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दुनिया मेरे आगे: संगीत है मानवीय संवेदनाओं को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम

पतंजलि दर्शन ने तो संगीत साधना को एक प्रामाणिक योग क्रिया के रूप में पहचान दी है। ‘सामवेद’ में मंत्रों के उच्चारण की वैदिक समगान में सातों स्वरों के प्रयोग की वृहद चर्चा है। पंडित शारंगदेव कृत ‘संगीत-रत्नाकर’ ग्रंथ में भी भारतीय संगीत के विस्तृत आख्यान अंकित हैं।
Written by: अशोक कुमार | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: February 29, 2024 11:19 IST
दुनिया मेरे आगे  संगीत है मानवीय संवेदनाओं को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम
तानसेन। फोटो -सोशल मीडिया)।
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मानव जीवन की उत्पति काल से ही संगीत अपने विविध आयाम से पूरे सामाजिक परिवेश को बांधे हुए है। जब वाद्य यंत्रों का आविष्कार नहीं हुआ था, प्रकृति अपने नैसर्गिक संसाधनों से संगीत का तान छेड़ा करती थी, जो आज भी शाश्वत है। संगीत को भारतीय संस्कृति की आत्मा और धरोहर का अमूल्य रत्न माना गया है, जबकि यह मानवीय संवेदनाओं को साझा करने का एक सशक्त स्रोत भी है।

संगीत विशेषज्ञों का अनुभव है कि यह शरीर और मन की व्याधियों से मुक्ति का प्रभावी उपचार है। मौलिक रूप से संगीत के तीन मुख्य अंग गायन, वादन और नृत्य हैं, जिसके नेपथ्य में स्वर, ताल तथा लय अपनी आभा बिखेरती है। संगीत के महारथियों की मान्यता है कि यह व्यक्ति के चित्त को एकाग्र कर उसे संतुलित बनाए रखने की क्षमता से भरपूर है।

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पतंजलि दर्शन ने तो संगीत साधना को एक प्रामाणिक योग क्रिया के रूप में पहचान दी है। ‘सामवेद’ में मंत्रों के उच्चारण की वैदिक समगान में सातों स्वरों के प्रयोग की वृहद चर्चा है। पंडित शारंगदेव कृत ‘संगीत-रत्नाकर’ ग्रंथ में भी भारतीय संगीत के विस्तृत आख्यान अंकित हैं।

भारत की धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं में संगीत का प्रचलन प्राचीन काल से विद्यमान रहा है। समय बदलने के साथ संगीत के स्वरूप में भी बदलाव होते गए। यह सामाजिक त्योहारों, सार्वजनिक मंचों, मंदिरों के साथ साथ राजमहलों, शहंशाहों के दरबार में भी दस्तक देने लगी और कालांतर में भक्ति-सह-सूफी आंदोलन ने भी भारतीय संगीत पर अपना प्रभाव स्थापित किया।

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चूंकि भारत गांवों का देश है, इसलिए मूल रूप से भारतीय संगीत की स्वर लहरियां ग्रामीण परिवेश के तीज-त्योहारों में राग-रंग भरती रही हैं और विभिन्न संस्कारों के अवसर को अति उल्लासमय बनाते हुए अनोखी रौनक प्रदान करती रही हैं। मान्यता है कि श्रीकृष्ण बांसुरी के मधुर और मनमोहक धुन से सभी गोकुलवासी, यहां तक कि पशु-पक्षी भी मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

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संगीत कला में दक्ष तानसेन, बैजू बावरा जैसे असंख्य महारथियों के योगदान अमिट हैं। दंतकथाओं के दृष्टांत हैं कि बैजू बावरा ने ‘राग दीपक’ गाकर तेल के दीप प्रज्ज्वलित किए थे, जबकि ‘मेघ मल्हार’ से वर्षा, ‘राग बहार’ से फूल खिलाने और ‘राग भीमपलासी’ के गायन से पत्थर पिघलाने की वे अदभुत शक्ति रखते थे।

