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दुनिया मेरे आगे: विश्वास का मूल आधार है प्रेम, मन के भावों को आदर्श से बांधने पर कमजोर होता है अपनापन

प्रेम में क्रोध, रूठने-मनाने के ये भाव भी उतने ही नैसर्गिक हैं, जितने कि समर्पण के भाव। प्रेम जितना गहरा होता है, वहां अधिकार भाव भी बढ़ता है और यह अधिकार भाव ही अक्सर संबंधों की मजबूती का कारण भी होता है।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: February 13, 2024 10:06 IST
दुनिया मेरे आगे  विश्वास का मूल आधार है प्रेम  मन के भावों को आदर्श से बांधने पर कमजोर होता है अपनापन
प्रेम जितना गहरा होता है, वहां अधिकार भाव भी बढ़ता है और यह अधिकार भाव ही अक्सर संबंधों की मजबूती का कारण भी होता है।
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मेघा राठी

अब तक हम इस वाक्य से ही गुजरते रहे हैं कि प्रेम एक बेहद कठिन रास्ता है। मगर कुछ दूसरी नजर से भी इस विषय को देखा जाए, तो प्रेम से सरल कुछ भी नहीं। इसी तरह, ऊर्जस्वित मन के लिए तमाम तरह के परामर्श दिए जाते रहे हैं। मगर सच यह है कि प्रेम से अधिक ऊर्जावान और ऊर्जा प्रदान करने वाला माध्यम कोई अन्य भावना नहीं। वास्तव में जब तक प्रेम मात्र प्रेम है, तब तक यह सरल है। उसके लिए प्रयास नहीं करने होते। अगर प्रयास किया तो वह तो अनुबंध की तरह हो गया।

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यों कह सकते हैं कि अगर प्रेम के लिए कुछ सुनियोजित तरीके से किया गया, तो उसमें प्रेम रहा ही कहां! हां, उम्मीद एक ऐसा पहलू है, जिस पर हम जमीनी धरातल पर कुछ अलग देख-समझ सकते हैं। मसलन, प्रेम में यह कहना कि जिसे प्रेम करते हो, उससे कोई आशा न करो… बस प्रेम ही करते रहो। हो सकता है कि प्रेम में डूबा कोई व्यक्ति ऐसा कर पाने का भरोसा रखता हो।

मगर कई बार लगता है कि यह तो आध्यात्मिक स्तर पर पहुंचने के बाद ही संभव है। मानवीय और सांसारिक रूप में देखा जाए तो प्रेम में न चाहते हुए भी आशा जन्म ले ही लेती है और उसे पूरा करना भी आवश्यक होता है, क्योंकि प्रेम की धारा में अगर प्रवाह न हो, वेग का उतार-चढ़ाव न हो तो यह अति सामान्य हो जाएगा।

प्रेम की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोग असल जिंदगी में कम ही जानते हैं

यह एक ऐसा विषय है कि इससे जूझने या इसकी उम्मीद करने वाले ज्यादातर लोग खुद को कई बार प्रेम का विशेषज्ञ मानना शुरू कर देते हैं। मगर थोड़ा करीब से देखने पर इस बात पर विचार करने का मौका मिलता है कि प्रेम की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोग असल जिंदगी में प्रेम का पहला अक्षर भी जान-समझ पाते हैं क्या? क्या वे प्रेम को वास्तव में कभी अनुभव कर पाते होंगे?

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यह दावा तो नहीं किया जा सकता कि उन्होंने प्रेम का अनुभव नहीं किया होगा। शायद किया भी हो और शायद नहीं भी, क्योंकि जब प्रेम को आदर्शों में बांध दिया जाता है, उसकी परीक्षा ली जाती है, तब कहीं न कहीं सहजता प्रभावित होती है। और जहां सहजता न हो, वहां प्रेम कितनी देर और किस रूप में टिकेगा?

