह इच्छा अधूरी ही रह जाती है। कारण है राजनीति का व्यक्तिगत स्वार्थों से ओत-प्रोत होना। सत्ता का नशा जिसके ऊपर चढ़ा, वह फिर किसी बात या मुद्दे की कोई परवाह नहीं करता है।

समाज के बीच जाकर वोट मांगने वाले जब जीत के बाद हमारे जनप्रतिनिधि बनते हैं, तो चुनाव के बाद अपने सारे वादों को भूल बैठते हैं। अपने क्षेत्र में जाकर चुनाव प्रचार करने और लोगों को भरोसा देने में तो ये अग्रणी रहते हैं, लेकिन क्षेत्र में जाकर काम करने में काफी पिछड़ते हुए नजर आते हैं। हालत यहां तक पहुंच चुकी है कि अब मुद्दाविहीन राजनीति का दौर आ गया लगता है। इसमें किसी भी दल के पास चुनाव लड़ने के लिए कोई ठोस मुद्दा नहीं बचा दिखता है। व्यक्तिगत उत्तरदायित्व से खुद को बचाकर एक दूसरे पर आरोप लगाने वाले इस दौर में समाज केवल एक तमाशबीन बनकर रह गया है।

ऐसा नहीं कि इसके लिए समाज की अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं है। दरअसल, समाज भी अपने-अपने व्यक्तिगत मुद्दों को लेकर सक्रिय है। एक व्यक्ति के तौर पर किस-किस ने क्या-क्या संघर्ष किया है या मौजूदा समाज में किस तरह की सामाजिक-राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक समस्या आ रही है, वह इसकी ओर मुंह मोड़कर खड़ा है। लोग केवल वोट वाले दिन सक्रिय होते हैं और फिर वोट डालते हैं। इसके बाद घर की ओर लौट जाते हैं। कौन-सा राजनीतिक दल, किस मुददे या उद्देश्य को लेकर चुनाव लड़ रहा है, इससे किसी का कोई सरोकार नहीं है। तात्कालिक मुद्दों का गुबार हावी होता है और वह वास्तविक मुद्दों पर छा जाता है। कभी परिवार वालों के मत से, कभी राजनीतिक लहर के प्रभाव में, कभी किसी नेता के करिश्माई व्यक्तित्व के कारण हमारा समाज अपने वोट के अधिकार का प्रयोग कर अपने आप को लोकतंत्रवादी साबित करता रहता है।

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लोग समझते हैं कि हम सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं, लेकिन मुद्दाविहीन राजनीति क्या सच्चे लोकतंत्र की पहचान है। एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करना ही लोकतंत्र की पहचान बनती जा रही है। समाज इन सबसे कटा हुआ है। किसने, किसको और कैसे ठगा है, वह मुद्दा भूल गया है। पहले लाखों के गबन होते थे। यह बात अब अरबों तक पहुंच गई है जो कि इस दौर के लिए समाज में पैदा हुई सामान्य-सी बात है। अगर राजनीतिक मुद्दों के बिना बात की जाती है तो उन मुद्दों का निराकरण भी नहीं हो पाता है। समाज को चाहिए कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं से सवाल-जवाब करे, उनकी समस्या निवारण में जो भी भूमिका हो सकती है, उसके निर्धारण के लिए कोई योजना भी राजनीतिक दलों के समक्ष लाई जाए। वे ऐसा करने से इनकार करें तो फिर उन पर विश्वास न करके उन्हें अपना प्रतिनिधि न बनाएं, बल्कि किसी नए व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि चुने, जो वाकई समाज से जुड़ा हो और मुद्दों पर कार्य करना चाहता हो। हम ही समाज हैं तो ये सारी बातें हमारे ऊपर उतरती भी है।

लोकतांत्रिक जागृति गांव-कस्बों तक पहुंचे, यह हमारी जिम्मेदारी है। नहीं तो यह मुद्दाविहीन, लक्ष्यहीन राजनीति हमारी सामाजिक आधारशिला, उन्नति और आर्थिक व्यवस्था को क्षीण कर देगी। राजनीति और समाज को एक एकीकृत व्यवस्था के रूप में चलाना चाहिए। व्यक्ति का मूल्य समझना व्यक्तिवादी सोच का द्योतक नहीं है। व्यक्ति का मूल्य समाज की तरक्की और दिशा निर्धारण का उत्तम तरीका है। राजनीति को मुद्दाविहीन न बनने दिया जाए। दलों को स्वार्थपरता से दूर रखते हुए उन्हें समाज की समस्याओं से अवगत कराते रहना चाहिए। निवारण के लिए प्रेरित कर लोकतंत्र का असली स्वरूप हम सामने ला सकते हैं। अन्यथा लक्ष्यहीन, मुद्दाविहीन राजनीति हमारे समाज को कहीं न कहीं, कोई न कोई नुकसान पहुंचाएगी और भविष्य में कहीं लेकर नहीं जाएगी। इसलिए समाज को इस पर गौर करके पहल करनी चाहिए, ताकि यह सबके लिए कल्याणकारी सिद्ध हो।

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