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दुनिया मेरे आगे: बाहर की दुनिया में खुद का विकास खोजता समाज, जड़ों से कटने की पीड़ा और मजबूरी

उम्मीद हमेशा एक छोटी किरण जितनी ही सही, सर्द बर्फ को पिघलाने में समर्थ होती है। इसलिए यह नहीं है कि जीवन फिर से हरा-भरा नहीं होता। हर पतझड़ के बाद बसंत तो आता ही है।
Written by: पूजा खिल्लन
नई दिल्ली | Updated: February 09, 2024 10:04 IST
दुनिया मेरे आगे  बाहर की दुनिया में खुद का विकास खोजता समाज  जड़ों से कटने की पीड़ा और मजबूरी
देश और दुनिया में कई समुदाय हैं, जिन्होंने अप्रत्याशित और विपरीत परिस्थितियों में भयावह पीड़ा झेली है।
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जीवन में हम कई बार जरूरी प्रक्रियाओं से गुजरते हैं और उनसे गुजरकर हमारा विकास होता है। बचपन में हम स्कूल जाते हैं और वक्त के मुताबिक यह नितांत जरूरी है। जब हम बड़े होते हैं तो घर से बाहर मित्रों में पड़ोसियों के पास और रिश्तेदारों के यहां हमारा उठना-बैठना अधिक होता है। यह भी एक जरूरी प्रक्रिया है जो हमारे लिए एक सामाजिक दायरे का निर्माण करती है। तब हम सामाजिक पाठशाला का अभ्यास कर रहे होते हैं जो हमें परिपक्व बनाता है, समाज में हमारे सोचने-समझने, उठने-बैठने के तौर-तरीकों में सुधार लाता है। तब हम वैसा नहीं करते या दिखते जैसा हम बचपन में करते या बोलते थे, बल्कि हम मानसिक रूप से मजबूत बनते हैं। इसी समय कालेज की भी शुरुआत होती है, जहां नए मित्र और दोस्त मिलते हैं और बचपन की दोस्ती में नया आयाम जुड़ता है।

कुछ पाने की आस में बाहर निकलना जरूरी होता जा रहा

माना जाता है कि कई मायनों में हमारा विकास घर से बाहर निकलने पर ही होता है। दुनिया की तमाम सभ्यताएं इस बात का उदाहरण रही हैं कि अपने दायरे से बाहर आने के बाद ही नई दुनिया की खोज हुई। कोई यात्री अपनी जगह से निकल पड़ा और चलते-चलते किसी नए इलाके को, किसी नए देश को नक्शे पर दर्ज करने का जरिया बन गया। नई दुनिया की खोज ज्ञान का हिस्सा है और ज्ञान विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग। धान का पौधा जब अंकुरित होता है और फिर थोड़ा बढ़ता है तब उसे उसकी जगह से उखाड़ कर कहीं और रोपा जाता है, जहां उसका विकास होता है।

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चोटों को सहन कर मजबूत बनना बन रहा है जीवन का हिस्सा

इसी तरह मनुष्य है। मां-पिता भी बच्चों को उनके विकास के लिए घर की चौखट के बाहर भेजते हैं, भले ही उनकी दृष्टि उन पर रहती है। वे उन्हें बीच-बीच में समझाते-बुझाते रहते हैं कि उनके लिए क्या अच्छा और बुरा है। बच्चे अब पहले की तरह मां-बाप की अंगुली थामे नहीं चल रहे होते, बल्कि उन चोटों को सहन कर रहे होते हैं, जिन्हें खाकर उन्हें मजबूत बनना है। मां-पिता उन्हें यह सिखाते हैं।

