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दुनिया मेरे आगे: दूसरों की फिक्र करने से पहले स्वयं की फिक्र करना अधिक जरूरी

भले ही लोगों की यह कोशिश होती है और वे सोचते हैं कि वे किसी जरूरतमंद की मदद करें। उनके सामने ऐसा अवसर आए तो वे पूरी ईमानदारी से ऐसा करेंगे भी। मगर इससे जुड़ा तथ्य यह है कि वे मदद तभी कर सकेंगे, जब ऐसा कर सकने की स्थिति में होंगे।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: March 06, 2024 10:20 IST
दुनिया मेरे आगे  दूसरों की फिक्र करने से पहले स्वयं की फिक्र करना अधिक जरूरी
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(फ्रीपिक)।
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अमिताभ स.

शिक्षण संस्थाओं, सेना और कई अन्य संगठनों में ‘सर्विस बिफोर सेल्फ’ यानी ‘स्वयं से पहले सेवा’ का पाठ पढ़ाया जाता है। भारतीय संस्कृति का यह मंत्र स्वयं से पहले दूसरों की सेवा और देखभाल करने की प्रेरणा देता है। एक फिल्म का संवाद कुछ यों है- ‘जिंदगी अपने लिए जिए, तो क्या जिए। दूसरों के काम आए, वही तो जिंदगी है।’

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जबकि इससे उलट दुनिया भर की हर हवाई उड़ान भरने से पहले साफ शब्दों और इशारों में हिदायत दी जाती है कि आपात स्थिति में जरूरत पड़ने पर सबसे पहले अपना आक्सीजन मास्क लगाएं, फिर उसके बाद ही दूसरे सहयात्रियों की मदद करें। इसके पीछे का संदेश साफ है कि आप बचेंगे, सेहतमंद होंगे, खुशहाल रहेंगे, तभी दूसरों के प्रति फिक्रमंद और मददगार बन सकते हैं। अगर आप ही नहीं बचेंगे, तो दूसरों की क्या सहायता कर पाएंगे? इस तर्क का भाव समझा जाए, तो दूसरों से पहले स्वयं का खयाल रखना हर हाल में स्वार्थी नहीं बनाता।

कई फिल्मों और उपन्यासों के संवादों के खासे और बड़े मायने होते हैं। लोग उन्हें पढ़-सुन कर सदा याद ही नहीं रखते, उनका मतलब भी जीवन की कार्यशैली में उतार लेते हैं। स्वयं से अपनापन जताने वाले, प्यार करने वाले या खुद को अपना पसंदीदा मानने वाले अपने तन-मन की भरपूर देखभाल करते हैं। सयाने तो इस हद तक समझाते हैं कि अगर आप किसी दूसरे से प्यार या स्नेह करना चाहते हैं, उसका खयाल रखना चाहते हैं, तो पहले अपने आप से प्यार करना और अपना खयाल रखना सीखना पड़ेगा। अपना सम्मान करने का मतलब किसी का विरोध करना कतई नहीं है, बल्कि अपने भीतर सबका मददगार बनने की शक्ति जगाना ही है।

इसे यों समझना चाहिए कि अगर कोई व्यक्ति प्रसन्नचित है, तो वह खुशियां बांटने के काबिल भी है। अन्यथा वह दूसरों को खुश रखने में समर्थ नहीं हो सकता। जीवन की भागमभाग में दब कर हर कोई जाने-अनजाने अपनी अनदेखी करता जाता है। अपने आप से प्यार का विस्तृत अर्थ ही व्यक्ति का आत्म प्रसन्न, आत्म संपन्न और आत्म स्वस्थ होना है। माता-पिता, पुत्र-पुत्री, पति-पत्नी, भाई-बहन, यार-दोस्त समेत कोई किसी का सच्चा साथी नहीं है। रिश्ते-नाते बीच-बीच में एक-एक करके बिछुड़ते जाते हैं। धन-वैभव भी आना-जाना है।

