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दुनिया मेरे आगे: भारी-भरकम कामनाओं के नीचे पिसता जीवन

खुशी कोई बाहरी चीज नहीं, वह हमारे भीतर ही मौजूद होती है। मगर हम उसे बाहर तलाशते रहते हैं, दूसरों से पाना चाहते हैं। दूसरों को हम खुशी दें, तो हमें भी खुशी खुद-ब-खुद मिल जाती है। मगर हम तो केवल पाना चाहते हैं, देने का प्रयास करते ही नहीं। हमें तो सब कुछ चाहिए, उसी में खुशी का अनुभव करते हैं।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 18, 2024 11:19 IST
दुनिया मेरे आगे  भारी भरकम कामनाओं के नीचे पिसता जीवन
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(सोशल मीडिया)।
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रेखा शाह आरबी

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हर इंसान खुश होना चाहता है, मुस्कुराना चाहता है, लेकिन उसके सामने की स्थितियां ऐसी होती हैं कि वह यही सोचता है कि कैसे मुस्कुराएं! जब खुद उसके सिर पर दुखों की गठरी लदी होती है और उसकी गठरी में सिर्फ भौतिक संसाधन रूपी इच्छाएं होती हैं, तब असली मुश्किल तो यही है! जिस दिन वह इस गठरी को उतार देगा, उस वक्त से खुशियां उसके आसपास होंगी। सच यह है कि वह अपनी भारी-भरकम इच्छाओं के नीचे दबा होता है, जो उसके मुस्कुराने की तो दूर, जीने के लिए सांसों को भी अवरोधित करती हैं।

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वह रात-दिन अपनी इन्हीं इच्छाओं और कामनाओं के नीचे पिसता रहता है। उसके पास जो है, उसकी उससे कोई खुशी नहीं है, लेकिन उसके पास जो नहीं है, उसका दुख उसे खूब रहता है। शायद यही सोच उसे कमजोर कर देती है। अन्यथा धरती पर कोई भी इंसान इतना वंचित नहीं होता कि उसके पास खुश रहने की कोई वजह न हो। हर व्यक्ति अपनी सीमा में अपनी तरह की खुशी की खोज कर लेता है।

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मुश्किल यह है कि मनुष्य ने अपनी सारे सुख का ताना-बाना भौतिक चीजों के इर्द-गिर्द बुन लिया है। जबकि खुशियों का खजाना हमारे इर्द-गिर्द हर तरफ मौजूद है, लेकिन इसे कैसे पाया जाए बस यही बात इंसान नहीं समझ पाता है। जब इच्छा का वृक्ष आसमान की ओर जाएगा, तो खुशियों के वृक्ष का विस्तार कैसे होगा? खुशियों और बेहिसाब इच्छाओं का आपस में विपरीत संबंध है।

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अगर हम सोचते हैं कि हमारी कोई खास मनोकामना पूरी हो जाने पर हम खुश हो जाएंगे, तो यह हमारी एक बड़ी भूल है, क्योंकि जैसे ही वह मनोकामना किन्हीं हालात में पूर्णता को प्राप्त करती है, वैसे ही नई कामनाएं हमें चारों तरफ से घेर लेती हैं। इसके बाद हम नई कामनाओं के जाल में उलझते चले जाते हैं। कामनाओं का यह जाल इतना मजबूत है कि कभी-कभी तो कुछ लोग मृत्यु तक इसको नहीं काट पाते हैं।

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कई बार हम पाना चाहते हैं खुशियां और अपने आप से नकारात्मकता को लिपटाए रहते हैं। यह ऐसा ही है कि हम जहर पीते हैं और अमरत्व की अपेक्षा करते हैं। अगर हमें सच में खुशियां पानी है तो हमें सरल बनना चाहिए, बिल्कुल पानी की तरह कि जिस भी बर्तन में रहें, उसी के अनुरूप अपने आप को ढाल लें। खुशियां पाने का सबसे सीधा तरीका है कि खुशी बांटनी शुरू कर दी जाए। फिर खुशियां चौगुनी होकर वापस लौट आएंगी। हम किसी के चेहरे पर मुस्कान लाएं, कुदरत उस मुस्कान को तुरंत हमारे चेहरे पर भी भेज देता है, एक अकथनीय आत्मसंतुष्टि के रूप में। इस खुशी का भला भौतिक संसाधन से क्या मुकाबला है।