जब किसी पक्षी के बच्चे छोटे होते है तो वह उन्हें घोंसले में रखता है। जब वे बड़े होते है तो उन्हें आकाश में, पंख फैलाकर उड़ने के लिए छोड़ देता है। मां-पिता और शिक्षक या गुरु बच्चों को अपने अनुभव सौंपते हैं और उन्हें समृद्ध करते हैं। बहरहाल, इस तरह के उद्धरण जीवन में जरूरी तौर पर मौजूद विस्थापन की प्रक्रिया के हैं, जिससे मनुष्य का विकास होता है। मगर एक विस्थापन वह भी है जो जबरन हम पर थोपा जाता है, जिसकी पीड़ा जीवन भर के लिए आहत कर जाती है।

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मसलन, देश और दुनिया में कई समुदाय हैं, जिन्होंने अप्रत्याशित और विपरीत परिस्थितियों में भयावह पीड़ा झेली, जब वे अपनी जड़ों से काट दिए गए। मतलब जहां उन्होंने अपने जीवन के कई वर्ष, दशक बिताए थे, जहां उनकी मेहनत से खड़ा किया गया व्यापार था, उनके पुरखे थे, उस मिट्टी से उन्हें अलग कर दिया गया। उन्हें अपना सब कुछ छोड़कर अपनी जगह से विस्थापित होना पड़ा।

कई बार इस तरह विस्थापित होने वाले लोग किसी तरह सिर्फ अपनी जान बचा कर भाग जाते हैं, अपना सब कुछ, सारी संपदा छोड़ कर। उनका मानना बस यही होता है उस वक्त कि किसी तरह अपने बच्चों और परिवार की जान बच जाए। इस तड़प से जूझते व्यक्ति और समुदाय की पीड़ा को समझना क्या इतना आसान है? एक समय बहुत सारे लोगों को भारत आना पड़ा था और वह भी चोरी-छिपे, किसी तरह हांफते हुए अपनी जान-बचाकर।

वैसे लोग आमतौर पर आड़े वक्त के लिए अपनी थोड़ी संपदा भी साथ नहीं ला पाते। बस वे किसी तरह अपने बच्चों और परिवार के सदस्यों की ही सुरक्षा कर पाते हैं। इस क्रम में कितने ही लोग जान गंवा बैठते हैं, मारे जाते हैं और कई अपने प्रियजनों से बिछड़ जाते हैं।
इसमें एक अहम पहलू यह भी है कि विस्थापन के दंश से सबसे ज्यादा स्त्रियों को गुजरना पड़ता है, जो उसके मायके से ससुराल जाने के साथ ही होता है।

बहरहाल, विस्थापन की पीड़ा पुरुष भी झेलते हैं, जब वे नौकरी की तलाश में एक शहर से दूसरे शहर, एक गांव से दूसरे गांव, एक जिले से दूसरे जिले तक आजीविका के लिए यात्रा करते हैं। इनमें कई पढ़े-लिखे युवक होते हैं और कई मजदूर और श्रमिक। श्रमिकों के जीवन में विस्थापन आमतौर पर पीड़ादायी ही होता है, जिन्हें कहीं जमने नहीं दिया जाता और बार-बार उजाड़ा जाता है। उजड़ना और जमना जीवन की दो स्वाभाविक प्रक्रिया हो जाती है, जिनसे बहुतों को गुजरना होता है, लेकिन यह कटु सत्य है कि बार-बार उजड़ने वाले लोग मानसिक पीड़ा भी झेलते हैं। यह उनके जीवन को मर्मांतक पीड़ा पहुंचाता है और कई दफा अंदर तक तोड़ डालता है।

एक गीत है- ‘जहां पर सवेरा हो, बसेरा वहीं है।’ यह गीत इस पीड़ा को अवश्य कुछ हल्का कर देता है, लेकिन घाव जल्दी नही भरते। समय लगता है। जबकि कुछ घाव तो अंत तक नहीं भरते। जिन्होंने भी विस्थापन के दर्द को झेला है, वे यह जरूर समझते होंगे। पर उम्मीद हमेशा एक छोटी किरण जितनी ही सही, सर्द बर्फ को पिघलाने में समर्थ होती है। इसलिए यह नहीं है कि जीवन फिर से हरा-भरा नहीं होता। हर पतझड़ के बाद बसंत तो आता ही है।

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