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व्यक्ति अपने संबंध में प्रेम के आदर्श को तलाशते रहने के कारण प्रेम को जी नहीं पाता, क्योंकि यह आवश्यक नहीं होता कि दूसरे व्यक्ति का मानसिक स्तर भी उसी के अनुरूप हो। इसलिए कहीं न कहीं मतभेद के कारण उभर कर सामने आ ही जाते हैं। जब मतभेद होते हैं, तब व्यक्ति सोचने लगता है कि प्रेम के आदर्श रूप में इस प्रकार की स्थिति नहीं आनी चाहिए थी।

अगर ऐसी स्थिति आ गई है तो पढ़ी हुई प्रेम की व्याख्या के अनुसार तो ये मतभेद शीघ्र समाप्त हो जाने चाहिए थे! पर दूसरा व्यक्ति अब भी उसे मन में रख कर क्रोधित है। यहां प्रेम की पढ़ी हुई परिभाषा और वास्तविक स्थितियों से साक्षात्कार होता है और तब प्रेम के सच से भी रूबरू होने का मौका मिलता है।

ऐसी स्थिति आने पर व्यक्ति भूल जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति का मूल स्वभाव भिन्न होता है। कोई व्यक्ति अपना क्रोध प्रकट कर जल्दी ही सब भूल कर सामान्य हो जाता है, तो किसी को ऐसा करने में समय लगता है। जिस व्यक्ति को समय लगता है, आवश्यक नहीं कि उसमें अहं अधिक है और प्रेम उसके सामने गौण हो गया है। यह मात्र उसका स्वभाव हो सकता है। संभव है कि उसे दूसरों की तुलना में अधिक पैमाने पर भावनाओं के प्रतिदान और अपने प्रेमी के सान्निध्य की आवश्यकता हो। इसलिए ऐसे मसलों पर सोचते हुए पर्याप्त संवेदनशीलता और संवेदना की जरूरत होती है।

प्रेम में क्रोध, रूठने-मनाने के ये भाव भी उतने ही नैसर्गिक हैं, जितने कि समर्पण के भाव। प्रेम जितना गहरा होता है, वहां अधिकार भाव भी बढ़ता है और यह अधिकार भाव ही अक्सर संबंधों की मजबूती का कारण भी होता है। विश्वास संबंधों के लिए ठोस आधार है, लेकिन अधिकार भाव को भी उपेक्षित नहीं किया जा सकता है और न ही आशाओं को।

हालांकि यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि प्रेम में अधिकार भाव तभी औचित्य ग्रहण करता है, जब विश्वास कायम रखने और उसे मजबूत करने के लिए अतिरिक्त प्रयास न करना पड़े। जहां विश्वास नहीं होगा, वहां प्रेम की जगह सिमटती जाएगी। दरअसल, विश्वास प्रेम का मूल आधार है। अगर विश्वास की बुनियाद कमजोर होती है, तब प्रेम का तत्त्व अपने आप कमजोर होता चला जाता है। फिर शिकायत होती है कि प्रेम खत्म हो गया। जबकि विचार इस पर होना चाहिए कि प्रेम क्यों कमजोर हो गया!

प्रेम की सहजता और सरलता इन सभी भावों को समान रूप से लेकर चलने पर ही संभव हो सकती है और जैसे-जैसे प्रेम में सहजता, सरलता बढ़ती है, अधिकार भाव को सम्मान के साथ स्वीकार किया जाता है। समर्पण और विश्वास दृढ़ होते जाते हैं और जब ये सभी भावनाएं हृदय में स्थान बना लेती हैं, तब प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे से भौतिक स्तर से ऊपर उठकर चेतना के स्तर पर एकाकार होने लगते हैं। भिन्नता का बोध जब समाप्त होने लगता है, तब स्वत: ही प्रेम प्रकृति और मन के उच्चतम शिखरों को छूने लगता है। इसलिए प्रेम को आरंभिक स्तर में परखने या आदर्शवाद में ढालने की शीघ्रता करने के स्थान पर खुद को धार के बहाव में बहने देना उचित है, पर उचित-अनुचित को ध्यान में रखकर।

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