दुनिया में पश्चिमी संगीत ने भी अपना असर दिखाया है, जिसका प्रवेश अपने देश में भी हुआ, लेकिन भारतीय फिल्म उद्योग में मूर्धन्य संगीतकार नौशाद, शंकर जयकिशन, एसडी बर्मन जैसे असंख्य व्यक्तियों ने संगीत साधना में सफलता की पटकथा लिखी। गायन क्षेत्र में सुरैया, शमशाद बेगम, लता मंगेशकर, तलत महमूद, हेमंत कुमार, मन्ना डे, महेंद्र कपूर, मुकेश, रफी और किशोर कुमार जैसे गायकों ने संगीत के संसार में मिसाल कायम रखा है। प्रसिद्ध चिंतक प्लेटो ने तो संगीत को व्यक्ति की आत्मा का अंश माना था।

संगीत विद्यालयों के पाठ्यक्रम की यात्रा करते हुए अब यह विषय महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों की कक्षाओं में अपना स्थान ग्रहण कर चुका है। विभिन्न टेलीविजन चैनलों पर संगीत के अधिकांश अच्छे कार्यक्रमों को देखा जा रहा है, जबकि कुछ फूहड़ और अश्लील गायन से संगीत की मूल भावना भी आहत हुई है।

इसके बावजूद ‘सारेगामा’ के प्रसिद्ध कार्यक्रम चार दशकों से दर्शकों का सबसे पसंदीदा कार्यक्रम सिद्ध हुआ है। संगीत के विशाल क्षेत्र से उपजे विभिन्न किस्म के खिलौनों की ध्वनि से रोते हुए शिशु चुप हो जाते हैं, जबकि दुखी मन से पीड़ित कोई भी व्यक्ति किसी भजन या गीत सुनकर कुछ पल के लिए राहत महसूस करता है। अपनी पसंद के गीत सुनकर व्यक्ति सहसा गुनगुनाने लगता है जो चरितार्थ करता है कि संगीत के तरंग में एक अदृश्य शक्ति छिपी हुई है।

शिशु के जन्म के अवसर पर सोहर, शादी में शहनाई आदि का विशेष आयोजन विरासतीय और आधुनिक काल के संगीत प्रेमियों का मनभावन पल है। बचपन की यादें बरबस मन-मंदिर को तरोताजा कर देती हैं जब गांव में सावन महीने में झूला झूलते हुए महिलाएं और बच्चे लोक गीत में लीन रहते थे।

संगीत में वह आकर्षण देखा गया है जब व्यक्ति अपनी अनुभूतियों की प्रस्तुति गायन के माध्यम से करके आंतरिक चेतना को गतिशील करता है और वह भावनाओं की गहराई तक पहुंचते हुए खुशी, प्रेम, उत्साह से सराबोर हो जाता है। वर्तमान समय में संयुक्त परिवार के टूटन के बाद एकल परिवार में अकेलेपन में संगीत एक संजीवनी बूटी के रूप में व्यवहृत हो रहा है।

एक शोधपत्र का कथन है कि संगीत प्रकल्प ने अकेलेपन के शिकार हमारे अधिकांश बुजुर्गों के मस्तिष्क को शीतलता की सक्रियता से जोड़ रखा है। पियानो, हारमोनियम, गिटार जैसे वाद्य यंत्रों के बजाने से बुजुर्गों की याददाश्त और कार्य करने की क्षमता में वृद्धि हो रही है।

अपने जीवन की भागदौड़ से थोड़ा समय निकालकर हमें संगीत के किसी भी मनोनुकूल विधा को अपनाने की चेष्टा करनी चाहिए। चिकित्सकों की सलाह है कि रात्रि शयन के पूर्व अगर थोड़ी देर भी संगीत श्रवण हो तो अच्छी और गहरी नींद आती है और थकावट दूर भागती है।

ऐसे तमाम लोग आज भी याद करते होंगे कि अस्सी के दशक में प्रांतीय सिविल सेवा प्रतियोगिता परीक्षा की अथक तैयारी काल में बीच-बीच में रेडियो से गीत सुनकर मन को हल्का कर लिया जाता था। संगीत साधकों का तो यहां तक कहना है कि संगीत व्यक्ति के शरीर के हार्मोन को संतुलित रखते हुए हमारे नकारात्मक विचारों से रक्षा करती है। किसी ने सच ही कहा है- ‘संगीत जीवन का अंश है, इसके बिना जीवन एक प्रश्न है।’

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