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हर किसी का अकेला शरीर ही जन्म से मृत्यु तक साथ निभाता है। शरीर ही वास्तविक संपत्ति है, जिसे न कोई साझा कर सकता है, न छीन सकता है। इसलिए खुद का खयाल रखना सबसे जरूरी है। अपना और अपने शरीर का जितना ध्यान रखा जाएगा, वह उतने ही बढ़िया ढंग से साथ निभाता चलेगा। हर व्यक्ति अपनी सबसे बेहतर देखभाल कर सकता है।

इसलिए ध्यान, योग, पैदल चलना, कसरत करना, पौष्टिक खाना, सुविचार पालना, सुकर्म करना तन-मन से सेहतमंद और खुशहाल रहने का जरिया है। देखने-सुनने में यह जितना सरल है, उतना होता नहीं है। अमेरिकी शिक्षक-लेखक ल्यूसिल बाल कहते हैं, ‘कुछ भी हासिल करने से पहले सबसे पहले खुद से प्यार करो, बाकी सब कतार में लगा दो। स्वयं की देखभाल करना स्वार्थी कार्य कतई नहीं है। खुद को समझाएं कि मुझे तन और मन का कुदरत से अनमोल उपहार मिला है, तो उसकी कद्र क्यों न करूं?’

बड़े-बूढ़ों से अमूमन कहते-सुनते रहते हैं कि जान है, तो जहान है। सचमुच तंदुरुस्त व्यक्ति ही दूसरों की मदद करने के काबिल है और उससे पहले वही जीवन का सच्चा आनंद ले सकता है। सेहतमंद होना, पैदल चल पाना, खुद खा-पी सकना, अपने छोटे-बड़े काम निपटा पाना और इनसे भी ऊपर सांसें ले पाना कुदरत की अमूल्य नियामतें हैं। बावजूद इसके ज्यादातर तमाम कुदरती सौगातों की बेकद्री कर और सांसारिक तामझाम जुटाने में जुटे रहते हैं।

अच्छी सेहत से लेकर हर वह छोटी-बड़ी चीज, जो हमारे पास है, जब तक हमारे पास होती है, तब तक हम उसकी कद्र नहीं करते। जब वह हमारे से दूर जाती है या लुप्त हो जाती है, तब कहीं जाकर हमें उसके अमूल्य होने का एहसास होता है। फिर हम उसे हासिल करने के लिए लालायित हो उठते हैं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिंदगी में मिले अपने वरदानों और सौगातों की गणना कीजिए, कमियों की कदापि नहीं। तभी ‘और चाहिए-और चाहिए’ की रट पर लगाम लग सकेगी।

इसे इस रूप में भी समझा जा सकता है कि सभी भले लोगों की यह कोशिश होती है और वे सोचते हैं कि वे किसी जरूरतमंद की मदद करें। उनके सामने ऐसा अवसर आए तो वे पूरी ईमानदारी से ऐसा करेंगे भी। मगर इससे जुड़ा तथ्य यह है कि वे मदद तभी कर सकेंगे, जब ऐसा कर सकने की स्थिति में होंगे। आशय यह है कि एक सक्षम व्यक्ति ही किसी की मदद कर सकता है।

विडंबना यह है कि कई बार किसी खास मामले में सक्षम व्यक्ति एक विचित्र दंभ से गिर जाता है और वह जरूरतमंदों की मदद करने के बजाय उनकी उपेक्षा करने लगता है। दूसरों को ‘सर्वश्रेष्ठ बनना है’ का उपदेश छोड़ कर पहले ‘मुझे सर्वश्रेष्ठ बनना है’ को खुद पर लागू करने की जरूरत है। दूसरों का फिक्रमंद होने से पहले स्वयं की फिक्र करना और खयाल रखना कहीं ज्यादा जरूरी है, क्योंकि केवल एक ही व्यक्ति है, जो अपने जीवन के लिए जिम्मेदार है और वह हम खुद हैं, कोई और नहीं। इसलिए सबसे पहले अपने आपको काबिल और समर्थ बनाने में जुट जाना वक्त का तकाजा है।

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