खुशी बहुत बड़ी-बड़ी चीजों की अपेक्षा छोटी-मोटी चीजों से ज्यादा मिलती है। अपने आसपास भी नजर दौड़ाया जाए तो हजारों ऐसी वजहें मिल जाएंगी, जिन्हें करने पर हमें मन में सच्ची खुशी मिलेगी। कभी किसी जरूरतमंद की मदद करके, किसी के मुसीबत में उसके काम आकर। खुशी पाने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा हमारा निष्ठुर मन है, जो त्याग करना नहीं जानता है। कुछ भी करने से पहले अपना स्वार्थ देखता है। एक बार इस स्वार्थ का परित्याग करके कोई काम किया जाए, तब पता चलेगा कि उसमें खुशी ही खुशी है।

खुशियां तब हमारे जीवन से भी विलुप्त हो जाती हैं, जब स्वार्थ का आंखों के आगे पर्दा पड़ जाता है। स्वार्थ और नकारात्मकता कई बार बेहद प्रबल रूप से हमारे आसपास एक ताना-बाना बना लेती हैं, ताकि हम अपनी इच्छाओं और कामनाओं के अलावा कुछ भी देख, सुन और समझ न सकें। स्वार्थ हमें हर प्रकार से लालच और लोभ देता रहता है और हमारे निस्वार्थ बनने के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करता है। कभी वस्तु के मोह के रूप में तो कभी जरूरत का हवाला देकर।

खुशी का ताना-बाना अगर हम अपने इर्द-गिर्द बुनना चाहते हैं, तो हमें अपने आप को किसी ट्रेन का ऐसा यात्री मान कर देखना चाहिए, जिसके डिब्बे में हर प्रकार के सुख-दुख, निराशा, शांति-अशांति रूपी यात्री बैठे हुए हैं। अपना मित्र हम इनमें से किसको बनाएंगे, यह खुद अपने ही ऊपर है। अगर हम सुख के पास जाकर बैठेंगे, तो सुख महसूस होगा, दुख के पास बैठेंगे तो दुख महसूस होगा, शांति के पास बैठेंगे तो शांति और अशांति के पास बैठेंगे तो अशांति मिलती है।

मगर उससे भी बड़ा सत्य यह है कि इस यात्रा में कुछ भी सदा के लिए नहीं है। हम किसी भी यात्री के साथ पूरा जीवन नहीं चल सकते हैं। यात्री बदलते रहते हैं। हमें कभी न कभी सबको अपना सहयात्री बनाना ही पड़ेगा, क्योंकि जीवन में बदलाव प्रकृति का नियम है और प्रकृति निष्ठुर रूप से अपने नियमों का पालन करवाती है। ऐसे ही यात्रा करते हुए एक दिन हम अपनी जीवन यात्रा को पूरा कर लेंगे और पीछे रह जाएंगी अनेक अतृप्त इच्छाएं और कामनाएं।

खुशी कोई बाहरी चीज नहीं, वह हमारे भीतर ही मौजूद होती है। मगर हम उसे बाहर तलाशते रहते हैं, दूसरों से पाना चाहते हैं। दूसरों को हम खुशी दें, तो हमें भी खुशी खुद-ब-खुद मिल जाती है। मगर हम तो केवल पाना चाहते हैं, देने का प्रयास करते ही नहीं। हमें तो सब कुछ चाहिए, उसी में खुशी का अनुभव करते हैं। इसका अगर केवल क्रम बदल दें, तो खुशी अपने अप बरसनी शुरू हो जाएगी।

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